संस्करण: 13 अगस्त-2012

आडवाणी का प्रधानमंत्री संबंधी बयान

हम नहीं तो कोई नहीं!

?  एल.एस.हरदेनिया

                म तो डूबे हैं सनम, सबको (मोदी समेत) ले डूबेंगे। लालकृष्ण आडवाणी जी के इस बयान कि अगला प्रधान मंत्री न तो कांग्रेस का होगा व न ही भाजपा का,सारे देश,विशेषकर भाजपा में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। सन् 2008 के चुनाव के पूर्व इस बात की पूरी संभावना थी कि यदि भाजपा का बहुमत आता है तो आडवाणी प्रधानमंत्री बनेंगे। प्रधानमंत्री बनने की संभावना के मद्देनजर आडवाणी ने ऐसे अनेक कदम अठाये थे जिससे ए.डी.ए. के नेता के रूप में उनकी स्वीकारिता बढे। स्वीकारिता बढ़ाने के लिये वे पाकिस्तान गये,वहां उन्होंने पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना की समाधि पर फूल चढ़ाये। जिन्ना को सेक्यूलर राजनीतिज्ञ बताया। उन्हें इसके लिये अपनी पार्टी के लोगों के आक्रोश का सामना भी करना पड़ा। पर आडवाणी जानते थे कि उनके इस कदमो से देश में और विशेषकर एन.डी.ए में भी उनकी स्वीकार्यता में वृध्दि हुई है। सारे प्रयासो के बावजूद भाजपा सत्ता नहीं पा सकी। इसके बावजूद आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा समाप्त नही हुई। और क्यों हो वे आज भी मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थहैं। इसके बावजूद पार्टी जन प्रधानमंत्री पद के लिये उनका नाम नहीं ले रहे हैं। हाँ कुछ लोग नरेन्द्र मोदी क नाम अवश्य लेते हैं। नरेन्द्र मोदी के नाम पर अपनी प्रतिक्रिया प्रगट करते हुये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया कि देश का प्रधानमंत्री वही बन सकता है,जिसकी इमेज सेक्यूलर हो। स्पष्ट है नीतेश कुमार नरेन्द्र मोदी को सेक्यूलर नहीं मानते। परन्तु स्पष्ट है कि वे लालकृष्ण आडवाणी को भी सेक्यूलर नही मानते और मानें भी कैसे। नीतीश कुमार यह कैसे भूल सकते है कि देश में राम मंदिर आंदोलन के जनक आडवाणी है। उन्होंने ही यह नारा दिया था कि ''मंदिर वहीं बनेगा''। यदि मंदिर वहीं बनना है तो उस स्थान को खाली तो करना होगा। और खाली करने के लिये बाबरी मस्जिद को हटाना जरूरी है। इस तरह बाबरी मस्जिद के ध्वंस की मुख्य जिम्मेदारी आडवाणी की है। मंदिर के इस नारे को आडवाणी ने अनेक रथ यात्रायें निकालीं। इन रथ यात्राओं के दौरान और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद साम्प्रदायिक हिंसा की आग फैली और इस आग में सैकड़ों लोगों की जानें गईं। इन सब कारणों से नीतीश कुमार या कोई अन्य कैसे आडवानी को सेक्यूलर मान सकते हैं। परन्तु आडवाणी की शिकायत यह हो सकती है कि कोई अन्य माने या न माने उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को तो उन्हें प्रधानमंत्री के पद के लिये सर्वाधिक योग्य व्यक्ति मानना चाहिए। परन्तु पार्टी में कोई भी उनका नाम नही ले रहा है। इससे उनकी नाराजगी स्वाभाविक है। आखिर आडवाणी भाजपा और उसके पूर्व के अवतार भारतीय जनसंघ की नींव के पत्थर हैं। इसके अतिरिक्त वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित और प्रतिबध्द कार्यकर्ता रहे हैं। भाजपा ही नहीं वरन् संघ के नेतृत्व ने भी आडवाणी को भुला दिया है,इसलिये आडवाणी का निराश होना आश्चर्यजनक नहीं है। परन्तु क्या आडवाणी के मूल्यांकन के पीछे अकेली वैयक्तिक निराशा ही एकमात्र कारण है ऐसा मानना उचित नहीं होगा। क्योंकि भाजपा की मैदानी व वास्तविक स्थिति के बारे में जितना आडवाणी जानते हैं उतना शायद भाजपा का कोई अन्य नेता नहीं जानता है। एक समय था जब भाजपा को पार्टी बिथ ए डिफरेन्ट (एक अनोखी पार्टी) कहा जाता था और वह थी भी। भाजपा के कार्यकर्ताओं के बारे में यह माना जाता था कि पार्टी कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से करते हैं। वे लोभ, भ्रष्टाचार से कोसों दूर रहते हैं। चुनाव मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं की भी प्रमुख भूमिका रहती थी। परन्तु अब वैसी स्थिति नहीं है। अब भाजपा व अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं में किसी प्रकार का अंतर नहीं रह गया है। यह आम चर्चा है कि न सिर्फ भाजपा वरन् संघ के अनेक कार्यकर्ता निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं। जहां भी भाजपा की सरकारे हैं वहां भ्रष्टाचार के सनसनीखेज किस्से सुनने को मिलते हैं। कर्नाटक में आजादी के बाद पहली बार भाजपा के हाथ में सत्ता आई थी। वहां भाजपा की स्थिति पूरी तरह से हास्यास्पद हो गई है। कर्नाटक के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया गया। पद से हटने के बाद भी कर्नाटक में उनका दबदबा बना रहा। अर्थात किसी के भ्रष्ट होने से उसके दबदबे में कमी नही आती है। अभी हाल में उनके कहने पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री को बदलकर नया मुख्यमंत्री बनाया गया। अवैध खनन के मामले में कर्नाटक ने सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। भ्रष्टाचार के मामले में कर्नाटक के रेवी बंधुओं की ख्याति सारे देश में फैली हुई है। अभी हाल में रेवी बंधुओं में से एक ने सिर्फ जमानत पाने के लिये करोड़ों रूपयों की रिश्वत बांटी। रिश्वत देने की बात भी छिपी नहीं रही और रिश्वत के लेनदेन के मामले में आंध्रप्रदेश के दो न्यायधीशों को अपनी नौकरी खोनी पड़ी। इस समय भी कर्नाटक की भाजपा सरकार में भ्रष्टाचारियों का दबदबा है। भ्रष्टाचार के साथ-साथ कर्नाटक की राजनीति जातिगत वफादारियों से संचालित हो रही है। जिस प्रकार की स्थिति भाजपा की है उससे नही लगता कि दक्षिण भारत में भाजपा का प्रभाव बढेग़ा।

                 अभी तक गुजरात पर भाजपा को नाज था। वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सबसे ज्यादा लाड़ले सपूत थे। कुछ समय पहले तक गुजरात पर नरेन्द्र मोदी का एकछत्र राज था। पर कुछ दिनों से वहां परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं। गुजरात के वरिष्ठ भाजपा नेता और वहां के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल ने विद्रोह कर दिया है। उन्होंने भाजपा छोड़कर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाने की घोषणा कर दी है। केशुभाई के साथ गुजरात के अनेक दिग्गज भाजपा नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। पार्टी छोड़ने के पहले उन्होंने नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया हैं। उनकी तुलना हिटलर से की है। इन्ही नरेन्द्र मोदी को भाजपा के कुछ लोग प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं। जिस व्यक्ति की पार्टी के भीतर तानाशाह की छवि हो वह प्रधानमंत्री बनने पर तानाशाह नहीं बनेगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। भाजपा की इस तरह की स्थिति अन्य राज्यों में भी है। इन्ही धरातली वास्तविकताओं के चलते आडवाी ने यह कहा होगा कि अगला प्रधानमंत्री भाजपा का नहीं होगा।

               आडवाी यह बात जानते हैं कि जिस पार्टी की स्थिति इतनी दयनीय हो गई है उसे जनता देश की सत्ता की बागडोर सौपने के पहले सौ बार सोचेगी। आज स्थिति यह है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहीं भ्रष्टाचार के सनसनीखेज किस्से मिल रहे हैं। गुजरात के बारे में कहा जाता था कि वह राज्य भ्रष्टाचार से मुक्त है परन्तु वहां की एक मंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में राज्यपाल ने बर्खास्त किया है। कुछ समय पूर्व पंजाब के पांच भाजपा के मंत्रियों के ऊपर गंभीर आरोप लगे थे। आरोपों के चलते भाजपा के सभी पांच मंत्रियों का अपने पद से त्याग पत्र देना पड़ा। मध्यप्रदेश की स्थिति से सभी परिचित है। यहां एक के बाद एक अधिकारी, कर्मचारी गले तक भ्रष्टाचार में डूबे पाये गये हैं। अनेक भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को अवैधा खनन के मामले में रंगे हाथ पकड़ा गया है। एक मामले में तो एक मंत्री का सगा भतीजा अवैध खनन के मामले लिप्त लोगों का मुखिया था। दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के व्यापारिक ठिकानों पर छापे पड़ने के बाद मुख्यमंत्री समेत अनेक भाजपा मंत्रियों और नेताओं के नाम भी चर्चा में है।

                 आडवाी जानते हैं कि जिस पार्टी की ऐसी स्थिति हो वह कैसे प्रधान मंत्री के पद का दावेदार हो सकती है। आडवानी ने अपने बयान में यह भी कहा कि न सिर्फ भाजपा वरन् कोई कांग्रेसी भी प्रधानमंत्री नही बन सकेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस को भी सत्ता पाने के लिये एडी चोटी के प्रयास करना होगा।

? एल.एस.हरदेनिया