संस्करण: 13 फरवरी- 2012

क्या संभव है सफेद शेरों की घर वापसी ?

? प्रमोद भार्गव

                 पांच दशक बाद दुर्लभ सफेद शेरों के घर वापसी की तैयारी लगभग पूरी है। इनके पुनर्वास के लिए करीब 50 करोड़ रूपए वन विभाग खर्च करने जा रहा है। इस हेतु सफेद और पीले शेरों के एक-एक जोड़े ओड़ीशा के नंदनकानन वन से यहां लाकर बसाए जाएंगे। इसका दायित्व नंदनकानन उद्यान को आकार देने वाले सेवानिवृत्त पीसीसीएफ सीपी पटनायक ने संभाला है। यहां अचरज इस बात पर है कि जब रीवा के जंगलों में पहली बार सफेद शेर देखा गया था, तब बिना किसी आधुनिक तकनीक और अतिरिक्त धन राशि खर्च किए रीवा के महाराजा गुलाब सिंह ने इनकी वंश वृध्दि कर ये शेर पूरे भारत और दुनिया के तमाम देशों में पहुंचा दिए थे। किंतु अब करोड़ों की परियोजना बनाई गई है। भारत में सिंह, चीता, बाघ, हाथी और अब सफेद शेर के पुनर्वास जैसी जितनी भी योजनाएं इन्हें प्राकृतिक आवास देने की बनाई गईं हैं दो दशक बीत जाने के बावजूद एक भी योजना पर सफलतापूर्वक अमल नहीं हो सका है। जबकि अरबों रूपए इन पर खर्च हो चुके हैं। इनमें से कूनो-पालपुर अभयारण्य में सिंह और फिर चीता बसाए जाने की नाकाम योजना प्रमुख है। जबकि सिंहों के लिए 24 आदिवासी ग्राम एक दशक पहले उजाड़े जा चुके हैं और उनका उचित पुनर्वास आज तक नहीं हुआ है।

               एक समय रीवा-सीधी के वन खण्ड़ों में सफेद शेरों की दहाड़ अकसर सुनाई देती रहती थी। विंध्याचल की कैमूर पर्वत श्रृंखला के सघन वनों में दुनिया के दुर्लभ और अद्वितीय वन्य प्राणी सफेद शेरों का प्राकृतिक आवास और क्रीड़ा स्थल था। पर अब इस आदिम वन प्रांत में सफेद शेर एक गौरवशाली अतीत बनकर रह गया है। रीवा, सीधी और शहडोल के हजारों वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र में इनका आवास था। इसे इन्हीं जंगलों में पहली बार अनायास ही देखा गया था। 1951 में सीधी जिले की गौपद-बनास तहसील में शेर-शेरनी का एक जोड़ा नरभक्षी हो गया था। इस जोड़े का उत्पात कैमूर-केहचुआ के जंगलों के आसपास बसे गांवों में जारी था। लाचार प्रजा ने प्राण बचाने के लिए राज-दरवार गुहार लगाई। तब इन नरभक्षी शेरों का सफाया करने के लिए रीवा नरेश गुलाब सिंह और उनके पुत्र मार्तण्ड सिंह जूदेव ने 'बरगड़ी-शिविर' लगाया।

               नरभक्षी शेरों की टोह में भटकते हुए 27 मई 1951 को महाराजा गुलाब सिंह को एक पीले रंग पर काली पट्टी वाली शेरनी मिली। इसके साथ नौ माह के चार बच्चे भी थे। इनमें तीन बच्चे तो सामान्य थे, लेकिन एक बच्चा सफेद चमड़ी का था। जिस पर भूरी पट्टियां थीं। रीवा महाराज ने इस अद्भुत प्राणी को पिंजरे में कैद करवा लिया। इस सफेद शेर शावक का नाम 'मोहन'रखा और इसकी वंश वृध्दि के लगातार प्रयास किये गए। किंतु कामयाबी नहीं मिली।

               रीवा नरेश ने दूरदृष्टि से काम लेते हुए पीले रंग की सुकेशी नाम की एक शेरनी भी सफेद शेर के साथ गुतगू के लिए छोड़ दी। जल्दी ही इस जोड़े में अंतरंगता कायम हो गई और इस जोड़े ने तीन बार बच्चे जने, लेकिन सभी बच्चे साधारण ही निकले। सफेद शेर की नस्ल बचाने के लिए रीवा महाराज गुलाब सिंह और मार्तण्ड सिंह ने सुकेशी को मोहन से अलग कर दिया तथा मोहन और सुकेशी से उत्पन्न एक शेरनी से पैदा शेरनी 'राधा' को मोहन के पास छोड़ दिया। राधा और मोहन के संगम से अक्टूबर 1958 में चार सफेद शावकों का जन्म हुआ। बाद में इसी जोड़े से 1960 में तीन बच्चे और पैदा हुए। इनमें दो सफेद और एक पीला था। 1952 में फिर इनके दो बच्चे हुए और दोनों ही सफेद ! इस तरह सफेद शेरों की वंश वृध्दि होती गई और ये रीवा सीधी से निकल कर पूरी दुनिया में पहुंचे। विश्व में पाए जाने वाले सभी सफेद शेर इसी मोहन के वंशज हैं। इस तरह इस दुर्लभ प्राणी के वंश की वृध्दि कोई अतिरिक्त धन राशि खर्च करने की बजाए व्यावहारिक एवं पारंपरिक आनुवांशिक ज्ञान से संभव हुई।

               रीवा महाराज ने सफेद शेर का एक बच्चा अमरीका के राष्ट्रपति आइजन हॉवर को भेंट किया था। जून 1963 में चंपा-चमेली सफेद शेरों का जोड़ा इंग्लैंड पहुंचाया गया। कोलकाता के चिड़ियाघर को भी नीलाद्रि और हिमाद्रि नाम का एक जोड़ा दिया गया। राधा-मोहन से पैदा हुए बाकी शावकों को दिल्ली के चिड़ियाघर में भेज दिया गया। लेकिन रीवा महाराज ने राधा-मोहन और सुकेशी को जीवनपर्यंत अपने पास रखा। इस तरह इस अद्भुत प्राणी का विस्तार होता गया और इसकी संख्या चिड़ियाघरों में बढ़कर 70 हो गई थी, पर वनाधिकारियों की लावरवाही के चलते इनकी संख्या घटने लगी। हालांकि सफेद शेरों की मातृभूमि दुहिया घाटी (सीधी) में वन विभाग ने आज भी ऐसा बोर्ड सड़क किनारे लगा रखा है कि इन जंगलों में सफेद शेर अभी भी उपलब्ध हैं। पर यह पर्यटकों और वन प्रेमियों के साथ छलावा है। दुर्लभ सफेद शेर की नस्ल तो इन वनों में बची ही नहीं है, साधारण बाघ के दर्शन होना भी दुर्लभ  है।

               इन जंगलों से शेरों का विनाश करने की नादानी भी इन्हीं राजा-महाराजाओं ने की जो बाद में इनकी वंश वृध्दि के लिए प्रयत्नशील देखे गए। शिकारगंज नौठिया (सीधी) और बांधवगढ़ (शहडोल) के शिकारगाहों में शेरों का शिकार करना एक होड़ थी। इसी होड़ के चलते वेंकट रमणसिंह जूदेव ने 1913 तक 111 शेर मारे। गुलाब सिंह ने 1923-24 तक 144 शेर मारे। इनमें 83 शेर तो केवल 1923 में ही मार गिराये थे। मार्तंड सिंह ने 1952-53 तक 125 शेर मारे।

               रीवा राज्य-दर्पण के अनुसार सन् 1935 में सीधी के जंगल से महाराजा वैंकटरमण सिंह ने एक सफेद शेर पकड़ा और उसे अंग्रेजों को भेंट किया। 1937 में महाराज गुलाब सिंह द्वारा एक सफेद शेर का शिकार किया जाने का उल्लेख दर्ज है। 1944 में रीवा के पास प्रशासक जेल्डरिज ने भी एक सफेद शेर का शिकार किया। 1946 में महाराजा मार्तण्ड सिंह ने भी एक सफेद शेर को मार गिराकर अपने शिकार के शौक की पूर्ति की। चुरहट तहसील के जमुनिहा गांव के निकट ही 10 फीट लंबे एक सफेद शेर के मार गिराने की घटना रीवा गजट में दर्ज है। ये शिकारगाह राजाओं, जागीरदारों और उनके विशिष्ट मेहमानों व अंग्रेज अधिकारियों के लिए ही आरक्षित थे। शिकार की इन्हीं खुली प्रतिस्पर्धाओं के चलते इन जंगलों से सफेद शेरों का विनाश 'वन और वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972' के अमल में आने से पहले ही हो चुका था। बाघ भी बचे तो इक्का-दुक्का।

               वंश-विनाश की इन्हीं क्रूरताओं के चलते मध्य-प्रदेश में पैदा होकर दुनियाभर में पहुंचे सफेद शेर खुद मध्य प्रदेश के लिए ही एक इतिहास बनकर रह गए हैं। भोपाल के वनविहार राष्ट्रीय उद्यान में 19 जून, 1991 को रेशमा नाम की इकलौती सफेद शेरनी की हत्या श्यामू नाम के पीले शेर ने कर दी थी। उसके बाद एक नर सफेद शेर रह गया था, रूस्तम। प्राणी विशेषज्ञों ने रूस्तम और रेशमा की वंश वृध्दि के प्रयास लगातार तीन साल किए। इसी कोशिश में पीले रंग के शेर श्यामू और रेशमा को आसपास रखा गया था, जब विशेषज्ञों को लगा कि दोनों में प्यार हो गया है तो 19 जून 1991 को इनके बीच की जाली हटा दी गई। जाली हटी तो रेशमा, श्यामू के निकट आई और श्यामू ने लपक कर उसकी गर्दन अपने जबड़ों में जकड़ ली। दो-मिनट तक गर्दन मुंह में दबाये रखने के बाद श्यामू ने रेशमा को छोड़ा। 20 मिनट तड़पने के बाद रेशमा के प्राण-पखेरू उड़ गए।

               प्राणी विशेषज्ञ खतरों से वाकिफ थे, क्योंकि उन्हें अनुभव था कि वयस्क हो जाने के बाद शेरों का समागम कठिन हो जाता है। फिर भी खतरा मोल लेकर दोनों शेरों को मिला दिया गया। श्यामू द्वारा हमले की संभावना का सामना करने के लिए जलती मशालें, बंदूक और ट्रेंकुलाइजर का भी इंतजाम था। लेकिन जिस फुर्ती से श्यामू ने रेशमा पर हमला किया उससे सब हक्के-बक्के रह गये और सुरक्षा के सारे इंतजाम धरे रह गये।

               विशेषज्ञ चाहते थे कि किसी तरह पहले दोनों का जोड़ा बिठाया जाये। लेकिन वह संभव नहीं हो सका। पीले रंग की शेरनी लता और सफेद रूस्तम की भी जोड़ी बिठाने की नाकाम कोशिश की गई। इसी कार्रवाई में रूस्तम ने लता की हत्या कर दी थी। मधय-प्रदेश में सफेद शेरों की नस्ल बचाने की अंतिम कोशिश के साथ श्यामू और रेशमा का जोड़ा बिठाने का प्रयास किया गया। कुछ समय बाद एकाकी जीवन बिताते हुए रूस्तम ने भी दम तोड़ दिया। रेशमा को 1988 में भुवनेश्वर के नंदकानन वन से भोपाल वन विहार में लाया गया था और इसके जीवन-साथी के रूप में रूस्तम को दिल्ली के चिड़ियाघर से, रूस्तम का पूर्वज रीवा का प्रसिध्द सफेद शेर मोहन था, जिससे इनकी वंश वृध्दि हुई थी। बाद में तीन साल का सफेद शेर ईशू और उसकी मां कीकू को नंदनकानन से 21 नवंबर 2004 को भोपाल लाया गया। लेकिन ईशू ने परिवेश बदल जाने के कारण जल्दी दंम तोड़ दिया। इसकी मां कीकू अभी भी जीवित है। कैमूर विंधयाचल के वन खंडों से तो सफेद शेर लुप्त हो ही चुके हैं, नर सफेद शेर ईशू की मौत के बाद ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि अब वन विहार में इनके वंश की वृध्दि होना असंभव ही है। लेकिन यह अच्छी खबर है कि इनके मूल निवास स्थल रीवा के जंगलों में इनके पुनर्वास की पहल की जा रही है। यह प्रयास सफल हो जाता है तो एक बार फिर कैमूर विंघ्याचल की पर्वत श्रृंखलाओं में सफेद शेर की दहाड़ गुंजायमान होगी।

? प्रमोद भार्गव