संस्करण: 13 अगस्त-2012

दिग्विजय सिंह क्यों बोलते है?

 

?  जे.पी. शर्मा

                 कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह वैसे तो स्वयं की प्रतिज्ञा से बँधे होने के कारण विगत 9 वर्षों से किसी भी सरकारी पद पर नही है किन्तु मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से निवृत्त होने के बाद के 9 वर्षों में उन्होने जो सुर्खियाँ  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तथा जनचर्चाओं में बटोरी है,वह अनेक अर्थो में विस्मयकारी है और प्रबुध्द लोगों को उनके व्यक्तित्व पर गंभीरता से सोचने को विवश करती है। दिग्विजय सिंह वैसे तो कांग्रेस के महासचिव है पर वे कई बार पार्टी के प्रवक्ता की भूमिका में होते है तो कई बार सरकार के प्रवक्ता की भूमिका में भी दिखाई देते है। उनसे बात करने के लिये मीडिया कतार लगाये खड़ा रहता है, उनकी बात सुनने के लिये जनता बेताब रहती है, उनकी बात के अर्थ निकालने के लिये उनकी ही पार्टी के साथी कानाफूसी करते है और उनकी बात का विश्लेषण करने के लिये सभी राजनैतिक दलों के लोगों में टी.वी. चैनलों पर बहस में शामिल होने के लिये होड़ मची रहती है।

                 फेसबुक पर सबसे ज्यादा कमेन्ट्स दिग्विजय सिंह को लेकर किये जाते है। समाचार पत्रों की वेबसाइटों पर लोग सबसे ज्यादा दिग्विजय सिंह के फर्जी नाम का इस्तेमाल करते है और उनको लेकर ही सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएँ की जाती है। विपक्षी दलों द्वारा सरकार का विरोध करते दिग्विजय सिंह का नाम जरूर लिया जाता है भले ही वे सरकार में किसी भी पद पर न हों। उनके एक बयान पर चर्चा थमती नही है कि देश उनके दूसरे बयान की प्रतीक्षा करने लगता है। उनके द्वारा कही बाते एक के बाद एक सच होती है। राहुल गाँधी को बड़े पद की जिम्मेदारी संभालने की बात सलमान खुर्शीद भी करते है किन्तु उन्हे चुप करा दिया जाता है,जब दिग्विजय सिंह वही बात कहते है तो उसे राहुल मान लेते है, कहते है भूमिका कोई भी हो निभाने को तैयार हूॅ किन्तु स्वयं नही कह सकता कि मुझे क्या भूमिका चाहिये।

               अखबारों में दिग्विजय सिंह पर संपादकीय लिखे जाते है। आखिर क्या है इस व्यक्तित्व में। चाहे समर्थन के रूप में हो या विरोध के रूप में। चाहे प्रशंसा के रूप में हो या आलोचना के रूप में, आज देश में अगर सर्वाधिक चर्चित कोई राजनेता है तो वह है दिग्विजय सिंह। इसके पीछे कई कारण है। दिग्विजय सिंह तथ्यों और तर्कों पर विचार किये बगैर वे सारी बातें निडर होकर कहते है जिन्हे कहने से पहले कोई दूसरा राजनेता अपने व्यक्तिगत लाभ हानि का आकलन अवश्य करता है। दिग्विजय सिंह ने कभी न तो लाभ का आकलन किया और न ही हानि का। इसलिये उनके प्रति लोगों के हानिकारक कृत्य उनके लिये लाभ में बदल जाते है किन्तु इसका पता लोगों को तब चलता है जब उनके द्वारा कही गई बात पूरा देश कहता है। देश की आवाज को पकड़ने और प्रसारित करने में दिग्विजय को वक्त नही लगता किन्तु दिग्विजय की आवाज को देश की आवाज समझने में लोगों को थोड़ा वक्त लगता है। वे कुछ उतावले जरूर दिखते है किन्तु उनका यह उतावलापन वास्तव में इसलिये उतावलापन दिखाई देता है क्योंकि उनकी तंद्रा देश के अन्य लोगों की तंद्रा से पहले भंग हो जाती है और वे समय को पहचानकर उसका तत्क्षण उपयोग कर लेते है। अन्ना के  राजनीति में आने के संकेत को वे 2011 में समझ लेते है लेकिन पूरे देश को यह बात स्वयं अन्ना के कहने पर 2012 में समझ में आती है। रामदेव की प्रचण्ड राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को वे कई बार सरेआम कर चुके है किन्तु जनता शायद यह तभी मानेगी जब रामदेव लोकसभा चुनाव का पर्चा भरने जायेंगे।

                 सोशल नेटवर्किंग साइटों पर दिग्विजय सिंह का बोलबाला है। मैं यह नही समझ पाया हूॅ कि ऐसी उनमें क्या बात है जिसके कारण उनके धुर विरोधी भी उन्हे सदैव अपनी कल्पनाओं में बसाये रखते है,चाहे विरोध के रूप में ही सही। वैसे तो कथित रूप से दिग्विजय सिंह के इनकोडेट मस्तिष्क को डिकोड करके समझना मनोवैज्ञानिकों के भी बूते की बात नही है किन्तु दिग्विजय सिंह को वे ही लोग नही समझ पाते है जिनके मस्तिष्क की फ्रीक्वेंसी उनकी फ्रीक्वेंसी से नही मिलती। अन्यथा तो उन्हे समझना मनोवैज्ञानिकों की अपेक्षा अनपढ़ आदिवासियों और गरीब किसानों के लिये अधिाक आसान है। पिछले दिनों एक निजी कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह और शिवराज सिंह चौहान के एक ही मंच पर होने के वक्त भाजपा के लोगों में दिग्विजय सिंह की एक झलक पाने की आतुरता साफ दिखाई दे रही थी।

                 चाहे अन्ना का आदोंलन हो या बाबा रामदेव का अनशन, किसी भी मसले पर दिग्विजय सिंह की राय को देश ने अन्ना और रामदेव की बातों से अधिक तरजीह दी है। उनकी बातों को लोगों ने प्रधानमंत्री तथा सोनिया गॉधी की बातों से अधिक गंभीरता से सुना है। कहा जाता है कि जब-जब भी दिग्विजय सिंह बोलते है- कुछ राज खोलते है, लोग उन्हे तोलते है, चर्चाओं में रस घोलते है, पत्रकार उनके इरादों को टटोलते है और फिर सब एक ही सुर में बोलते है, कि दिग्विजय सिंह सही बोलते है।

               दिग्विजय सिंह एक प्रयोगधर्मी राजनेता है। उन्होने अपने जीवन को एक प्रयोगशाला बना रखा है जिसमें जितने भी प्रयोग किये जाते है उसके सफल होने का श्रेय वे दूसरों को देते है और विफल होने का उत्तरदायित्व स्वयं उठाते है।

                उनके जीवन में किसी पद का मोह दिखाई नही देता। ऐसे समय में जबकि राजनेताओं को किसी पद से हटाने में पार्टी हाईकमान को पसीना छूट जाता है जैसा कि कर्नाटक में हुआ। ऐसे में दिग्विजय सिंह का किसी पद से मोह नही होना हमारी आने वाली पीढ़ियों को राजनीति के सही मायने सिखाता है। राजनीति में रूचि रखने वाली हमारी नई पीढ़ी  यह भली भॉति समझती है कि राजनीति कैसे की जानी चाहिये। चाहे दिग्विजय सिंह की बात को लोग देर से समझते हो लेकिन देश की राजनीति के प्रवेश द्वार पर खड़ी हमारी युवा पीढ़ी जरूरत समझती है कि वे क्यों बोलते है? क्योंकि लोग उन्हे सुनते है।


? जे.पी. शर्मा