संस्करण: 13 फरवरी- 2012

घर की बहू या बहू का घर?

? अंजलि सिन्हा

               हाल ही में एक राष्ट्रीय स्तर के हिन्दी अखबार ने एक अलग किस्म के मसले पर पाठकों से राय मांगी थी। विषय था आज के दौर में क्या कहना बेहतर समझा जा सकता है 'घर की बहू या बहू का घर'। इण्टरनेट एवं एसएमएस के इस जमाने में लोगों ने भी फटाफट अपनी राय भेजी जिसमें अधिकतम 'बहू का घर' माननेवालों की थी।

               समाज का एक हिस्सा बहू को घर और घर की वस्तुओं की तरह एक सजीव वस्तुही मानता है जो बात 'घर की बहू' वाली धारणा में परिलक्षित होती है। इसकी तुलना में देखें तो 'बहू का घर' माननेवालों की समझदारी कमसे कम उसके अपने स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारनेवाली  मालूम पड़ती है।

                मगर क्या हमें इसी द्विविध अर्थात बायनरी से चुनना होगा या कोई तीसरा रास्ता भी निकल सकता है जो हाईरार्की के पर टिकी इन दोनों अवधारणों से परे जाती हो ? घर की बहू वाली अवधारणा में जिस तरह पहले से स्थापित सम्बन्धों को ही वरीयता मिली रहती है, वहीं बहू के घर वाली अवधारणा एक नयी हाईरार्की का बीज डालती है जिसमें बहू केन्द्र में रहे और बाकी सदस्य गौण होते जाएं। इसके अन्तर्गत बहू इस मानसिकता में उस घर में प्रवेश करती है कि जैसे ही उसका सिक्का जम जाए तो वह घर पर अपना नियंत्रण कायम कर लेगी और फिर घर में बुजुर्ग होते लोग या अन्य सदस्यों का हाशिये पर चले जाना अनिवार्य होता है।

                इस स्थिति में कई प्रकार के तनाव खड़े होने की गुंजाइश होती है और तब जिसके पास जितनी ताकत या साधन होते हैं, बाजी उसी के हाथ होती है। वास्तविकता कई बार सुनने की इच्छा नहीं होती या समस्या का सतही या भावनात्मक समाधान लेना आसान जान पड़ता है। हकीकत है कि देशभर में परिवारों के अन्दर शक्तिसंघर्ष चलता है। कई लोग अपनी अलग गृहस्थी कर लेते हैं तो कई एक छत के नीचे ही खाना एक जगह बनाते हुए और औपचारिक घोषणा के कारण की कम से कम एक टाइम का खाना सब एक साथ खायेंगे आदि नियम के बावजूद कई युनिटें बन जाती है। यद्यपि कई घर ऐसे जरूर मिल सकते हैं जहां संदस्यो में तार्किक और सभी के गरिमा का खयाल रखनेवाली पारिवारिक व्यवस्थाओं का भी समाधान निकला है लेकिन इस बात से शायद ही कोई इन्कार कर सकता है कि परिवार के अन्दर सत्ता को लेकर, तौरतरीकों को लेकर - कभी प्रगट तो कभी प्रच्छन्न रूप में - संघर्ष चलता रहता है। इसके कई रूप सामने आते रहते हैं।

                 उदाहरण के लिए कुछ समय पहले तीसहजारी कोर्ट की एक जिला जज ने लामपुर भिक्षुक गृह का औचक दौरा किया था जिसमें कम-से-कम 50 ऐसे बुजुर्ग मिले जो अच्छे पढ़े लिखे थे तथा जिनमें से अधिकांश के पास अपना घर है मगर वे वहां डाल दिए गए हैं। (ख़बर 4 फरवरी 2010) ये बुजुर्ग राजधानी की सड़कों पर भीख मांगते थे, जहां से गिरतार कर उन्हें वहां भेजा गया है। निश्चित ही ऐसी स्थिति तभी आयी होगी जब उनके परिवारवालों ने उन्हें या तो घर से निकाल दिया होगा या ऐसी स्थितियां आयी होंगी कि उन्होंने चुपचाप घर छोड़ना मुनासिब समझा होगा।

              दरअसल होना तो यह चाहिए कि न घर की बहू या बहू का घर, घर उन सबका जो एक साथ परस्पर सम्मान का खयाल रखते हुए साथ रहते हैं। अपने आस-पड़ोस , जान-पहचान, रिश्तेदारी में निगाह दौड़ा कर स्थिति का विश्लेषण कर सकते हैं और न्यायोचित तथा दूरगामी समाधान के लिए लोगों को सोचने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

               एक परिचित ने अपने जवानी के दिनों में अपने वेतन में से कौड़ी-कौड़ी जोड़ कर घर खड़ा किया था जैसे कि अधिकतर लोग अपने वर्तमान के जरूरतों में कटौती करके ही बचत कर पाते है और मुश्किल से ही आशियाना बना पाते हैं। दो बेटे हैं, बेटी अपने ससुराल चली गयी है। उन्होंने भी कई आदर्श मां-बाप की तरह बड़े बेटे की शादी के बाद कहा कि 'बहू, अब घर तुम्हारा है जैसे सम्हालना है सम्हालो'। अभी भी ऊपर से देखने में सब अच्छा ही चलता है लेकिन दिनभर बूढ़ा बूढ़ी  मन्दिर में समय बीताते हैं। घर के अन्दर की उपेक्षा उनके चेहरे पर साफ देखी जा सकती है। ऐसा इसलिए नहीं हुआ होगा कि बहू का स्वभाव खराब होगा। वह तो फिर से भावनात्मक  या व्यवहारगत कारण या समाधान ढूंढनेवाली बात हो जायेगी। स्वभाव और व्यवहार खराब हो जाने की भी भौतिक वजहे ही होती हैं।

               इन्सान एक समय के बाद संन्यास लेने जैसी बातें करता जरूर है लेकिन अन्दर से लेना नहीं चाहता और जबरन लेना भी क्यों चाहिए? उम्रदराज होने पर भी घरगृहस्थी में अच्छा लगे तो रमे रहने में क्या समस्या है ? खास तौर से महिलाएं तो शुरू से ही घरगृहस्थी ही करती रहती हैंश्, तरह-तरह के व्यंजन पकाना उन्हें अच्छा लगता है, किचन को अपने ही ढंग से सजाना और व्यवस्थित करना अच्छा लगता है तो अच्छी सास या अच्छे ससुर बनने के दबाव में गृहस्थी किसी और को सौंप देना भी अन्याय ही है उनकी रुचियों के साथ। दूसरी बात लड़का हो या लड़की या बहू किसी को भी बैठे-बिठाये घरगृहस्थी कि मिल्कियत क्यों मिल जानी चाहिए ? यानि समाधान तो हर व्यक्ति को ध्यान में रखकर उसकी इच्छाओं, जरूरतों के हिसाब से ही निकाला जाना चाहिए।

               समाज में गहरे पैठी पितृसत्तात्मक सोच और धारणाओं के कारण है कि दरअसल औरत ठीक से अपने बलबूते अपनी गृहस्थी खड़ी करने या चलाने लायक बनने नहीं दी जाती है। मातापिता के घर में यह सुनती है कि वह जहां जायेगी वही घर उसका होगा। ससुराल में उस दावे पर दूसरों की भी पहले से ही दावेदारी रहती है। इस बीच उसे अपने लिए स्पेस बनाना होता है जो सत्ता-संघर्ष में तबदील होना लाजिमी हो जाता है।

               उदाहरण के तौर पर हम दहेज के नाम पर उत्पीड़न को देखें, जिसके सन्दर्भ में सास की भूमिका पर पहले से चर्चा रही है। पुलिस ने दहेज के लिये दायर होने वाले तमाम मुकद्दमों में सासों को दोषी पाया है और देशभर के जेलों में दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या के आरोप में जितने कैदी बन्द हैं उनमें महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी है। इस बीच और एक परिवर्तन दर्ज किया गया है कि दहेज अपराधों में महिलायें अधिकतर हम-उम्र महिलाओं द्वारा सतायी जा रही हैं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की एक खबर थी ( सहारा 28.6.08) कि अब ननदों की भूमिका कैसे अधिक खतरनाक हो गयी है। पुलिस अधिकारियों ने एक मामले की जांच के दौरान कहा कि कैसे दहेज उत्पीड़न के कई मामलों में ननदें बढ़-चढ हिस्सा लेती हैं। राज्य अपराध अभिलेख ब्यूरो के एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दहेज उत्पीड़न के अधिकांश मामलों में बहू की हमउम्र महिलायें अब ज्यादा अभियुक्त बन रही हैं। वर्ष 2007 के आंकड़े दिये गये हैं जिसमें दहेज हत्या के मामले में 1069 महिलाओं की उम्र 18 से 30 के बीच की पायी गयी। यही हाल दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी पाया गया। कुल गिरफ्तार हुयी 3189 महिलायें उनमें 1296 महिलाओं की उम्र 18 से 30 वर्ष की है। घरों को ही अपना साम्राज्य समझने वाले परिवार की सदस्य महिलायें  नये सदस्य को आसानी से स्पेस नहीं देती और नये सदस्य महिला का उत्पीड़न करती हैं जिसमें दहेज एक माधयम बनता है। इन सब सभी कारणों पर विचार किये बिना समस्या का तार्किक समाधान नही निकाला जा सकता है। गृहस्वामी या गृहस्वामिनी की सामन्ती धारणा को पीछे छोड़ने की जरूरत है तथा आवश्यकता है बराबरी और अधिकार के साथ-साथ जिम्मेदारी ओर जवाबदेही को सुनिश्चित करना। अपने परिश्रम से अपने आकांक्षाओं का कोई जैसा चाहे महल खड़ा करने के बजाय इसके कि अनगिनत उपाय करना पड़े, अपना दबदबा और सिक्का मनवानेके लिए। परिवार के अन्दर तनाव है और उसे कारपेट के नेीचे ड़ालने से सुकून का जीवन कायम नही होगा।

? अंजलि सिन्हा