संस्करण: 13 फरवरी- 2012

उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक राजनीति का

कोई भविष्य नहीं  है

? शेष नारायण सिंह

                 उत्तर प्रदेश  विधान सभा चुनाव के पहले दौर के मतदान के बाद तस्वीर कुछ साफ होने लगी है । करीब एक महीने पहले तक माना जा रहा था कि चुनाव में मुकाबले चार मुख्य पार्टियों में  होंगें  लेकिन बीजेपी के चुनावी अभियान के कारण उसके पुराने वोटरों में वह  उत्साह नहीं पैदा हो सका जिसके लिए यह पार्टी जानी जाती है । इस एक राजनीतिक घटना के चलते उत्तार प्रदेश विधान सभा के चुनाव के तरीके, बदल गए हैं । जाहिर है इनका असर नतीजों पर भी होगा।

               उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार जानते हैं कि राज्य में सत्ता  तक पंहुचने के लिए मुसलमानों का समर्थन बहुत जरूरी होता है । इसीलिए सभी राजनीतिक पार्टियों में वोटर को अपनी तरफ खींच लेने की होड़ मची हुई है । गैर बीजेपी पार्टियां अपने को मुसलमानों का सबसे बड़ा शुभचिन्तक बता रही हैं ।  तीन मुख्य राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों के समर्थन के बल पर लखनऊ की सत्ता पर काबिज होने के सपने देख रही हैं । इसके लिए जहां पुराने तरीकों को भी अपनाया जा रहा है तो नए  से नए तरीके भी अपनाए जा रहे हैं ।राज्य की सत्ताधारी पार्टी  की मुखिया ने बहुत बड़ी संख्या में मुसलिम उम्मीदवारों को  टिकट देकर यह माहौल बनाने की कोशिश की है कि वह मुसलमान की असली  शुभचिन्तक हैं ।  कांग्रेस पार्टी  आजादी के बाद से ही मुसलमानों में लोकप्रिय हुआ करती थी। लेकिन 1977 के बाद वह रुख बदला था । 6दिसंबर 1992के बाद तो हालात बिलकुल बदल गए। उसके बाद उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की प्रिय  पार्टी का रुतबा समाजवादी पार्टी  को मिल गया । लेकिन जब समाजवादी पार्टी  ने कल्याण सिंह को साथ ले लिया तो मुसलमानों ने तय कर लिया कि समाजवादी पार्टी उनका ठिकाना नहीं है । उसी एक फैसले के कारण मुसलमानों ने कांग्रेस को फिर एक विकल्प के रूप में देखना शुरू किया। 2009के लोक सभा चुनावों में इस बदलाव का नतीजा भी सामने आ गया जब राज्य में चौथे मुकाम पर पंहुच चुकी कांग्रेस पार्टी ने पहले से बहुत अधिक सीटें जीतने में सफलता पायी।उसके बाद तो कांग्रेस ने बहुत सारे ऐसे काम किये हैंजिससे लगता है कि कांग्रेस 6 दिसंबर 1992 के अपने  काम के लिए शर्मिंदा है और बात को ठीक करना चाहती है । कांग्रेस की सरकार ने जो सच्चर कमेटी बनायी है वह मुसलमान की हालत सुधारने की दिशा में उठाया  गया एक निर्णायक कदम है । सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आ जाने के बाद अब तक प्रचलित बहुत सारी  भ्रांतियों से पर्दा उठ गया है । मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति का प्रचार  करके संघ परिवार और उसके मातहत संगठन हर सरकार पर आरोप लगाते रहते थे कि मुसलमान का अपीजमेंट  किया  जाता है।लेकिन सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद उस तर्क की हवा निकल चुकी है ।इतना ही नहीं ,कांग्रेस की सरकार ने रंगनाथ मिश्रा कमीशन बनाकर  मुसलमानों को सरकारी नौकरियों  में  रिजर्वेशन देने की भी सरकारी पहल को एक शक्ल दे दी।  यू पी ए सरकार ने सरकारी नौकरियों में ओ बी सी कोटे से काटकर साढ़े चार प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण की बात की, तो बात कुछ आगे बढ़ी। कांग्रेस ने इसका खूब प्रचार प्रसार भी किया और  इस साढ़े चार प्रतिशत को मुसलमान का आरक्षण बताने की राजनीतिक मुहिम चलाई ।

                   1992 के बाद से हर चुनाव में  मुसलमानों ने बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए वोट दिया है । हर बार बीजेपी मुख्य रूप से मुकाबले में रहती थी लेकिन इस बार हालात बदल गए हैं । मौजूदा चुनाव में बीजेपी की वह ताकत नहीं है कि उस से डर कर मुसलमान  ऐसी पार्टी को वोट दे जो बीजेपी को हरा सके। बीजेपी ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबले में ही नहीं है। बहुजन समाज पार्टी के बारे में यह  चर्चा पूरे राज्य में सुनने को मिल जाती है कि अगर सरकार बनाने में उसे कुछ सीटें कम पडीं तो वह बीजेपी के समर्थन से सरकार बना लेगी। शायद इसीलिये बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों को टिकट देने के बाद भी आम मुसलमान बहुजन समाज पार्टी को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं मान रहा है। उत्तर प्रदेश में आज मुसलमानों के वोट को हासिल करने के लिए मुख्य रूप से मुकाबला कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच है । कांग्रेस की रणनीति मुसलमान को अपने साथ लेने की है । सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्रा आयोग आदि ऐसे कुछ कार्य हैं जिसके बल पर कांग्रेस अपने आपको  मुस्लिम दोस्त  के रूप में पेश कर रही है ।पार्टी के महासचिव राहुल गांधी कई साल से मुसलमानों से संपर्क बनाए हुये हैं । हर उस ठिकाने पर जाते रहते हैं जिसक सम्बन्ध मुसलमानों  से माना जाता है । चुनाव के ठीक अफ्ले ओबीसी मुसलमानों को साढ़े चार प्रतिशत की बात भी की जा चुकी है । लेकिन समाजवादी पार्टी अभी  भी मुस्लिम वोटों की मुख्य दावेदार के रूप में पहचानी जा रही है। कम से कम समाजवादी पार्टी कोशिश तो यही कर रही है ।  समाजवादी पार्टी के सांसद और पार्टी के मुखिया के परिवार के सदस्य धर्मेन्द्र यादव ने अपनी पार्टी की बात विस्तार से की। जब उनसे पूछा गया कि उत्तार प्रदेश में मुसलमान कांग्रेस को छोड़कर उनकी पार्टी को क्यों वोट दे तो वे फौरन शुरू हो गए। बताया कि राज्य में मुसलमानों को कांग्रेस को किसी कीमत पर वोट नहीं देना चाहिए । उन्होंने आरोप लगाया कि  कांग्रेस हमेशा से मुसलमानों के हित के खिलाफ काम करती रही  है । कांग्रेस ने मुसलमानों के भावनात्मक मुद्दों पर भी गैर जिम्मेदार काम किया है । उन्होंने बाबरी मस्जिद के हवाले से बताया कि कांग्रेस ने हमेशा ही मुस्लिम विरोधी रवैया अपनाया है । उनका आरोप है कांग्रेस ने  बाबरी मस्जिद में 1949 में मूर्ति रखवाई ,1947 में ताला खुलवाया, 1989 में शिलान्यास करवाया  और कांग्रेस नेता और प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने 1992 में बाबरी मस्जिद के विधवंस में भूमिका निभाई। समाजवादी पार्टी का आरोप  है कि कांग्रेस ने मुसलमानों को सरकारी नौकरियों  से बिकुल बेदखल कर दिया। कहते  हैं कि 1947 में सरकारी नौकरियों  में राज्य में 35 प्रतिशत मुसलमान  थे जबकि कांग्रेस  के राज में वह घट कर 2 प्रतिशत रह  गया। धर्मेन्द्र यादव का दावा है कि अगर उनकी पार्टी सरकार में आई तो वे मुसलमानों के  हित में ठोस कदम उठायेगें । उर्दू को तरक्की देगें और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को मह्त्व दिया जाएगा।

                 उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव का संचालन कर रहे पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने समाजवादी पार्टी की बातों को बेबुनियाद बताया । उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी को इतिहास को सही तरह से समझना चाहिए । उन्होंने कहा कि 1949 में फैजाबाद के जिस कलेक्टर ने बाबरी मस्जिद में  मूर्ति रखवाई थी वह बाद में आर एस एस की राजनीतिक पार्टी जनसंघ की ओर से लोक सभा का सदस्य बना। उसने साजिश की थी । उसकी साजिश का नतीजा आजतक पूरा देश भोग रहा है।1992 में बाबरी मस्जिद के विधवंस के लिए निश्चित रूप से प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने आर एस एस की साजिश को समझने में गलती की और बाबरी मस्जिद को तबाह करने की योजना में शामिल उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री  कल्याण सिंह के उस हलफनामे पर विश्वास किया जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था । बाद में कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट और इस देश की जनता के साथ विश्वासघात किया जिस के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सजा दी और कांग्रेस अब तक उस गलती की सजा भोग रही है ।  जहां तक 1947 में 35 प्रतिशत मुसलमानों का सरकारी नौकरी में होने का सवाल है , समाजवादी पार्टी को पता होना चाहिए कि 1947 के बाद बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे। वहां जाने वालों में पढ़े लिखे मुसलमानों की  संख्या सबसे ज्यादा थी। दिग्विजय सिंह कहते हैं कि जबसे सोनिया गाँधी ने कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला है तब से  मुसलमानों के लिए कांग्रेस ने बहुत कल्याणकारी योजनायें चलाईं । उन्होंने दावा किया कि सच्चर कमेटी ,रंगनाथ मिश्रा कमीशन , साढ़े चार प्रतिशत का आरक्षण कुछ ऐसी बातें हैं जिनके बाद मुसलमानों का भविष्य हर हाल में सुधरेगा। कांग्रेस ने मुसलमानों के कल्याण के लिए समर्पित अल्पसंख्यक मंत्रालय की स्थापना करके अपनी मंशा जाहिर कर दी है । दिग्विजय सिंह कहते हैं मुसलमानों के वोट के लिए कोशिश कर रहे मुलायम सिंह यादव  को कुछ सवालों के जवाब देने होंगें । वे कहते हैं वास्तव में यह सवाल बार बार मुसलमानों की तरफ से पूछे जाने चाहिए । वे पूछते हैं  कि कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद से सम्बंधित एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन सजा दी थी, उस सजायाफ्ता कल्याण सिंह के लिए मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी के आगरा अधिवेशन में जिंदाबाद के नारे लगाए थे। कल्याण सिंह के बेटे को अपने साथ मंत्री बनाया और उसी मंत्रिमंडल में उनके खास दोस्त आजम खां साहेब भी थे। 2009 के चुनावों में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा का सदस्य बनवाया और आज भी कल्याण सिंह लोक सभा में मुलायम सिंह की मदद की वजह से ही हैं । साक्षी महाराज बाबरी मस्जिद के विध्वंस अभियुक्त हैं । उनको राज्य सभा में मुलायम सिंह यादव ने ही भेजा था ।दिग्विजय सिंह कहते हैं कि  उन्होंने इस बात पर रिसर्च किया है कि मुलायम सिंह यादव ने कभी भी आर एस एस के खिलाफ बयान नहीं दिया है और मुलायम सिंह यादव  2003 में बीजेपी के साथ एक गुप्त समझौते के तहत मुख्यमंत्री बने थे।  दिग्विजय सिंह के इन आरोपों को टाल पाना मुलायम सिंह यादव के लिए बहुत आसान नहीं होगा।

               मुसलमानों के वोट की तीसरी दावेदार बहुजन समाज पार्टी है । वह पार्टी पिछले पांच साल से राज्य में सरकार चला रही है और उसे कोई वादा करने की जरुरत नहीं है । लोग उसके काम को  साफ देख रहे हैं । जैसा कि आम तौर पर होता है हर सत्ताधारी  पार्टी  को चुनाव में मुश्किल पेश आती है लेकिन मायावती  ने जिस बड़ी संख्या में मुसलमानों को टिकट दिया है उसकी रोशनी  में कहा जा सकता है कि मुसलमानों की आबादी का एक  हिस्सा बहुजन समाज पार्टी को भी  वोट देगा।  इस बात में दो राय  नहीं है कि  उत्तार प्रदेश के मुसलमानों  की संख्या अहम भूमिका निभाने वाली है । आबादी के हिसाब से करीब 19 जिले ऐसे हैं जहां मुसलमानों की  मर्जी के लोग ही चुने जायेगें।इन जिलों में करीब सवा सौ सीटें हैं। रामपुर ,मुरादाबाद, बिजनौर ,मुजफ्फरनगर, सहारनपुर,  बरेली, बलरामपुर, अमरोहा, मेरठ , बहराइच और श्रावस्ती में मुसलमान तीस प्रतिशत से ज्यादा हैं । गाजियाबाद,लखनऊ , बदायूं, बुलंदशहर, खलीलाबाद पीलीभीत, आदि कुछ ऐसे जिले जहां  कुल वोटरों का एक चौथाई संख्या मुसलमानों की है । जाहिर है कि कोई  भी पार्टी लखनऊ में सरकार बनाए वह सेकुलर सरकार ही होगी, लगता है कि उत्तार प्रदेश में मौजूदा चुनाव के नतीजे ऐसे होगें कि आने  वाले वक्त में यहाँ साम्प्रदायिक राजनीति कर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

? शेष नारायण सिंह