संस्करण: 13 फरवरी- 2012

म.प्र. में मौत को गले लगाते किसान?

? डॉ. सुनील शर्मा

                 कर्ज से परेशान किसान ने पिया-कीटनाशक? सिंचाई व्यवस्था न होने से परेशान किसान ने की आत्महत्या का प्रयास किया? पाला और ओलों से बर्बाद हुई फसल के गम में किसान ने फाँसी लगाई? म.प्र.में ऐसी खबरें अब रोज की खबर बन रही है।कहीं खेत में खड़ी फसल बर्बाद होने पर तो कहीं कर्ज से परेशान किसान मौत को गले लगा रहें है। पिछले एक सप्ताह में प्रदेश के दमोह, छतरपुर, मण्डला और बैतूल जिलों में किसानों के द्वारा उठाए आत्मघाती कदम चर्चा में हैं। दमोह जिले के पथरिया के मोहनपुर ग्राम की एक महिला किसान ने पाला पड़ने से बर्बाद फसल के गम में कीटनाशक पीकर जान देने की कोशिश की। यह महिला किसान कौशल्या रानी फसल बर्बादी के साथ बैंक के तीन लाख रूपये के कर्ज से हैरान थी।  इससे पहले दमोह के ही छेबलादुबे गॉव के किसान भगवान दास ने भी पाले से बर्बाद फसल के चलते आत्महत्या कर ली थी। बैतूल जिले के डोमाढाना गॉव के आदिवासी किसान राजू ने खेत में पानी की व्यवस्था न होने से बर्बाद होती फसल के गम में आत्महत्या का प्रयास किया,बैतूल जिले का यह आदिवासी किसान अपने खेत में पानी की व्यव्स्था कराने के काफी प्रयास कर चुका था,लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक नाकामी के चलते वह अपने खेत में पानी नहीं ला पाया। छतरपुर जिले के बक्स्वाहा इलाके के किसान कमलेश साहू ने पाले से अपनी सात एकड़ की फसल बर्बाद होने से कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली,इस किसान पर चार लाख रूपये का कर्ज भी था। मण्डला के महाराजपुर क्षेत्र के किसान सुग्रीव ने भी फसल की बर्बादी के चलते मौत को गले लगा लिया ।उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ सालों से म.प्र.में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के मामलों का ग्राफ लगातार बढ़ा है।प्रदेश में कभी बारिश तो कभी तुषार तो कभी बाजार किसान को बर्बाद कर देता है और फिर चहुॅओर से निराश किसान मौत का रास्ता पकड़ लेता है। प्रदेश में लगातार बढ़ रहे किसान आत्महत्या के मामलों पर प्रदेश के मानवाधिकार आयोग का मानना है कि प्रदेश में बढ़ते भ्रष्टाचार से परेशान किसान आत्महत्या करने मजबूर है। जहॉ एक ओर प्रकृति की बेरूखी तो दूसरी ओर सुल्तानों की मनमानी और भ्रष्टाचार। किसान इस दो तरफा मार से त्रस्त होकर आत्महत्या करने को आसान समझ रहा हैं।

                अगर प्रश्न है कि क्या किसानों को आत्मघाती कदम उठाने से रोका जा सकता है? तो निश्चित रूप से इसका उत्तर हॉ में ही होगा। क्योंकि किसानों के द्वारा उठाए जा रहे आत्मघाती कदमों के कारण सबके सामने है। निश्चित रूप से  मौसम और प्रकृति के बेरूखी से फसल की बर्बादी और बढ़ता कर्ज किसान को आत्महत्या की ओर अग्रसर करता है। अगर फसल बर्बाद हुई तो किसान को समय पर और उचित मुआवजा मिलने की उम्मीद बने तो किसान अपनी जान क्यों देगा। लेकिन जब किसान को अपनी बर्बाद हुई फसल के नुकसान की भरपाई की कोई आशा नजर नहीं आती है, साथ ही बढ़ते कर्ज का दंश उसे झकझोरता है तो उसे कीटनाशक ही नजर आता है। क्योंकि वर्तमान व्यवस्था के चलते मुआवजे के लिए किसान को राजस्व अमले की कृपा पर आश्रित रहना पड़ता है,प्रकृति की बेरूखी से नष्ट फसल के मुआवजे का आंकलन पटवारी और तहसीलदार करते हैं, अगर इनकी नजर तिरछी हुई तो मुआवजे में पचास रूपये चैक मिलना तय। अगर पटवारी नाराज तो किसान का कुछ नहीं हो सकता है पटवारी कहेगा कि खेत में ओले गिरे तो गिरे नहीं तो नहीं,पटवारी कहेगा कि खेत में इल्ली है तो है। नहीं तो नहीं,तहसीलदार भी उसी की मानेगा और सरकार तहसीलदार की। क्योंकि पटवारी ही उसकी सारी व्यवस्था की कुंजी हैं। मौसम की बेरूखी से बर्बाद फसल का आंकलन भी सरकारी स्तर तब ही होता है जबकि बड़े क्षेत्र में सामूहिक बर्बादी हुई हो। ऐसे में छोटे रकबे में फसल बर्बादी का किसान को कोई मुआवजा नहीं मिल पाता है। फसल बीमा जैसी योजना का पर भी प्रदेश सरकार की कोई गंभीरता नजर नहीं आती है। जहॉ तक कर्ज  की बात है तो किसान और कर्ज एक दूसरे के पर्यायवाची ही प्रतीत होतें है। फसल की बढ़ती लागत और मॅहगें होते खाद बीज तथा मजदूरी की दरों से किसान कर्जग्रस्त होता जा रहा है और फसल की बर्बादी उसे डिफाल्टर और दण्ड ब्याज का भागीदार बना देती है। जिससे उसके उपर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जाता है। बैंको के क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था भी उसे राहत नहीं दे पाई है क्योंकि पहले तो इसकी प्राप्ति ही कठिन है इसके लिए किसान को पटवारी और बैंक अधिकारी के साथ दलालों के चक्कर और चढ़ौत्री करनी पड़ती है। फिर साल दर साल नवीनीकरण और ब्याज पर ब्याज। इसके साथ ही क्रेडिट कार्ड के जरिए मिलने वाले कर्ज ने किसान को फिजूल खर्ची बना दिया है।

               वर्तमान व्यवस्था ने किसान को राजस्व विभाग और बैंक कर्मचारियों की मर्जी पर चलने मजबूर किया है। भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारियों के लिए किसान आसान शिकार होतें हैं क्योंकि खेती में हर कार्य समय आधारित होता है अत:किसान मजबूरीवश अधिकारी और कर्मचारियों को रिश्वत देता है ताकि उसे समय पर बीज खाद और ऋण मिल सके,उसकी नष्ट हुई फसल का उचित मुआवजा मिल सके। लेकिन पटवारी से लेकर तहसीलदार और बैंक अधिकारी सभी किसानों को चप्पल रगड़वाने में माहिर हैं। वास्तव में प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के लगातर बढ़ते मामले सरकार और प्रशासन की नाकामी को व्यक्त करता है। अगर किसान का फसल नष्ट होने पर सही और समय पर मुआवजा मिलने की उम्मीद होती तो वे क्यों आत्महत्या करते? वास्तव में सरकारी तंत्र किसानों को कर्ज की व्यवस्था करने और ऋणमुक्ति के प्रावधान जैसे कार्यो में तो असफल साबित हुआ है। साथ साथ फसल बर्बादी के समय उसे राहत के लिए आश्वस्त करने में असफल रहा है।


? डॉ. सुनील शर्मा