संस्करण: 13 फरवरी- 2012

अदालती फैसले के मायने

 

? महेश बाग़ी

               भारतीय लोकतंत्र में न्यायिक सक्रियता पर अक्सर बहस होती रहती है। कभी न्यायपालिका खुद को सर्वोच्च साबित करने की कोशिश करती है,तो कभी संसद अपना वर्चस्व साबित करती है। न्यायपालिका जब राजनीति, खासकर सत्तारूढ़ दल पर प्रहार करती है,तो उसकी नीयत पर ही सवाल उठाए जाने लगते है। लेकिन जब यही न्यायपालिका राजनेताओं को निर्दोष साबित करती है,तब उनके सुर ही बदल जाते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से संबंधित मामले में केन्द्रीय जांच ब्यूरों की विशेष अदालत क फैसला गृहमंत्री पी.चिदंबरम के पक्ष में जाने के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। इस प्रकरण में तीस लोगों और पांच कंपनियों को आरोपी बनाया गया है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुब्रम्हण्यम स्वामी ने एक याचिका दायर कर मांग की थी कि गृहमंत्री पी.चिदंबरम को भी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सहआरोपी बनाया जाए, क्योंकि जब घोटाला हुआ,तब वे वित्तमंत्री थे। स्वामी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों को विशेष कोर्ट ने नकार दिया और कहा कि ये पर्याप्त सबूत नहीं हैं। कोर्ट ने स्वामी की याचिका खारिज़ कर दी।

                सीबीआई की विशेष अदालत के इस फैसले से चिदंबरम के साथ-साथ यूपीए सरकार और कांग्रेस ने राहत की सांस ली है। यदि अदालत स्वामी की दलीलों और उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों को पर्याप्त आधार मान लेती,तो चिदंबरम का पद पर बने रहना मुश्किल हो जाता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसकी गिरफ्त में आ सकते थे तथा विपक्ष उनसे भी इस्तीफ़े की मांग कर बैठता। इससे यूपीए सरकार संकट में आ जाती तथा राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने की आशंका बलवती हो जाती। इससे कांग्रेस भी मुश्किल में पड़ जाती तथा उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ता, जहां वह जीवन-मरण का संघर्ष कर
रही है।

                 अदालत के इस फैसले से यह तथ्य भी रेखांकित होता है कि किसी भी मामले में अदालत के फ़ैसले केवल राजनीतिक बयानबाज़ी और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नहीं,बल्कि ठोस दस्तावेज़ों के बल पर दिए जाते हैं। यहां 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिक्र करना भी प्रासंगिक है, जिसमें कोर्ट ने आवंटन में धांधली पाते हुए सभी 122 करार रद्द कर दिए थे। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि अदालत को पर्याप्त दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए थे। अदालत ने कुछ निजी कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया था, जिसे सरकार ने सहर्ष स्वीकार कर तत्काल कार्रवाई की थी। चिदंबरम को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सहअभियुक्त बनाने की याचिका इस लिए खारिज कर दी,क्योंकि डॉ. स्वामी पर्याप्त दस्तावेज़ और साक्ष्य उपलब्ध कराने में नाकाम रहे थे। इस कारण अदालत ने चिदंबरम को सहआरोपी बनाने से इंकार कर याचिका खारिज कर दी।

                ज़ाहिर है कि अदालत के इस फैसले से डॉ. स्वामी को निराशा हाथ लगी है। इसीलिए वे और भारतीय जनता पार्टी के नेता फैसले पर असंतोष जता रहे हैं,जिसे उचित नहीं कहा जा सकता। हालांकि उन्हें अदालत के फैसले पर असंतोष जताने और मामला ऊपरी अदालत में ले जाने का पूरा अधिकार है,जिसका वे उपयोग कर सकते हैं,किंतु यदि उनकी भावना पवित्र है और वे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार तथा कांग्रेस को बेनक़ाब करना चाहते हैं,तो उन्हें अदालत के अलावा सार्वजनिक मंचों से अपनी बात कह कर माहौल बनाना चाहिए। वे ऐसा करेंगे,इसमें संदेह है,क्योंकि सुब्रम्हण्यम स्वामी जैसे नेता का कोई ज़मीनी आधार नहीं है। उनकी जेबी राजनीतिक पार्टी 'जनता पार्टी' का अस्तित्व क्या है और वह कितनी देशव्यापी पार्टी है, यह पूरा देश जानता है। इससे इस आशंका को भी बल मिलता है कि कहीं स्वामी सनसनी फैलाने और मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए तो यह सब नहीं कर रहे हैं ?

                जहां तक 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का सवाल है, तो कोर्ट में यह प्रमाणित हो चुका है कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए.राजा इसके लिए जिम्मेदार थे,जो अब जेल की हवा खा रहे हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस का यह तथ्य भी ग़ौरतलब है कि इस घोटाले की शुरूआत राजग कार्यकाल में शुरू हुई तथा भाजपा के प्रमोद महाजन तब दूरसंचार मंत्री थे। उन्होंने ही 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति का सूत्रपात किया था। इसलिए भाजपा को इस मुद्दे पर शोर-शराबा करने का कोई आधार नहीं है। हां,यूपीए सरकार से इतनी चूक जरूर हुई कि उसने निगरानी नहीं की और घोटाला रोकने का प्रयास नहीं किया। कांग्रेस इसका खामियाजा भी भुगत चुकी है, जिनके सहयोगी दल का एक बड़ा नेता जेल में हैं। सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा चिदंबरम को बरी करने के फैसले का एक आशय यह भी है कि 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला किसी भी सूरत में दबाया नहीं जा सकता और सरकार को इसमें आगे भी कार्रवाई जारी रखना पड़ेगी। इसी के साथ यूपीए सरकार को यह सबक भी मिला है कि कोई भी नीति बनाने या बदलने के बाद उस पर सतत निगरानी भी रखी जानी चाहिए और यदि कहीं कोई गड़बड़ी मिले तो तत्काल क़दम भी उठाने चाहिए। बहरहाल अदालत के फैसले से फिलहाल चिदंबरम, यूपीए सरकार और कांग्रेस को बड़ी राहत मिली है।

 
? महेश बाग़ी