संस्करण: 13 अगस्त-2012

बेसुरा बजने लगा अन्ना का आर्केस्ट्रा

? राजेन्द्र जोशी

                  माजसेवी अन्ना हजारे और उन की टीम जिस जोश-खरोश और जज्बें के साथ ताल ठोककर देश के राजनैतिक माहौल को कोसते हुए मंच पर उतरी थी,और उसकी अब हवा निकल चुकी है। अन्नाजी भ्रष्टाचार के खिलाफ राग अलापने के लिए राष्ट्रीय मंच पर चढ़े थे और उनके साथ उनकी टीम के साजिंदे अपने अपने वाद्य यंत्र लेकर अन्ना के सुर में ताल मिलाने के लिए अपने अपने तबले, मंजीरे, ढोलक, सितार, हारमोनियम लेकर मंच पर अवतरित हो गये। भारत की जनता मूलत: तमाशबीन है। जब भी कहीं कोई फुटपाथ पर, सड़क-चौराहें पर या नाटक-नौटंकी के मंच में ढोल-ढमाकों की आवाज गूंजने लगती है लोग अपने हाथ का कामकाज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं तमाशा देखने के लिए। कुछ समय तक तो लोगबाग यह समझ ही नहीं पाये कि यह तमाशा आखिर क्या ? कुछ लोगों को तो लगने लगा कि देशभर में फैला भ्रष्टाचार का भूत अब अन्नाजी के टोटकों से छूमंतर हो जायगा। सचमुच भ्रष्टाचार एक ऐसा भूत है जो उसे नहीं दिखाई देता जो भ्रष्टाचार करता है। किंतु भ्रष्टाचार उसे ही दिखाई देता है जो भ्रष्टाचार नहीं करता। स्वाभाविक है अन्नाजी का उस सूची में नाम सबसे ऊपर लिखा जायगा जो भ्रष्ट नहीं है। इसलिए चूंकि अन्नाजी स्वयं भ्रष्ट नहीं हैं इसलिए भ्रष्टाचार का भूत उन्हें चारों तरफ तांडव करता हुआ दिखाई देता है।

                अन्नाजी ने तो अपना जो आर्केस्ट्रा तैयार किया उसमें उन्होंने उनको शामिल किया जिनके आंगन में भ्रष्टाचार का भूत नहीं आता। आर्केस्ट्रा टीम में प्राय: सभी तरह के साजों के विशेषज्ञ शामिल किये गये। जब जब भी और जहां-जहां आर्केस्ट्रा का मंच सज जाता वहां वहां साजिंदे मौजूद रहते और तालों को ढोंक ढोंककर सुर में सुर मिलाते रहते। इन साजिंदों में योग गुरू बाबा रामदेव भी अपने सन्यासी चोले में अपना ढोल लेकर शामिल हो गये। कुछ समय तक तो अन्नाजी के संगीत निर्देशन में आर्केस्ट्रा सुर में बजता सुना गया। किंतु इसे संगीत निर्देशक में चूंक कहें या साजिंदों की मनमानी समझे, सब वाद्ययंत्र अपनी अपनी पहचान बनाये रखने के लिए अपनी अलग-अलग ध्वनि निकालने लग गये। बीच बीच में योगगुरू का ढोल भी सुर में सुर मिलाकर बजता रहा,किंतु वह समय भी आया जब बाबा का ढोल अपना अलग ढमाका करने लगा। ढोल-ढमाके और साजों से लैश यह आर्केस्ट्रा जहां कुछ दिन तक तो कुछेक भ्रमितजनों को कर्णप्रिय लगता रहा किंतु बाद में शनै: शनै:  वे सुर और वह ताल कर्कशता धारण करते चले गये।

                अलग-अलग सुरों में बजते साजों और साजिंदों की मनमानियों पर नियंत्रण रखने में असहाय श्री हजारे जी को देर के बाद यह बात समझ में आई कि संसद में अपने गणों को बिना पहुंचायें भ्रष्टाचार मिटाया नहीं जा सकता। खैर! अन्नाजी ने अपने इतिहास का पन्ना पलटा। देर आये, दुरूस्त आये' कि तर्ज पर अब उन्होंने समाजसेवक से राजनैतिक बनने का रास्ता पकड़ लिया। एक लम्बे समय तक अन्ना समाज की सेवा करने के लिए समाजसेवी कहलाते रहे,यहां तक कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कद के बराबर अपना कद बढ़ाते रहे। लगता है समाजसेवा के बजाय अब वे अपनी सेवाओं का उपयोग देशसेवा में लगाना चाहते हैं। समाजसेवा और देशसेवा में लगाना चाहते हैं। समाजसेवा और देशसेवा के अंतर को अन्ना ने समझ लिया है। समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनी दिनचर्या में उसी रास्ते से गुजर रहा है जिस रास्ते पर भ्रष्टाचार अपना पड़ाव डाले अड़ा है। यह विडम्बना सी हो गई है कि समाज भी अब तो इन बातों पर यकीन करने लगा है कि बिना 'लेन-देन'के जीवन की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। ऐसी स्थिति में एक हजारे नहीं हजारों हजारे भी इस भूमि पर जन्म ले लेंगे तो भी लोगों की 'कुछ लेने या कुछ देने' की मानसिकता पर कोई अंतर आने वाला नहीं है।

                    गांधीगिरी करते-करते अन्नाजी को लगने लगा कि इस देश के हालात वैसे नहीं बन सकते जैसा वे चाहते हैं। गांधीजी तो इस देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था के हिमायती रहे किंतु अन्नाजी अपनी गांधीगिरी को डिक्टेट कराने की राह पर चल पड़े। सरकार को राजनैतिक पार्टियों को और यहां तक कि आम जनता को भी तानाशाही स्टाइल में उन्होंने आदेशित करने का बीड़ा उठा लिया था। ऐसा करो, वैसा करो, लोकपाल लाओ, नहीं तो जाओ। एक घोषित समाजसेवी ने 'फटकार' विद्या चलाकर देश के सारे लोगों की मानसिकता को कनफ्यूज कर दिया। आखिर ऐसे लोगों का गठबंधन बनना शुरू हो गया जिनको किसी गठबंधन में शामिल करने के लिए कोई भी दल या संगठन राजी नहीं था। धरना, प्रदर्शन, अनशन, घेराव जैसे प्रयोगों में असफलता झेलने वाले हजारेजी जिस संसद को भ्रष्टाचारियों का अड्डा मानकर चल रहे थे आखिरकार उसी संसद भवन के दरवाजे पर नाकिंग करने पहुंचना पड़ रहा है अन्नाजी को।

               किसी भी अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर होती है कि उस अभियान की संचालन टीम में शामिल लोगों की हैसियत और नियत क्या है ?भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में जब भ्रष्टाचार विशेषज्ञों का जमघट जमने लग जाय तो फिर उसका हश्र क्या होगा, समझा जा सकता है। आखिर जनता की आंखों पर तो पट्टी बंधी नहीं है। वह भी अपनी खुली आखों से सब देख रही है। बड़े-बड़े ठग, उद्योगपति, व्यवसायी और उल्टी सीधी नियत के लोग जब अपनी प्रसिध्दी के आत्मसुख के लिए ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं तो स्वाभाविक है,ऐसा आंदोलन ठप्प ही होगा। राजनैतिक पार्टियां अन्नाजी को शुरू से ही सलाह देती रही हैं कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अपने उसूल होते है और संविधान के मुताबिक उसकी गतिविधियां संचालित होती है। इस दृष्टि से नियम-कानून संसद के माध्यम से ही बनते हैं,अत: अन्नाजी पहले चुनाव लड़े फिर अपने विचारों के आधार पर मापदंड तैयार करे। यह बात अन्नाजी को तब समझ में आई जब उन्होंने जनता जनार्दन के बीच अपनी किरकिरी होते देखी। अभी तो उनके भविष्य के सपने केवल ख्याली पुलाव लग रहे हैं क्योंकि न तो उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी का नामकरण ही किया है और न ही यह तय किया है कि उसका एजेंडा क्या होगा और किस तरह के चरित्र के लोग उनके दल के पदाधिकारी होंगे। इस बात पर भी ताज्जुब नहीं कि राजनैतिक पार्टी बनने के पहले ही अन्नाजी अपनी करवट बदल लें और प्रचार पाने के नाम पर कोई शिगूफा खड़ा कर दें!

   ? राजेन्द्र जोशी