संस्करण: 13 फरवरी- 2012

राजनीति के बाजार में ब्राण्ड का महत्व

? के.एस.चलम

               हमारे देश में राजनीतिक प्रक्रिया इन दिनों पाश्चात्य प्रजातांत्रिक तरीकों की नकल करती हुई प्रतीत होती है। उसने बाजार पूॅजीवादी प्रजातंत्रों द्वारा कुछ बड़े खिलाड़ियों के आर्थिक हितों के अनुरूप अपनाई गई नीतियों में से कुछ को अपना लिया है। यह भी देखा गया है कि सामाजिक विज्ञानों में अध्ययन विशेषकर राजनीतिक अर्थव्यवस्था में अध्ययन ऐसे राजनैतिक साहस का समर्थन कर रहा है।नागरिकों के मतदान करने के व्यवहार के संदर्भ में सार्वजनिक पसंद या सामाजिक पसंद के सिध्दान्त ने प्रजातंत्र के सिध्दान्त पर अपनी बढ़त बना ली है। अमर्त्य सेन सहित अर्थशास्त्र में नोबल पुरूस्कार प्राप्त करने वाले आधे दर्जन के लगभग विद्वान इस सिध्दान्त के विकास से जुड़े हुये है जिसे सामाजिक पसंद कहा जाता है और जिसने प्रजातंत्र, बाजार या राज्य के बारे में पुराने विचारों को बदलते अथवा सुधार करते हुये सार्वजनिक मामलों में नई सोच पैदा करने में योगदान दिया है। सार्वजनिक पसंद के सिध्दान्त ने खास नीति निर्माताओं और शासकीय तंत्र पर अपना प्रभाव छोड़ा है और परिणामस्वरूप इसे राजनीतिक दलों और राजनीति में शामिल होने वाले अन्य लोग भी अपनाने को बाधय हुये हैं।

               इस सिध्दान्त में देखा गया है कि किस तरह नौकरशाहों सहित सरकारी सेवक समाज के सामूहिक हित के लिये काम के प्रति अनुदार और असहयोगी है। एडम स्मिथ की प्रसिध्द पंक्तियों के आधार पर निष्कर्ष निकालना कि व्यक्तियों के निजी हित बाजार में सामान के विनिमय में अदृश्य भूमिका निभाते है। बकनान (नोबल विजेता) ने यह स्थापित किया था कि लोग, समाज, समुदाय आदि का वास्तव में कोई अस्तित्व नही है। एक अन्य नोबल विजेता एरो भी इस बात का समर्थन करते हुये कहते है कि सामूहिक पसन्द और असंभवता सिध्दान्त के लिये कोई तंत्र नही है। बकनान बाजार की बड़ी भूमिका की पैरवी कर चुके है। बकनान और उसके अनुयाई लोक नीति में सिध्दान्त बनाने में समर्थ है जो सामान्य तौर पर विश्व बैंक जैसी संस्थाओं द्वारा स्वीकार की जाती है।

                इस समूह के अनुसार प्रतिनिधित्वात्मक प्रजातंत्र मुट्ठीभर लोगों की तानाशाही के अलावा कुछ नही है। अधिकांश चुनावों में मतदाताओं को बरगलाया जाता है और जिन लोगों के सरकार से हित जुड़े होते है वे इस व्यवस्था में चुनाव परिणामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

               ऐसा कहा जाता है कि हित समूह या औद्योगिक लॉबी अपने वोटों का सौदा करते है और बदले में कृषि संबन्धी अनुदान या अन्य मदद की अपेक्षा रखते है। कुछ अन्य समूह जो अपने हितों के लिये संघर्ष करते तो प्रतीत होते है किन्तु वे उनके हित में कानून को पास कराने के लिये एन-केन-प्रकारेण बहुमत सुनिश्चित कर लेंते हैं। इसलिये अंतिम निष्कर्ष पर पंहुचने के लिये यह बेहतर है कि सार्वजनिक वस्तुओं की भलीभॉति आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु एक कुशल राज्य की बजाय बाजार जैसी कुशल संस्था पर निर्भर रहा जाये।

                वास्तव में ये राजनीतिक अर्थशास्त्री या शिकागो के अर्थशास्त्री सार्वजनिक वस्तुओं की संख्या कम करने के लिये बहुत थोड़े और पर्याप्तरूप से अभिमुख नीतिनिर्माताओं के समक्ष इस प्रकार विश्वासोत्पादक तर्क प्रस्तुत कर चुके है कि उनकी आपूर्ति निजी क्षेत्र पर छोड़ दी जाये। बकनान कह चुके है कि मतदाता मतदान केन्द्र पर वोट देने हेतु जाने के पहले ही नागरिकों पर लगाये गये करों और उसके बदले में प्रस्तावित बजट में प्राप्त होने वाले सार्वजनिक हितों या लाभ की हमेंशा तुलना करता है। भारत में बहुत से अनुसंधानकर्ता और नीति निर्माता है जो शिकागो स्कूल (अर्थशास्त्र के अधययन का प्रमुख केन्द्र) के विचारों का अनुसरण करते है और हमारी प्रजातांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं में संशोधानों का प्रयास कर चुके है। उनमें से कुछ इस तरीके से काम कर रहे है कि अमेरिकन व्यवस्था भारत में दोहराई जा रही है।

                 अमर्त्य सेन विशेष रूप से असम्भाव्यता के सिध्दान्त पर बहस में भाग ले चुके है जो सामूहिक रूप से एकमत होने में आने वाली कठिनाई को दर्शाता है। हम जानते है कि कुछ विद्वानों द्वारा विकसित सिध्दान्त एक ऐसे समाज पर आधाारित है जो व्यक्तिपरक संतुष्टि और स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण से युक्त है। किन्तु भारत की तरह प्राचीन सभ्यताएँ जिन्होंने कई संस्थागत ढाँचे विकसित किये, जो व्यक्ति की अपेक्षा समूह को ज्यादा महत्व देते है और इस प्रकार के स्वच्छन्द अप्रक्रम को स्वीकार नही कर सकते। इसलिये अमर्त्य सेन सामाजिक पसंद की संभाव्यता पर दिये गये अपने नोबल व्याख्यान  (और अन्य व्याख्यानों) में इस पहेली का उत्तर दे चुके हैं। उन्होने कहा था कि --''जब लोग मिश्रित एजेण्डों और वाद-प्रतिवाद के साथ दलों के रूप में इकट्ठे होते है तो समान न्याय के मूल्यों के प्रति अपनी सामान्य प्रवृत्ति की ही भॉति पारस्परिक आदान प्रदान मेंसम्मिलित होते है, सर्वव्यापक असंगति अधिक अच्छे निर्णय के लिये स्थान प्रदान कर सकती है।''उन्होने आगे कहा कि अकाल जैसी राष्ट्रीय आपदा के समय मतदाता पर्याप्त संदेहमुक्त और पूर्णतया दृढ़ हो सकता है। प्रत्युत्तर के बावजूद हमारे राजनीतिज्ञों में से कुछ का व्यवहार शायद कार्पोरेट्स के प्रभाव अनुसार है, वे बदले नही है और बाजारवादी अर्थव्यवस्थाओं की निरंतर नकल कर कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे चुनाव जीतने के लिये चुनाव प्रचार कार्यक्रम तय करने हेतु एक संगत लोकोन्मुखी घोषणा पत्र और कार्यक्रमों की बजाय हार्वर्ड और अन्य बिजनेस स्कूलों से प्रबंध सलाहकारों की नियुक्ति कर रहे है। इसने हमारी चुनाव आधारित राजनीति के तत्वों को बदल दिया है।

               ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चुनावों में कुछ प्रभावशाली खिलाड़ी बाजार कट्टरवादियों द्वारा समर्थित सिध्दांतों को स्वीकार कर रहे है जो उनके एक बार चुन लिये जाने के बाद भारत में प्रासंगिक है और इसलिये वे चुनाव लड़ने के लिये बाजारवादी तरीकों को अपना रहे है। आज राजनीति को लाभदायी निवेश के एक और क्षेत्र के रूप में लिया जाता है। स्वाभाविक रूप से योजनाओं का निर्माण करने और अवधारणाओं को लागू करने,मूल्य निर्धारण,विस्तार और विचारों का प्रसार जो राजनीतिक संवाद की गरिमा बढ़ाते है उन्हे संभव बनाया जाना चाहिये किन्तु अमेरिकन वोटर के विरूध्द भारतीय मतदाता सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आता है, इसलिये उन्हे बाजार की रणनीति से आकर्षित करना ज्यादा अच्छा होता है। मार्केटिंग अर्थशास्त्रियों की पसन्द का विषय नही है। (मैने लोक अर्थशास्त्र को दो दशक पहले पढ़ा था।)। प्रबंध विशेषज्ञ विशेषकर मार्केटिंग गुरूओं की बहुत ज्यादा मांग है। ऐसा लगता है कि उनमें से कुछ तो बार-बार हैदराबाद जाते हैं।(हैदराबाद मार्केटिंग प्रशिक्षण का एक बड़ा केन्द्र है)  वे सामान्यतया जिन रणनीतियों की सलाह देते है उनमें से एक ब्राण्ड का निर्माण करना है जिससे कि ग्राहकों से आसानी से जुड़ा जा सके, चाहे वह मतदाता ही क्यों न हो। ब्राण्ड सिर्फ एक चिन्ह मात्र नही है, वह वादों को पूरा करने से कुछ अधिक है और ग्राहकों को वादे के अनुसार संतोष प्रदान करता है। इसमें विज्ञापन अभियान, किसी आयोजन को प्रायोजित करना, मीडिया के साथ जोड़-तोड़ जिसमें पेड न्यूज, सोशियल नेटवर्क आदि सहित व्यापार में ब्राण्ड बनाने के सामान्य सिध्दान्त शामिल है। हाल के दिनों में यह भी देखा गया है कि जिस प्रकार एक बड़ा बैंकर एक खूबसूरत चेहरे को अपने पास रखता है भले ही फिर उसमें बैंकिंग कुशलता का एक भी तत्व मौजूद नही हो,वह सिर्फ एक मार्केटिंग औजार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसलिये व्यक्तिगत ब्राण्ड जैसे अन्ना, रामदेव, अनेक कार्पोरेट बाबा और फिल्म स्टार्स की राजनीतिक बाजार में जबरदस्त मांग है। विद्वानों ने यह पाया है कि 2004के चुनावों में फील गुड फेक्टर और इंडिया शाइनिंग अभियान भी इसी श्रेणी के अंतर्गत थे। ऐसा लगता है कि सभी राजनीतिक दल जो संसदीय प्रजातंत्र में सक्रिय है, वे सभी मानव ब्राण्ड का निर्माण करने में लगे हुये है। प्रत्येक पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कुछ अच्छे ब्राण्ड बनाने की कोशिश कर रही और सिर्फ कुछ ही है जो क्षेत्रीय स्तर पर इस कोशिश में संलग्न है। कुछ ब्राण्ड बनाये जा चुके है और उन्हे भविष्य के लिये रखा जा रहा है जबकि कुछ ब्राण्ड बाजार के घनत्व के आधार पर अतिरिक्त रूप से उपयोग किये जा रहे है जो एक क्षेत्र में मार्केट घनत्व या मतदाताओं के टर्नआउट के अनुसार उपयोग किये जाते है।राजनीतिक दल अब चुनाव विश्लेषकों की बजाय मीडिया और मार्केटिंग अनुसंधान हाउस पर अधिक विश्वास जता रहे है। यदि वर्तमान चलन भविष्य में भी बना रहता है तो भारत जैसे गरीब देश में मतदाताओं के लिये सुधारवादी घोषणापत्रों को बनाने हेतु राजनीतिक दलों के पास कोई स्थान नही होगा,बल्कि वे ब्राण्ड के साथ ही आत्मसंतुष्ट हो जायेंगे।


? के.एस.चलम