संस्करण: 13 अगस्त-2012

कांग्रेस को अपने मौलिक सिध्दांतों पर

पुन: लौटना होगा।

?  के.एस.चलम

               कांग्रेस पार्टी को वर्तमान गतिरोध से बचने के लिये नई सैध्दान्तिक दिशा की जरूरत होने संबन्धी हालिया बहस उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिये एक उचित व स्वागत योग्य कदमहै। इससे वर्तमान में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि उसकी विरोधी पार्टियों सहित सभी पार्टियाँ अपनी सैध्दान्तिक स्थिति पर विचार करने के लिये विवश होंगी।

                इसके पीछे वास्तविक तथ्य यह है कि सभी राजनीतिक दल सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के आर्थिक एजेंडे से बँध गये है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल अपने सामान्य राजनीतिक और सामाजिक कार्यों को छोड़ चुके हैं। अधिकांश दलों ने तो अपना सैध्दान्तिक आधार आर्थिक मुद्दों को केन्द्रित करके ही बना लिया है जैसे कि किसी राजनीतिक दल का यही एकमात्र अंतिम लक्ष्य हो।

               विगत दो दशकों में राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों और उनके नीतिगत बयानों का मूल्यांकन इस कमजोर प्रवृत्ति को दर्शाता है। उनमें से कुछ तो अपनी उन राजनीतिक प्रतिबध्दताओं को खो चुके है जिनके कारण वे जाने जाते है और गठबंधन सरकारों के दौर में उन्होने सभी प्रकार के समायोजन और समझौतों की शरण ले ली है। यदि राहुल गाँधी के बयान को गौर से देखा जाये तो लगता है कि कांग्रेस स्वयं में आवश्यक बदलाव के लिये तैयार है।

                एक पार्टी की विचारधारा उसके द्वारा निश्चित घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने संबन्धी उसकी सैध्दान्तिक सोच से निकलती है। ऐसा लगता है कि सभी राजनीतिक दलों ने एक पंजीकृत समूह के रूप में इन लक्ष्यों को अपने घोषणा पत्रों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल कर लिया है। वास्तव में राजनीतिक दलों को स्वयं को चुनाव आयोग में पंजीकृत कराना होता है, ''राजनीतिक दलों का पंजीयन आदेश 1992'' में राजनीतिक दलों को पंजीयन के समय अपने सिध्दान्त, नीतियाँ और लक्ष्य, जिनके लिये राजनीतिक दल का गठन किया जा रहा है को विस्तृत रूप से आयोग को बताने के लिये कहा गया है।

                 यह नियमानुसार अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक पंजीकृत राजनीतिक दल चुनाव आयोग को संतुष्ट करें। उन्हे संविधान के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करनी चाहिये विशेषकर उसकी प्रस्तावना के संदर्भ में जिसमें धर्मनिपरेक्षता, समाजवाद और प्रजातंत्र में आस्था रखने का उल्लेख किया गया है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि इस दृष्टिकोण से कांग्रेस पार्टी अन्य पार्टियों की तुलना संवैधानिक प्रावधानों की कसौटियों पर अधिक खरी उतरती है।

                 कांग्रेस पार्टी अपने 125 वर्षों के इतिहास में धर्मनिरपेक्षता ओर समाजवाद के सिध्दान्तों के कारण ही प्रासंगिक बनी रही है। इसमें कोई संदेह नही है कि अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल नियमों और प्रक्रियाओं के कारण्ा संविधान के प्रति निष्ठा घोषित करने को मजबूर है। यह आवश्यक नही है कि वे इन आदर्शों के पालन के प्रति भी उतने ही प्रतिबध्द हो। उन्होने किस सीमा तक इन दायित्वों का पालन किया यह राजनीतिक विद्वानों के लिये अध्ययन का विषय है। 

                राजनीतिक दलों के आंतरिक संगठन और उनके बाहरी क्रियाकलाप से स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे अपने सुनिश्चित सिध्दान्तों से भटक गये है। इस प्रवृत्ति का आश्चर्यजनक पहलू प्रत्येक राजनीतिक दल द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों और उनकी रणनीतियों में दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक पार्टी चाहे वह माक्र्स में विश्वास करती हो या नही, उसके आधार और अधिाचना (बेस एण्ड सुपरस्ट्रक्चर) सिध्दान्त से सहमत है। (जिसमें कहा गया है कि सामाजिक और अन्य अधिरचनात्मक मुद्दों का निर्धारण आर्थिक कारकों द्वारा किया जायेगा।)

                 किन्तु भारत जैसे देश में जहाँ सामाजिक मुद्दे- जैसे जाति, धर्म और अन्य आदिकालीन रिश्ते आज भी गहराई से विद्यमान है तथा उनका चुनाव परिणामों को प्रभावित करने में इस्तेमाल किया जाता है, ऐसे में कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने मूल सिध्दान्तों का पालन करते दिखाई नही देती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अर्थशास्त्र और सामाजिक समीकरणों के बीच रिश्ते को समझे बगैर सभी राजनीतिक दल अपनी दृढ़ आस्था सिर्फ लोगों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने पर ही लगाये हुये है।

                वैश्वीकरण, सूचना, संचार व प्रोद्योगिकी तथा पश्चिमी पूॅजीवाद की विचारधारा के आने से राजनीतिक क्षेत्र में भी अब आमूल-चूल परिवर्तन प्रारंभ हो गया है जो सत्तारूढ़ अथवा विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों के राजनीतिक भाषणों में दिखाई दे रहा है। सभी राजनीतिक दल अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिये न सिर्फ अब समय के साथ चलने को बाध्य है बल्कि उन्हे अब स्वयं को काबिल भी दिखाना होगा चाहे वह सिर्फ मीडिया की ही नजर में क्यों न हो।

                  नरसिंहराव के खिलाफ राजनीति से प्रेरित आरोप भले जी लगाये जाते रहे हों किन्तु उनके सुधार एजेण्डे को भिन्न-भिन्न गठबंधन सरकारों द्वारा बहुत ज्यादा बदलाव किये बिना अभी तक अपनाया जाता रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह एक पेशेवर अर्थशास्त्री है और अर्थशास्त्री विचारधाराओं का सख्ती से पालन करने में कमजोर होते है। एक संगठित राजनीतिक दल में विचारधारायें संगठन की आत्मा से निकलती है। सत्तारूढ़ दल को नीतिनिर्माताओं और उनका क्रियान्वयन करने वालों को अपना एजेण्डा और लक्ष्य स्पष्ट रूप से बता देना चाहिये और किसी भी प्रकार के अवरोध या पक्षाघात को दूर करने के लिये शासन के अन्य पहलुओं पर अधिक ध्यान देना चाहिये। हमारे सुधारों की राजनीतिक व्यवस्था यह तथ्य प्रकट करती है कि नीतियों को कुछ निश्चित लोगों के हिसाब से चलाया जा रहा है,इनमें से कुछ तो पार्टी में बड़े पदों पर बैठे लोग है और शेष बाहरी लोग है जो अपने एजेण्डे के क्रियान्वयन का निरीक्षण करते है। सुहृद पूंजीवाद या क्रोनी केपटलिस्म के तेजी से उदय होने का शायद यही कारण है जो पिछले दिनों हुये घोटालों में उजागर हुआ है। पहले औद्योगिक घराने, उद्योग समूह  और माफिया लोग समर्थन प्राप्त करने के लिये राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों में चक्कर लगाया करते थे किन्तु अब इसका विपरीत हो गया है। वे ही लोग अब राजनीतिक दलों को चलाने लगे है। वे अब सरकार में बैठे लोगों को अपने पक्ष में निर्णय लेने के लिये धन उपलब्ध कराते है।  इसी ने राजनीतिक प्रक्रिया की स्वायत्तता और प्रजातांत्रिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ा दी है। इसका चुनावों में होने वाले खर्च पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है तथा चुनावों में प्रत्याशियों द्वारा भारी खर्च किया जाता है। राजनीतिक पार्टियों के आर्थिक आविर्भाव और कुछ औद्योगिक घरानों के इसमें सक्रिय रूप से लिप्त होने के कारण राजनीतिक कुशलता में कमी आई है और केन्द्र तथा क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से सुदृढ़ छोटे दलों के निर्माण को प्रोत्साहन मिला है। यह भारत जैसे देश के लिये एक खतरनाक स्थिति है। भारत में बहुत सारी विविधाताएँ है जिन पर राष्ट्रीय राजनैतिक दलों द्वारा ध्यान देने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में यह कहना प्रासंगिक होगा कि कांग्रेस पार्टी देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और उसके कुछ अनिवार्य ऐतिहासिक उत्तरदायित्व है जिन्हे पूरा करके उसे एक उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। कांग्रेस पार्टी के संविधान के प्रांरंभिक दो अनुच्छेदों में स्पष्टतया प्रस्तावित किया गया है कि धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद ऐसे आदर्श है जो प्रत्येक नागरिक को सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के साथ निश्चित रूप से अवसर की समानता प्रदान करते है। वास्तव में, पार्टी ''विश्वशांति और भाईचारा'' के उस आदर्श लक्ष्य को प्राप्त करने की आकांक्षा रखती है, जो उसकी वेबसाइट पर उल्लेखित है। आम आदमी का कांग्रेस पार्टी में जो विश्वास पैदा हुआ था वह कई पीढ़ियों तक उसके वोट बैंक के रूप में बना रहा है। किन्तु हाल के चुनावों परिणामों से प्रतीत होता है कि अब वह धीरे-धीरे अदृश्य होता जा रहा है। यदि कांग्रेस गरीबों और सुविधाहीन लोगों का विश्वास फिर से जीतना चाहती है तो उसे अपने मौलिक सिध्दान्तों पर पुन: लौटना होगा।

? के.एस.चलम