संस्करण: 13 फरवरी- 2012

क्या मध्यप्रदेश सरकार

सरस्वती को न्याय दिलायेगी ?

? डॉ. गीता गुप्त

               यह आश्चर्य ही नहीं, अत्यंत दु:ख की बात है कि 39 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश की राजधानी से सटे होशंगाबाद शहर की जिस बालिका ने अपनी जान पर खेलकर 150लोगों की जान बचायी और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जिसे दिल्ली आमन्त्रित कर वीरता का पदक देकर सम्मानित ही नहीं किया वरन् पुरस्कार स्वरूप दस एकड़ जमीन, आजीवन मुफ्त रेल यात्रा, पेंशन और  रहने के लिए शहर में मकान उपलब्ध कराने के आदेश दिये, उसे आज तक न तो ज़मीन मिली है और न ही मकान।

               यह निश्चय ही लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है जिसमें प्रत्येक नागरिक राज्य और देश की सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा की आशा करता है। यहां तो सरस्वती को उसके अधिकार से ही वंचित कर दिया गया। वह आज तक न्यायालय में अपने अधिकार के लिए लड़ रही है। यह भी विडंबना ही है कि जिस न्यायालय में उसका प्रकरण चल रहा है, उसी के सामने वह ठेले पर सब्जियां बेचकर अपना और परिवार का भरण पोषण करती है।

               उल्लेखनीय है कि सन् 1973 में अत्यधिक वर्षा के कारण होशंगाबाद शहर एकाएक बाढ़ की चपेट में आ गया था। तब 15वर्षीया अपाहित सरस्वती ने मृत्यु की परवाह न करते हुए उफनती नर्मदा के बीच से 150लोगों को सुरक्षित निकाला। एक छोटी नौका के सहारे 150लोगों को एक-एक करके निकालने में उसे नौ घंटे लगे। परंतु उसने हौसला नहीं खोया। उसके इस साहसिक कार्य को सेना के जवानों द्वारा कैमरे में उतारा गया और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को दिखाया गया था। उसकी वीरता से प्रभावित होकर इन्दिराजी ने उसे दिल्ली बुलवाकर सम्मानित किया और पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की, जो उसे अद्यपर्यन्त नहीं मिला। बरस दर बरस बीतते चले गए। सरकारें आती-जाती रहीं, पर न तो केन्द्र ने सरस्वती की सुध ली, न ही राज्य सरकार ने। सरस्वती ने अफ़सरों, राजनेताओं और न्यायालय के भी द्वार खटखटाये मगर उसे निराशा ही मिली।

               आश्चर्यजनक बात यह है कि मधयप्रदेश सरकार द्वारा सरस्वती जैसी साहसी नवयुवती को तत्काल पुरस्कृत नहीं किया गया और सन् 1973 से अब तक प्रदेश में प्रकाशचन्द्र सेठी, श्यामाचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर और अब शिवराज सिंह चौहान जैसे यशस्वी और संवेदनशील मुख्यमंत्री हुए मगर किसी का भी धयान प्रधानमंत्री के निर्देश की ओर नहीं गया। मुख्य सचिवों ने भी कभी सरस्वती को उसका हक़ दिलाने की पहल नहीं की तो इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाये ? 39 वर्षों में मधयप्रदेश में जो भी सरकारें रहीं, सबने प्रधानमंत्री के आदेश की अवमानना की। अन्तत: उनकी घोषणा को पूरा करने का दायित्व राज्य सरकार का भी है। हालांकि केन्द्र को भी ख़बर लेनी चाहिए थी कि आदेश पर अमल हुआ अथवा नहीं ? निस्संदेह, मीडिया ने भी सरस्वती की अनदेखी की, वर्ना चार दशक तक मामला अनसुलझा न रहता।

                बहरहाल, सरस्वती ने इतने वर्षों तक जो अपमान झेला और संघर्ष किया है, उसकी भरपाई कोई सरकार नहीं कर सकती। लेकिन अब जब यह प्रकरण उजागर हुआ है तो प्रदेश सरकार को अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए अविलम्ब इस मामले का पटाक्षेप करना चाहिए। 'स्त्री सशक्तिकरण' और ' बेटी बचाओ' अभियान चलाने वाली मधयप्रदेश सरकार को चाहिए कि वह सरस्वती का सार्वजनिक सम्मान करे तथा उसे ज़मीन व मकान सहित वे सारी सुविधाएं भी उपलब्ध करवाये जिनकी घोषणा पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी द्वारा की गई थी। वैसे भी मुख्यमंत्री मातृशक्ति की दुहाई देते नहीं थकते। प्रदेश की लाड़लियों के लिए उन्होंने अनेक योजनाएं लागू की हैं। वे समूचे प्रदेश की बच्चियों के 'मामा' है। तो क्या सरस्वती जैसी वीरांगना को अब भी अपमान सहना होगा ?

                  यदि प्रदेश सरकार सचमुच संवेदनशील है तो अब अविलम्ब सरस्वती को उसका हक़ मिल जाना चाहिए। आख़िर क्रिकेटरों और अन्य खिलाड़ियों के लिए भी मुख्यमंत्री ने दरियादिली दिखाते हुए सम्मान राशि लुटायी है, तो सरस्वती को वाज़िब हक़ देकर सरकार 39 बरस पुरानी भूल का प्रायश्चित चाहे तो कर सकती है। क़ायदे से तो उसे उन लोगों को दण्डित भी करना चाहिए जो सरस्वती जैसी वीरांगन के अपराधी हैं। क्योंकि उनकी लापरवाही के कारण ही एक स्त्री को इतने लम्बे समय तक अपने सम्मान की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

               फिलहाल एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक समाचारपत्र द्वारा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नाम पत्र प्रकाशित कर सरस्वती को न्याय दिलवाने की मांग की गई है। मैं भी प्रदेश सरकार से अपील करती हूं और चाहती हूं कि प्रदेश के मुखिया तक यह दास्तान पहुंचे और सरस्वती की कहानी का सुखांत हो। उसे न्याय मिले, तभी प्रदेश की महिलाओं को यह आश्वस्ति होगी कि सचमुच प्रदेश सरकार स्त्री सशक्तिकरण हेतु प्रतिबध्द है।

               
? डॉ. गीता गुप्त