संस्करण: 13 फरवरी- 2012

राजनीतिक नपुंसकता की उपज हैं चुनाव में हिजड़े

? सुनील अमर

               403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में लगभग 50 हिजड़े भी मैदान में हैं। हिजड़ा, किन्नर या तीसरा लिंग आदि के शाब्दिक विवेचन में पड़ने के बजाय यहॉ तात्पर्य उनसे है जो नाच-गा कर या फिर भिक्षावृत्ति कर जीवन यापन करते हैं और जिन्हें लैंगिक विकृति के कारण उक्त शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। चुनाव में हिजड़ों का उतरना कोई असंवैधानिक कृत्य नहीं है। आम मतदाताओं की तरह ये भी मतदाता होते हैं और देश की संवैधानिक व्यवस्था में कोई भी पात्र मतदाता चुनाव लड़ सकता है। देश की शीर्ष अदालत ने भी हिजड़ों को एक सामान्य नागरिक ही माना है। इस नाते हिजड़े भी सभी नागरिक अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं। देश में जो सामाजिक व्यवस्था है उसमें हिजड़ों को उपेक्षित व घृणित निगाह से देखा जाता है। इनका आवास भी प्राय: ही दलितों की तरह आबादी के एक तिरस्कृत कोने में होता है तथा ये सामान्य जन-जीवन से दूर रहते हैं। इस प्रकार समाज से उपेक्षित, तिरस्कृत और भिखारी प्रवृत्ति की एक जाति और लिंग विशेष के व्यक्तियों का आज के हाहाकारी चुनावों में हिस्सेदारी करना काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। इससे पहले भी हिजड़े चुनाव लड़ते और विजयी होते रहे हैं लेकिन इतनी बड़ी संख्या में संभवत: पहली बार चुनाव मैदान में हैं और कई स्थानों पर चुनावी राजनीति के दिग्गजों को पसीना छुड़ाते नजर आ रहे हैं।

               अस्सी के दशक के बाद देश की राजनीतिक प्रवृत्ति मे कई अधोगामी परिवर्तन हुए। खासकर धन और अपराधियों के खुलेआम प्रवेश और येन-केन-प्रकारेण उनकी सत्ता तक पहुॅच ने आमजन को पहले तो चौंकाया लेकिन चुनावों में उनकी सतत बढ़ोत्तरी ने बाद में बहुत निराश किया। इस निराशा की प्रतिक्रिया कई प्रकार से व्यक्त भी हुई। निर्दल प्रत्याशियों की चुनावी विजय में जहॉ बढ़ोत्तरी हुई वहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का भी उदय हुआ और इस प्रकार बड़े राजनीतिक दल यानी राष्ट्रीय दलों के प्रभा मंडल में गिरावट आयी। बाद के दिनों यानी 90के दशक के बाद से (और आज तक) तो दोनों बड़े राष्ट्रीय दल और इस दौरान बने कई राजनीतिक मोर्चे भी ऐसे छुटभैया दलों के मोहताज बनकर रह गये। बड़े राजनेताओं की कथनी और करनी में हो रहे लगातार ह्रास ने मतदाताओं को इनका विकल्प तलाशने को मजबूर किया। ऐसे ही विकल्प के रुप में हम कुख्यात अपराधियों, तथा काला धन के आकओं को चुनाव जीतते देख रहे हैं। इसी क्रम में चुनाव लड़ और जीत रहे हिजड़े भी हैं। यह व्यवस्था और उसके संचालकों के प्रति व्यक्त रोष है। वर्ष 1994 में देश में हिजड़ों को मताधिकार दिया गया। इसी के बाद इनकी चुनावी प्रक्रिया में सहभागिता शुरु हुई। अरसा पहले गोरखपुर नगर निगम के मेयर तथा मध्य प्रदेश से विधायक के पद पर निर्वाचित हिजड़े इसी रोष की अभिव्यक्ति हैं। लिंगीय विभेद या विकृति के कारण एक हिजड़े को भारतीय समाज में हजारों साल से नामर्दगी का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार इस पुरुष प्रधान समाज में हिजड़ों को जिताना मर्द नेताओं पर एक तरह से सामाजिक प्रहार ही था लेकिन देश के राजनेता इस प्रहार को भी झेल गये तथा चुनावों में हिजड़ा प्रत्याशियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

               प्रदेश में हिजड़ों के दो दिलचस्प मुकाबले हैं। इनसे पता चलता है कि मतदाता क्यों प्रतिक्रिया करना चाहता है। एक मुकाबला प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर में है जहॉ की कैन्ट सीट से देश की सबसे चर्चित हिजड़ा शबनम मौसी जो कि मध्य प्रदेश के सुहागपुर विधानसभा क्षेत्र से 1998में विधायक भी रह चुकी हैं और एक आई.पी.एस अधिकारी की संतान हैं, अपनी पार्टी 'राष्ट्रीय विकलांग पार्टी' की उम्मीदवार हैं। मुस्लिम बहुल इस विधानसभा क्षेत्र में कॉग्रेस ने वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान तो समाजवादी पार्टी ने हसन रुमी तथा बसपा ने सुहैल अंसारी को मैदान में उतारा है। भाजपा ने रघुनंदन सिंह भदौरिया को अपना प्रत्याशी बनाया है। इतने दिग्गजों के बीच शबनम मौसी ताल ठोंक कर कूद पड़ी हैं!जानना दिलचस्प होगा कि हिजड़ों में जाति-धर्म की कोई दीवार नहीं होती। शबनम मौसी के हौसलों के बुलंद होने का शायद यह भी एक कारण हो।

                 इससे भी दिलचस्प मुकाबला प्रदेश की धार्मिक नगरी अयोध्या में हो रहा है। यहॉ एक तरफ 22 वर्षो से लगातार विधायक भाजपा के लल्लू सिंह हैं तो दूसरी तरफ सपा, बसपा और कॉग्रेस ने भी अपने प्रत्याशियों को मैदान में जोर-शोर से उतारा है। इन सब मर्दों के बीच में अपने को किन्नर कहने वाली गुलशन बिन्दु भी मैदान में हैं और अपने धॉआधार और विशिष्ट चुनाव प्रचार से प्रेक्षकों की नींद उड़ाये हुए हैं। दिलचस्प है कि गुलशन बिन्दु को समाज के अन्य वर्ग के अलावा युवाओं से काफी सहयोग मिल रहा है! उनके चुनाव में मदद के लिए उनकी बिरादरी के तमाम किन्नर अयोध्या में डेरा डाले हुए हैं। कमाल यह है कि अपने तर्को से गुलशन ने लोगों को चुप कर रखा है। एक तरफ जमे-जमाये राजनीतिज्ञ और विकास के वादे तो दूसरी तरफ गुलशन की ललकार कि 'मर्द विधायकों का क्षेत्रीय विकास के प्रति हिजड़ापन तो आप लगातार देख रहे हैं, अब एक बार एक हिजड़े को जिताकर क्षेत्रीय विकास के प्रति उसकी मर्दानगी भी आजमाइए।' गुलशन कहती हैं कि उनके आगे-पीछे कौन सा परिवार है जो वे सरकारी धन का लूट-खसोट करेंगी। हालॉकि मायावती और जयललिता जैसे उदाहरण देने पर वे खामोश हो जाती हैं और कहती हैं कि सभी एक जैसे नहीं होते। अयोध्या में परिवर्तन की लहर इस बार दिखती है। अब वह किसके कंधे पर सवार होकर आएगी यह देखने वाली बात होगी।

                 लोकतांत्रिक पध्दति के प्रसिध्द चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया कहते थे कि 'जिन्दा कौमें पॉच साल तक इंतजार नहीं करतीं।' उनका आशय था कि चुनाव की प्रतीक्षा करने के बजाय परिवर्तन के काम में लग जाना चाहिए। लोकतांत्रिक पध्दति में वे किसी भी दल या व्यक्ति के स्थायी बन जाने के भी विरुध्द थे और कहते थे कि जिस तरह रोटी अच्छी बनाने के लिए उसे तवे पर उलटते-पलटते रहन पड़ता है,उसी तरह सत्तारुढ़ दलों व प्रतिनिधियों को भी उलटते-पलटते रहना चाहिए। अयोधया का क्षेत्र तो वैसे भी डॉ. लोहिया का जन्म स्थान रहा है। इसे भी परिवर्तनकामी होना ही चाहिए। आज हिजड़ा कहकर हम आश्चर्य से जिन्हें देखते हैं और जिन्हें हमने भीख मॉगने को मजबूर कर रखा है वे भी असली जिन्दगी में बिल्कुल सामान्य आदमियों सरीखे ही होते हैं और उसी तरह की उनकी अनुभूतियॉ भी। उन्हें भी काम, क्रोध, मद और लोभ व्यापता है। बस प्रकृति की एक विकृति है उनके साथ कि बाह्य जननांग अविकसित होने के कारण वे संतान नहीं पैदा कर सकते। कई हिजड़े बताते है कि यह हमारे समाज का नासूर है कि कई मॉ-बाप ही बच्चे को हिजड़ा जानने पर घर से निकाल देते हैं, अन्यथा तमाम हिजड़े हमारे-आपके बीच में सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं और कोई जान भी नहीं पाता। इसी समाज में एक सामान्य जिन्दगी जीने का हक़ इन्हें भी है। दुनिया में सैकड़ों 'ट्रांस जेंडर' लोगों ने सामान्य व्यक्तियों की तरह से सफलता की ऊॅचाइयॉ छुई हैं। न्यूजीलैंड के मेयर व सांसद रहे जॉर्जिना बेयर (2007) कनाडा के क्रिस्टीन मिलॉप (2011) पॉच साल पहले गोरखपुर, उ.प्र. की मेयर तथा 1998 में मधय प्रदेश से विधायक रही शबनम मौसी इसी श्रेणी में हैं।

  ? सुनील अमर