संस्करण: 13 अगस्त-2012

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मन के हारे हार है...

           म हमेशा से सुनते आ रहे हैं मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। यानि जिनका मन उत्साह और विश्वास से भरा हो सफलता उन्हीं को मिलती है, नीरस और निरुत्साही मन आलस्य और पराजय का प्रतीक है। लेकिन मन में विश्वास और उत्साह का संचार तभी होता है जब विचार दूषित न हों और भावनाओं में कपट न हो, स्वार्थ का मैल न हो, संदेह की दरार न हो। स्वार्थ की नींव पर विश्वास की इमारत कभी नहीं खड़ी हो सकती, यदि कोशिश की गई तो उसका गिरना भी तय है। भाजपा के विद्वान नेता लालकृष्ण आडवाणी इन बातों को भली प्रकार समझते हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने इन परिस्थितियों से कई बार साक्षात्कार किया है। 

  ? विवेकानंद


क्या अब संघ परिवार

अन्ना टीम के सहारे सत्ता हथियाना चाहता है?

        क्षिण पंथ की राजनीति में अर्थ और आशय में बहुत अंतर होते हैं। नेताओं के बयानों के जो अर्थ होते हैं जरूरी नहीं कि उनका आशय भी वही हो। इस विषय पर आज से पच्चीस वर्ष पहले रमेश शर्मा की एक फिल्म आयी थी 'न्यू दिल्ली टाइम्स'जिसमें मीडिया का उपयोग करते हुए सत्ता की राजनीति के दोगले चरित्र का बहुत ही कुशल चित्रण था। माननीय श्री लाल कृष्ण अडवाणीजी की ताजा भविष्यवाणी को भी 'बिटवीन दि लाइंस' पढे जाने की जरूरत है जिसमें उन्होंने कहा है कि आगामी प्रधानमंत्री न भाजपा का होगा और न ही कांग्रेस का।   

? वीरेन्द्र जैन


भोली भाली जनता के दगाबाज ब्वाय फ्रेंड

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव

   पिछले 16 महीनों से देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का दावा करने वाले अन्ना हजारे ने अचानक आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी।इससे देश के कई हजार लोगों के दिल टूटे। कुछ बुध्दिजीवी अपनी समस्त बौध्दिक शक्ति का उपयोग कर इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं कि अन्ना हजारे ने आखिर किन परिस्थितियों से विवश हो कर अपना आंदोलन अचानक समाप्तं कर दिया और टीम भंग कर दी।  लाखों लोगों ने अन्ना और उनकी टीम को अपना मसीहा मान लिया था।इंडिया अगेंस्ट करप्शन से लोगों ने यह मान लिया था कि देश से करप्शन की जल्दी ही फेयरवेल पार्टी होने वाली है।

? मोकर्रम खान


स्मृतिलोप में सुदर्शन

          संघ अर्थात राष्टीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वसुप्रीमो जनाब सुदर्शन पिछले दिनों अचानक सूर्खियों में आए। वजह थी उम्र के साथ तमाम बुजुर्गों में पायी जानेवाली स्मृतिलोप अर्थात डिमेंशिया की बीमारी थी। बताया गया कि वह मैसूर के अपमार्केट सेन्चुरी पार्क इलाके में स्थित अपने भाई के घर से सुबह टहलने निकले और घर नहीं लौटे। बाद में जब पुलिस को सूचना दी गयी, टीवीवालों ने इस ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज में पेश किया तो किसी कूरियरवाले ने उन्हें पहचान लिया जिसके घर वह पानी मांगने के लिए रूके थे।

? सुभाष गाताड़े


आडवाणी का प्रधानमंत्री संबंधी बयान

हम नहीं तो कोई नहीं!

         म तो डूबे हैं सनम, सबको (मोदी समेत) ले डूबेंगे। लालकृष्ण आडवाणी जी के इस बयान कि अगला प्रधान मंत्री न तो कांग्रेस का होगा व न ही भाजपा का,सारे देश,विशेषकर भाजपा में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। सन् 2008 के चुनाव के पूर्व इस बात की पूरी संभावना थी कि यदि भाजपा का बहुमत आता है तो आडवाणी प्रधानमंत्री बनेंगे। प्रधानमंत्री बनने की संभावना के मद्देनजर आडवाणी ने ऐसे अनेक कदम अठाये थे जिससे ए.डी.ए. के नेता के रूप में उनकी स्वीकारिता बढे। स्वीकारिता बढ़ाने के लिये वे पाकिस्तान गये,वहां उन्होंने पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना की समाधि पर फूल चढ़ाये।

 ? एल.एस.हरदेनिया


बेसुरा बजने लगा अन्ना का आर्केस्ट्रा

                  माजसेवी अन्ना हजारे और उन की टीम जिस जोश-खरोश और जज्बें के साथ ताल ठोककर देश के राजनैतिक माहौल को कोसते हुए मंच पर उतरी थी,और उसकी अब हवा निकल चुकी है। अन्नाजी भ्रष्टाचार के खिलाफ राग अलापने के लिए राष्ट्रीय मंच पर चढ़े थे और उनके साथ उनकी टीम के साजिंदे अपने अपने वाद्य यंत्र लेकर अन्ना के सुर में ताल मिलाने के लिए अपने अपने तबले, मंजीरे, ढोलक, सितार, हारमोनियम लेकर मंच पर अवतरित हो गये। भारत की जनता मूलत: तमाशबीन है। जब भी कहीं कोई फुटपाथ पर, सड़क-चौराहें पर या नाटक-नौटंकी के मंच में ढोल-ढमाकों की आवाज गूंजने लगती है लोग अपने हाथ का कामकाज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं तमाशा देखने के लिए।

? राजेन्द्र जोशी


कांग्रेस को अपने मौलिक सिध्दांतों पर

पुन: लौटना होगा।

      कांग्रेस पार्टी को वर्तमान गतिरोध से बचने के लिये नई सैध्दान्तिक दिशा की जरूरत होने संबन्धी हालिया बहस उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिये एक उचित व स्वागत योग्य कदमहै। इससे वर्तमान में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि उसकी विरोधी पार्टियों सहित सभी पार्टियाँ अपनी सैध्दान्तिक स्थिति पर विचार करने के लिये विवश होंगी।

? के.एस.चलम


दिग्विजय सिंह क्यों बोलते है?

      कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह वैसे तो स्वयं की प्रतिज्ञा से बँधे होने के कारण विगत 9 वर्षों से किसी भी सरकारी पद पर नही है किन्तु मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से निवृत्त होने के बाद के 9 वर्षों में उन्होने जो सुर्खियाँ  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तथा जनचर्चाओं में बटोरी है,वह अनेक अर्थो में विस्मयकारी है और प्रबुध्द लोगों को उनके व्यक्तित्व पर गंभीरता से सोचने को विवश करती है। दिग्विजय सिंह वैसे तो कांग्रेस के महासचिव है पर वे कई बार पार्टी के प्रवक्ता की भूमिका में होते है तो कई बार सरकार के प्रवक्ता की भूमिका में भी दिखाई देते है।

? जे.पी. शर्मा


विरोध-प्रतिरोध की खत्म होती संस्कृति

        भूमंडलीकरण ने जिन कई व्याधियों को हमें साइड-इफेक्ट के तौर पर दिया, उसमें विरोध-प्रतिरोध की संस्कृति का धीरे-धीरे खत्म हो जाना भी शामिल है। देश में बढ़ती मँहगाई,बदतर होती कानून-व्यवस्था तथा बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार, फिर भी दम तोड़ते जन-आंदोलन इसके प्रमाण हैं। कुशासन और अव्यवस्था का विरोध होने के बजाय उसके समक्ष लगातार समर्पणहो रहा है और इसी का नतीजा है कि भ्रष्टाचारी और कुमार्गी सीना तानकर चल रहे हैं तो अपने को भला और नेक-शहरी समझने वाले लोग घरों में छिपकर बैठना बेहतर मानने लगे हैं।

? सुनील अमर


विकास की राह पर कुपोषित राज्य

       स देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। खुली अर्थव्यवस्था,बाजारवाद और नव उपभोक्तावाद की चकाचौंध में कई मूलभूत समस्याएं सरकारी फाइलों में और समाज के बदलते दृष्टिकोण के चलते दबकर रह जाती हैं।

    

? राखी रघुवंशी


बारिश का मौसम और डिप्रेशन

     चपन में पिताजी जब कहते कि आज बादल छा गए हैं, इसलिए हाथ-पाँव में दर्द हो रहा है। हम उनकी बातें सुनकर हँसते। भला बादलों से हाथ-पाँव का क्या संबंध? आज जब वही स्थिति हमारी है, तो समझ में आ रहा है कि सचमुच पिताजी सही कहते थे। इन दिनों बारिश भले ही न हो,पर बादल तो छाए ही रहते हैं। ऐसे में जब दो-तीन दिनों तक सूरज के दर्शन नहीं होते, तो हमारे भी हाथ-पाँव में दर्द शुरू हो जाता है। आखिर क्या कारण है बादलों का हाथ-पाँव से? आखिर बादलों के पास ऐसा क्या है, जिससे इंसान का मूड ही बदल जाता है?

? डॉ. महेश परिमल


15 अगस्त : स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

स्वतन्त्रता : छियासठवें वर्ष में

    स्वाधीनता दिवस की छियासठवीं वर्षगांठ पर देश की उपलब्धियों का आकलन करते समय एक विशाल राजनीतिक पटल आंखों से गुजर रहा है, जिसमें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उसके मूल लक्ष्य स्वाधीनता प्राप्ति की कथा लिखी गई। एक प्रश्न भी मन में कौंध रहा है, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों, शहीदों और आन्दोलनकारी नेताओं ने जिस स्वाधीन भारत का स्वप्न देखा था, क्या वह स्वप्न साकार हो पाया ? वह स्वप्न ऐसे स्वतंत्र देश का था, जिसमें सबको रोटी मिले, सबको पीने का पानी मिले, सबके सिर पर छत हो, और विभिन्न क्षेत्रों में सभी को समान अवसर एवं सुविधाएं प्राप्त हो।

? डॉ. गीता गुप्त


  13 अगस्त2012

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