संस्करण: 13 फरवरी- 2012

इमेज बिल्डिंग का ठेका

या इमेज ध्वस्त करने की सुपारी

? मोकर्रम खान

                1990 में अंग्रेजी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक कंपनी बना ली, 'इमेज बिल्डिंग फाउंडेशन' काम था किसी भी राजनेता की इमेज बनाना।वह बड़े बड़े नेताओं की इमेज सुधारने का बाकायदा ठेका लेते थे फिर प्रिंट तथा इलेक्ट्रा निक मीडिया की सहायता से उस राजनेता की अच्छाइयों का बखान करते।जनता की याददाश्त थोड़ी कमजोर होती है।  लोग अखबारों तथा टी0वी0 में नेता जी की बार बार फोटो देखते और उनकी महिमा का बखान सुनते तो उनका काला इतिहास भूल कर उन्हें  भविष्य  का मसीहा समझने लग जाते।  नेता जी के चुनाव जीतने में इस इमेज बिल्डिंग का बड़ा हाथ रहता। पत्रकार महोदय को भी इस कार्यक्रम से काफी फायदा हुआ।कई बड़े नेता उनके क्लायंट बन गये, नित नये चेक और बैंक ड्राफ्ट आने लगे।उस दौर में पत्रकारिता इतनी ज्यादा बिकाऊ नहीं थी कि पत्रकार सड़क पर ही सेल का बोर्ड लगा दें इसलिये कई पत्रकारों ने उन पत्रकार महोदय पर बिकाऊ होने तथा पैसे ले कर किसी व्य क्ति विशेष के पक्ष में लिखने का आरोप लगाते हुये उनकी आलोचना शुरू कर दी। हार कर उन्होंने अपनी कंपनी बंद कर दी। आज स्थिति ठीक इसके विपरीत है। अब प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक बड़ा वर् इसी काम में लगा हुआ है।  पैसे ले कर किसी की इमेज बनाओ या उसके विरोधी की इमेज बिगाड़ो, कोई पैसे न दे तो उसकी इमेज पर हमला कर दो। अब इमेज बिल्डिंग फाउंडेशन नहीं, इमेज कारपोरेशन हैं।  ऐसे लोगों ने एक अघोषित काट्रेल बना कर इसे एक फेडरेशन का रूप दे दिया है जो किसी की इमेज बनाने का ठेका भी लेता है और किसी की इमेज ध्वस्त करने की सुपारी भी।

                हाल में एक निजी टी0वी0 चैनल ने सर्वे कराया और घोषित कर दिया कि नरेंद्र मोदी को 17: लोग प्रधान मंत्री के रूप में पसंद करते हैं जबकि उनके गुरु आडवाणी को केवल 10% लोग। राहुल गांधी को 13% लोग प्रधान मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं तो मनमोहन सिंह को केवल 10%। इस सर्वे से कांग्रेस को कोई अंतर नहीं पड़ता है क्योंकि यह सर्वविदित है कि यदि कांग्रेस फिर से सत्ता में आई तो अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधा ही होंगे। इस पर किसी को अपना दिमाग खर्च कर शोध करने की आवश्यतकता नहीं है।  मनमोहन सिंह राजनीतिक तिकड़मों से अनभिज्ञ, सोनिया गांधी के ' मोस्टर ओबिडियेंट प्यूंपिल ' हैं, उनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं है। वे केवल हाइकमान के आदेशों को शिरोधार्थ करते हैं।  ऐसा लगता है कि यह सर्वे या तो नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ाने का ठेका है या आडवाणी को कंपलसरी रिटायरमेंट देने की सुपारी क्यों कि इस सर्वे के प्रकाशित होने से उत्साहित हो कर नरेंद्र मोदी ने अपनी दबी हुई इच्छा को सार्वजनिक कर दिया कि वे प्रधाान मंत्री बनना चाहते हैं। इससे भाजपा में बवाल मच गया है। कुछ बड़े नेता यह कह कर मोदी की बातों का खंडन कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह पार्टी तय करेगी।  भाजपा के एक वरिष्ठ  नेता जो भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री भी हैं, ने तो यहां तक कह दिया कि यह संबंधित चैनल तथा नरेंद्र मोदी के बीच की बात है।  पिछले वर्ष विकीलीक्स ने खुलासा किया था कि अगले आम चुनावों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर होगी तथा भाजपा की मजबूत और यदि भाजपा को बहुमत मिल गया तो नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री पद के सशक्त दावेदार होंगे। उस समय पहले तो कांग्रेस की पराजय सुनिश्चित मान कर भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रसन्न हुये किंतु थोड़ी ही देर में उन्हें होश आ गया कि अगर उनसे बरसों जूनियर नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बन गये तो उन लोगों का क्या होगा क्योंकि परिवार विहीन मोदी जिस तरह गुजरात में हिटलर की भूमिका निभा रहे हैं, वही निरंकुशता वाला व्यवहार केंद्र में भी अपनायेंगे। फिर भाजपा का अर्थ होगा नरेंद्र मोदी और केवल नरेंद्र मोदी, हाई कमान, शासक, प्रशासक, सभी कुछ वही होंगे। इसीलिये विकीलीक्स के खुलासे पर तालियां पीटने वाले नेताओं तथा नेत्रियों ने फौरन रणनीति बदली।  कल तक गुजरात नरसंहार (दंगे) मामले में मोदी के पक्ष में चट्टान की तरह खड़े रहने वाले नेताओं ने मोदी के पर कतरने शुरू कर दिये। गुजरात में वास्तव में मोदी नीरो के रूप में जाने जाते हैं, भयवश कोई भी उनके विरुध्द बोलने का साहस नहीं कर सकता।  इसी स्थिति का लाभ उठा कर उनके समर्थक तथा अभिभावक आरएसएस उन्हें हीरो मानते हैं तथा उन्हें  देश के अगले भाग्य  विधाता के रूप में प्रचारित करते हैं किंतु मोदी की इस नीरोवादी छवि के कारण उन्हें  गुजरात के बाहर कहीं भी प्रदर्शित नहीं किया जाता।  बिहार में पिछले विधान सभा चुनावों के दौरान पोस्टर में मोदी की तस्वीर छप जाने पर नीतीश इतने नाराज हो गये थे कि भाजपा नेताओं का डिनर ऐन वक्त  पर कैंसिल कर दिया और भाजपा से गठबंधन तोड़ देने की धमकी तक दे डाली। गुजरात के हीरो (नीरो) बिहार की धरती पर कदम भी नहीं रख सके किंतु बिहार विधान सभा चुनावों में नीतीश की पार्टी ने भारी सफलता हासिल की और उन्हीं के सौजन्य से भाजपा को भी बिहार में पहले से अधिक सीटें मिलीं।  तब भाजपा नेताओं को समझ में आया कि नीरोवादी छवि वाले मोदी के प्रचार में उतरने से वोटों का नुकसान ही होगा फायदा नहीं।

                 नरेंद्र मोदी को टी0वी0 चैनल ने मात्र 17 प्रतिशत वोटों के साथ प्रधान मंत्री पद का दावेदार बताया है किंतु क्या केवल 17 प्रतिशत लोगों की पसंद का व्यक्ति देश की 100 प्रतिशत जनता पर शासन कर सकता है। यदि टी0वी0 चौनलों को ज्योतिषाचार्य तथा देश का भाग्य निर्माता मान लिया जाय तो 2009 में सभी ने भविष्यवाणी कर दी थी कि भाजपा ही जीतेगी। आडवाणी को पी0एम0 इन वेटिंग घोषित कर दिया गया था। जीवन के नौवें दशक में चल रहे आडवाणी ने अपने आपको युवा दिखाने के लिये जिम में मुगदर भांजना शुरू कर दिया था और मनमोहन सिंह को ताल ठोक कर अखाड़े में उतरने के लिये ललकारने लगे थे। ऐसा लगने लगा था कि चुनाव की केवल औपचारिकता शेष थी।  सीधे सादे मनमोहन सिंह ने भी अपना कार्यकाल समाप्त मान, सामान पैक कर प्रधान मंत्री निवास से जाने की पूरी तैयारी कर ली थी परंतु जब चुनाव परिणाम आये तो सब कुछ उलटा ही हुआ। आडवाणी का वेटिंग टिकट केवल आर0ए0सी0 तक पहुंचा, कंफर्म नहीं हो पाया, मनमोहन सिंह को एक्सटेंशन मिल गया। यह सर्वे किसी राजनीतिक शरारत का परिणाम भी हो सकता है क्योंकि लोकसभा चुनाव में अभी 2 वर्ष बाकी हैं, इतना पहले प्रधान मंत्री का अनुमान लगाने के लिये सर्वे कराने का क्या उद्देश्य है। संभवत: यह कि जनता भली भांति समझ ले कि भाजपा के पास अटल बिहारी बाजपेई जैसा सौम्य  चेहरा जो नरसंहार देख कर आंसुओं से तर हो जाता था, अब एक भी नहीं बचा है। अब जो चेहरे हैं वे संवेदनहीन खूंखार चेहरे हैं जो नरसंहार देख कर दुखी नहीं होते रोमांचित एवं प्रफुल्लित होते हैं तथा नरसंहार को जस्टीफाइड बताते हैं।  उत्तार प्रदेश मंद विधान सभा चुनाव हो रहे हैं।  यह वह प्रदेश है जहां से केंद्र की सत्ताा का रास्ता जाता है। इस प्रदेश ने  देश को अधिकतम प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्य पाल तथा प्रशासनिक अधिकारी दिये हैं। जो यहां जौहर दिखायेगा, वही केंद्र की सत्ता का प्रबल दावेदार होगा। भाजपा ने स्वयं कांग्रेस की राह आसान कर दी है।  भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोगों को पार्टी में प्रवेश दे कर जनता में अपनी किरकिरी कराई और पार्टी में बगावत को भी निमंत्रण दिया।  उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या  चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं इसी कारण सभी पार्टियां अपने अपने तरीकों से मुसलमानों को रिझाने में लगी हैं। कांग्रेस ने मुसलमानों को आरक्षण का दाना डाला किंतु भाजपा ने मुस्लिम आरक्षण का विरोधा किया। संभवत इस आशा में कि मुस्लिम विरोध से हिंदू मतों का भाजपा के पक्ष में धृवीकरण हो जायगा, किंतु ऐसा होने की संभावना नगण्य  है।  भाजपा ने विकास के एजेंडा को प्राथमिकता देने के बजाय एक बार फिर मंदिर का मुद्दा उछाल दिया है। कट्टर हिंदूवादी भी इस बात से नाराज हैं कि भाजपा केवल चुनावों के समय ही राम नाम जपती है, सत्ता मिल जाने पर राम नाम की माला तकिये के नीचे रख कर सो जाती है। हिंदू मतों के धृवीकरण की आस में जनता को बाबरी मस्जिद विध्वंस की यादें ताजा कराने के उद्देश्य से राजनीतिक वनवास भोग रही साध्वी उमा भारती को मध्य प्रदेश से इंपोर्ट कर सीधे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट  कर दिया गया किंतु शायद भाजपा नेताओं को यह याद नहीं रहा कि बाबरी विध्वंस के बाद लगभग सारे देश में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुये थे जिनमें केवल मुसलमान ही नहीं मारे गये थे। बहुत से हिंदुओं ने भी धन, धर्म तथा प्राण गंवाये थे।  लोगों का आपसी विश्वास तथा सांप्रदायिक सौहार्द दंगों की भेंट चढ़ गये।  दोनों संप्रदाय शंका, आशंका तथा भय के वातावरण में जीने को विवश हो गये।  ऐसे वातावरण में मनुष्यथ का जी पाना कितना कठिन है, इसका अनुमान राजनीति की रोटियां सेंक रहे नेताओं को नहीं हो सकता।  इस पीड़ा का अनुभव वे ही कर सकते हैं जिन्होंने इस विभीषिका को भोगा है।  अब कोई हिंदू भी दंगा फसाद, सांप्रदायिक तनाव या वैमनस्य नहीं चाहता।  भाजपा इस सत्य को अंगीकार करने को तैयार नहीं है।  आरएसएस तथा भाजपा के कुछ नेताओं को यह भ्रम है कि इस देश का हर हिंदू धार्मिक कट्टरवाद का समर्थक तथा पोषक है और इस देश से अल्पससंख्यंकों का उन्मूलन करना चाहता है।  यदि यह सत्य  होता तो 2002 के गुजरात दंगों के बाद हुये चुनावों में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की दुर्गति न होती, न ही भाजपा के ग्राफ गिरने की अनवरत प्रक्रिया प्रारंभ होती।  यदि देश का हर हिंदू कट्टरवाद का समर्थन करता तो भाजपा का डाउनफाल नहीं होता बल्कि उसे केंद्र की सत्ता का स्थाई पट्टा मिल गया होता।

? मोकर्रम खान