संस्करण: 13 अगस्त-2012

विरोध-प्रतिरोध की खत्म होती संस्कृति

 

? सुनील अमर

                भूमंडलीकरण ने जिन कई व्याधियों को हमें साइड-इफेक्ट के तौर पर दिया, उसमें विरोध-प्रतिरोध की संस्कृति का धीरे-धीरे खत्म हो जाना भी शामिल है। देश में बढ़ती मँहगाई,बदतर होती कानून-व्यवस्था तथा बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार, फिर भी दम तोड़ते जन-आंदोलन इसके प्रमाण हैं। कुशासन और अव्यवस्था का विरोध होने के बजाय उसके समक्ष लगातार समर्पणहो रहा है और इसी का नतीजा है कि भ्रष्टाचारी और कुमार्गी सीना तानकर चल रहे हैं तो अपने को भला और नेक-शहरी समझने वाले लोग घरों में छिपकर बैठना बेहतर मानने लगे हैं। इसी क्रम में शहरों में लगातार हो रहे कम प्रतिशत के मतदान को भी लेना चाहिए। अन्ना आंदोलन की क्रमिक विफलता भी 'नेक-शहरी' प्रवृत्ति वाले लोगों की ही देन है। इस वर्ग में आंदोलन की प्रवृत्ति समाप्त होकर पिकनिक में बदल गयी है। कैसी बिडम्बना है कि अन्ना-दल ने इसी वर्ग की भीड़ को अपना प्रमुख संबल समझा था! यह वर्ग आज लूट-खसोट का विरोध करने के बजाय उसके समक्ष समर्पण कर देता है और आगे चलकर अपने लाभ के लिए खुद भी लूट-खसोट कर लेता है। यह प्रवृत्ति अचानक ही नहीं आई है बल्कि हमने जो आयातित शिक्षा-व्यवस्था बहुत लालायित होकर स्वीकार की है वह अब ऐसी ही नयी पीढ़ी को दीक्षित कर निकाल रही है जिसके उपर्युक्त गुण हैं। दिक्कत यह है कि एक तरफ तो हमने शासन-व्यवस्था के लिए लोकतंत्र को चुना और दूसरी तरफ हमारी नयी और कर्णधार पीढ़ी उस विरोध को ही भूलती जा रही है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए प्राणवायु का काम करता है। बजाय इसके, हमारे समाज का वह वर्ग जो दलित, अनपढ़ और गरीब है, उसमें प्रतिरोध-विरोध का गुण अभी भी मौजूद है और देश में जिन भी जनांदोलनों को हम देख-सुन रहे हैं, वह इसी अनपढ़ वर्ग की बदौलत है। आश्चर्य होता है कि कल-कारखानों से मजदूर यूनियनें भी खत्म हो रही हैं!

                  चरित्र हमारी शिक्षा का ही बदल गया है। आज की शिक्षा ज्ञान के लिए नहीं, रोजगार के लिए है और हमारी सरकारें तथा सरकारी दृष्टिकोण वाले विद्वान इसी मत का प्रचार करते हैं कि शिक्षा रोजगार परक ही होनी चाहिए। इस रोजगार परक शिक्षा ने पढ़े-लिखे नागरिक के बजाय पढ़े-लिखे कामगार देना शुरु कर दिया है। इसकी परिणति यह है कि आज जो शैक्षणिक संस्थान जितना नामी या उच्च माना जाता है, वहॉ अधयापक, छात्र या अभिभावक द्वारा किसी भी नाजायज बात का विरोधा करने की संभावना उतनी ही न्यून होती है। ऐसा नहीं है कि वहाँ सब कुछ उचित ही होता है लेकिन वहाँ विरोध करने का सीधा मतलब होता है उस संस्था से निष्कासन। ये शिक्षण संस्थाऐं ऐसी सैन्य छावनियों में तब्दील हो गई हैं जहाँ दृढ़, अनुशासित और वफादार सैनिक तैयार किये जाते हैं और जो विरोध शब्द को ही नहीं जानते। लार्ड मैकाले ने भी ऐसी कल्पना नहीं की रही होगी कि अंग्रेज सरकार के कामकाज के लिए योग्य और फर्माबरदार क्लर्क तैयार करने की उसकी शिक्षा पध्दति आजाद भारत में ऐसे पढ़े-लिखे नागरिक तैयार करेगी जो रीढ़ विहीन होंगें! आज की शिक्षा और व्यवस्था का सबसे घातक पहलू यह है कि यह नागरिकों में 'सह लेने की प्रवृत्ति' पैदा कर रही है।

                विरोध, लोकतंत्र का सबसे प्रमुख और जीवंत गुण है। जहाँ विरोध करने की गुंजाइश न हो वहॉ लोकतंत्र हो ही नहीं सकता। शिक्षा के निजी कारखानों से निकली हमारी युवा पीढ़ी को इस भूमंडलीकरण ने रोजगार की जिस संस्कृति में फॅंसाया वहॉ एक ऐसी अनिश्चितता है कि विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं। आज मजदूर से लेकर उच्च पदस्थ अधिकारी तक सभी ठेके पर काम कर रहे हैं। ठेका पूरा हो जाता है तो यह मालिक पर है कि वह ठेके को और आगे बढ़ाये या समाप्त करे। इसमें विरोधा कैसा? यही वजह है कि कारखानों से मजदूर यूनियनें या तो समाप्त हो रही हैं या निष्क्रिय पड़ी हैं। उच्च वर्ग के लिए मँहगाई और भ्रष्टाचार कोई समस्या नहीं क्योंकि यह इसी वर्ग की देन ही है और निम्न वर्ग यह सब सहने के लिए अभिशप्त है क्योंकि उसका सारा प्रयास दो वक्त की रोटी हासिल करने में चला जाता है, लेकिन देश का मध्यम वर्ग स्कूल-जीवन और अपने कर्म-काल में अन्याय का प्रतिकार करने की जिस आदत को भूल गया है उसी का नतीजा है कि हर तरफ लूट मची हुई है। बाजार बिल्कुल अराजक हो चुका है। वस्तुऐं छपे दाम से अधिक पर सरे-आम बेची जा रही हैं और तथाकथित पढ़ा-लिखा वर्ग चुपचाप खरीद रहा है। पहले ऐसा प्राय: रेलवे स्टेशनों पर होता था जहॉ मुसाफिर जल्दी में रहता है और उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता लेकिन अब हर जगह यही हो रहा है। समाचार माधयमों में सब्जियों के थोक मंडी भाव रोज आते हैं लेकिन उपभोक्ताओं को उससे कई गुना अधिक पर वही सब्जियाँ बेची जाती हैं और एतराज करने वाला कोई भी नहीं! यह मध्यम वर्गीय संस्कृति बन गयी है कि अगर कुछ ज्यादा देने से आसानी से काम हो जाता है तो चुपचाप कर लो। यह कालाबाजारी को प्रोत्साहित करने वाला चरित्र है।      लेकिन इस अप-संस्कृति ने देश की उस तीन-चौथाई आबादी को बेहद त्रासद स्थिति में डाल दिया है जिसकी औसत दैनिक आमदनी बीस रुपये से भी कम है और जिसके पास अपना श्रम-मूल्य बढ़ाने का भी कोई तरीका नहीं होता क्योंकि इसके लिए भी वह सरकार और बाजार पर ही निर्भर है। उसका पहले से ही गीला आटा और गीला हो रहा है। समाज सुधारक अन्ना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव सुधारों की बात करते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते कि सिर्फ अच्छा प्रत्याशी खड़ा कर देने से ही क्या चुनाव और समाज सुधार हो जाएगा? यह ध्यान देने की बात है कि चुनाव आयोग की मौजूदा सख्तियों ने अपराधियों का चुनावी वर्चस्व लगभग समाप्त कर दिया है और अब बूथ कब्जा करने जैसी बातें इतिहास के गर्त में हैं फिर भी अपराधियों के जीतने का सिलसिला अगर बढ़ता ही जा रहा है तो इसका मतलब क्या यह नहीं है कि ऐसे तत्त्वों को ठीक से विरोध करने के बजाय उन्हें समर्थन दिया जा रहा है? अब यह समर्थन चाहे जिस कारण से हो। पानी, बिजली, सड़क, कानून-व्यवस्था तथा मॅहगाई आदि अनेक ऐसे दैनिक जीवन से सम्बन्धित मुद्दे हैं जो लगभग हर आदमी का जीना मुहाल किये हुए हैं लेकिन प्रवृत्ति यह हो चुकी है कि जैसे इस पर आंदोलन करना सिर्फ राजनीतिक दलों का ही काम रह गया है। लोग चंदा तो चुपचाप दे सकते हैं लेकिन शामिल नहीं होना चाहते। जबकि होना यह चाहिए कि आप चाहे चंदा बेशक न दें लेकिन शामिल जरुर हों। सिर्फ पैसे से आंदोलन हो सकता तो अन्ना आंदोलन इस गति को न पहॅुचता ।अन्याय का विरोध एक प्राकृतिक गुण है जो प्रत्येक जीव में पाया जाता है। दु:खद है कि आज हमारे समाज का समर्थ हिस्सा समझौतावादी हो रहा है। जो दबे-कुचले लोग आंदोलन करने को कमर कसते भी हैं उनका नेतृत्व या तो बिक जाता है या कुचल दिया जाता है। दूधवाला दूध में पानी मिलाकर लाता है, हम चुपचाप ले लेते हैं, शीतल पेय वाला छपे से चार-पॉच रुपया अधिक लेता है और हम खामोशी से दे देते हैं, गैस सिलेन्डर वाला दस-बीस रुपया ज्यादा लेता है और हम चुपचाप उसे देकर खुश हो लेते हैं कि चलो हमें गैस तो मिली। बिजली वाला हमारी शिकायत पर हमारा काम कर दे तो हमसे वह पैसे मॉगता है और हम खुश होकर दे देते हैं कि चलो हमारा काम तो कर दिया। यह प्राय: सभी करते हैं और रोज करते हैं लेकिन कभी भी एकजुट होकर विरोध नहीं करते कि हमसे यह लूट क्यों हो रही है।


? सुनील अमर