संस्करण: 13 अगस्त-2012

स्मृतिलोप में सुदर्शन  

? सुभाष गाताड़े

                संघ अर्थात राष्टीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वसुप्रीमो जनाब सुदर्शन पिछले दिनों अचानक सूर्खियों में आए। वजह थी उम्र के साथ तमाम बुजुर्गों में पायी जानेवाली स्मृतिलोप अर्थात डिमेंशिया की बीमारी थी। बताया गया कि वह मैसूर के अपमार्केट सेन्चुरी पार्क इलाके में स्थित अपने भाई के घर से सुबह टहलने निकले और घर नहीं लौटे। बाद में जब पुलिस को सूचना दी गयी, टीवीवालों ने इस ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज में पेश किया तो किसी कूरियरवाले ने उन्हें पहचान लिया जिसके घर वह पानी मांगने के लिए रूके थे।

                बहरहाल, ऐसी बीमारी का शिकार होनेवालों में जनाब सुदर्शन अकेले नहीं कहे जा सकते। कई सारे सियासतदानों के बारे में यही बात कही जा सकती है। एक दूसरी पार्टी के अधयक्ष थे, जिनकी कई सूबों में सरकार भी थी, उनके बारे में यह मशहूर था कि वह अक्सर अपनी पार्टी के सांसदों को भी नहीं पहचानते थे और उनसे मामूली काम भी करवाते थे।

               किस्सा सुदर्शन के इस ताजा प्रसंग में सबसे रेखांकित करनेवाली बात यह लगी कि वह अकेले ही घुम रहे थे। गौर करें कि संघ के प्रचारकजन आज की तारीख में कई सूबों में राज कर रहे हैं,खुद जेड या जेड प्लस की सुरक्षा में घुम रहे हैं,मगर पूर्वसुप्रीमो को एक अदद सुरक्षाकर्मी भी उपलब्ध नहीं कराया गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जहां सुदर्शन स्मृतिलोप का शिकार हुए हैं,वहीं खुद संघ परिवार के अन्दर भी उन्हें लेकर स्मृतिलोप ही हावी होता दिख रहा है।

               औपचारिक तौर पर वजह रही है, वक्त बेवक्त जनाब सुदर्शन के श्रीमुख से निकलनेवाले बयान। 2004 में भाजपा जब सत्ता से बेदखल की गयी उस वक्त इण्डियन एक्स्प्रेस को दिया उनका लम्बा साक्षात्कार काफी समय तक विवादों में था, जिसमें उन्होंने न केवल आडवाणी-वाजपेयी को रिटायर होने की सलाह दी थी बल्कि उमा भारती की यह कह कर आलोचना की थी कि वह 'असंस्कृत समाज में जनमी है।' सबसे आखरी बार वह तब सूर्खियां बने थे, जब हिन्दुत्व आतंक के मामलों में संघ प्रचारकों के शामिल पाए जाने पर कांग्रेस के नेतृत्ववाली संप्रग सरकार ने उठाए कदमों के खिलाफ संघ ने पूरे मुल्क में जगह जगह प्रदर्शनों का इन्तज़ाम किया था। /नवम्बर 2010/संघ के विरोध जुलूस की भोपाल में अगुआई पूर्व सुप्रीमो ने की थी। दिलचस्प था कि प्रदर्शन के बजाए उनके बयान सूर्खियां बनें, जिसे लेकर पूरे देश में संघ कार्यालयों पर कांग्रेसियों ने प्रदर्शन किए, कई स्थानों पर संघ कार्यकर्ताओं के साथ उनकी मुठभेड़ भी हुई।

               आखिर क्या कहा था जनाब सुदर्शन ने जिसे लेकर हंगामा बरपा हुआ था। उन्होंने सोनिया को ''सी आई ए एजेण्ट'' कहा था, इतनाही नहीं उन्होंने यह आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी के इलाज में भी सोनिया ने जानबूझ कर देरी की थी। इतनाही नहीं उन्होंने सोनिया को ''अवैध सन्तान'' भी कहा था। वैसे इसके पहले भी वह उलट सुलट बयान देते रहे हैं, जिसके चलते संघ के कारिन्दों को बगलें झांकते रहना पड़ा है। दैनिक भास्कर ने /11 नवम्बर 2010/ सुदर्शन के ऐसे बयानों की सूची ही जारी की थी : 'इन्दिरा गांधी लालबहादुर शास्त्री की मौत के लिए जिम्मेदार थी', 'हिन्दुओं को चाहिए वह कमसे कम तीन सन्तानें पैदा करें', 'बाबरी ढांच को बम ने ध्वस्त किया था ; आदि।

                अब अपने पूर्वसुप्रीमो को लेकर संघ को क्या करना चाहिए यह उनका आन्तरिक मामला है, मगर इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि संघ के मापदण्ड दोहरे हैं, जहां इससे भी खराब, जनद्रोही बयान देकर संघ के अन्य सुप्रीमो या अन्य अगुआ 'बेदाग' रहे हैं, आज भी उसके लिए प्रात:स्मरणीय हैं और मगर परिवार के सारे गुस्से का कहर सुदर्शन पर ही बरपा हुआ है।

               अगर हम संघ कबिले में वन्दनीय कहे जानेवाले जनाब गोलवलकर को देखे तो वह ऐसे विवादास्पद बयान देने में और उन पर अमल करवाने में भी अगुआ रहे है। इस सिलसिले में हम सबसे पहले गुजरात विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों एव गुरूजनों के सामने दी उनकी तकरीर को उध्दृत कराना चाह रहे हैं। आर्गनायजर के 2 जनवरी 1961 के अंक में 17 दिसम्बर 1960 को दिया उनका वक्तव्य प्रकाशित हुआ था ':

               'आज क्रासब्रिडिंग के प्रयोग जानवरों पर ही किए जाते हैं। ...मगर इस दिशा में हमारे पुरखों ने भी महत्वपूर्ण प्रयोग किए। मानवीय नस्ल सुधारने के लिए उत्तर के नम्बूद्री ब्राहमनों को दक्षिण में बसाया गया और यह नियम बनाया गया कि नम्बूद्री ब्राहमण परिवार की सबसे बड़ी सन्तान का विवाह वैश्य, शूद्र या क्षत्रिय समुदाय की बेटियों से ही किया जाएगा। इतना ही नहीं यह साहसी नियम भी बनाया गया कि हर शादीशुदा औरत की पहली सन्तान नम्बूद्री ब्राहमण से ही पैदा होगी।''ज्ञात हो कि समूचे केरल समाज की स्त्रियों को एवं अन्य लोगों को अपमानित करनेवाले इस बयान पर न कभी गोलवलकर ने माफी मांगी और न ही संघ ने जरूरत समझी।

               अपनी मृत्यु के चन्द साल पहले गोलवलकर मनुस्मृति की हिमायत कर एक बड़े विवाद में फंसे थे। मराठी अख़बार 'नवा काल' को दिए साक्षात्कार में गोलवलकर ने मनु के विधान की तारीफ की थी और आजाद भारत के बने संविधान को लेकर अपनी बेचैनी का  इजहार किया था। दरअसल हिन्दुत्व के सभी प्रणेताओं में -फिर चाहे सावरकर हो या गोलवलकर हों -मनुस्मृति को लेकर हमेशा ही एक जबरदस्त सम्मोहन दिखता है। यह अकारण नहीं कि सावरकर-गोलवलकर ने अपने लिखित वक्तव्यों में एक व्यक्ति एक वोट पर आधारित बन रही इस आधुनिक विधिव्यवस्था की मुखालिफत की थी और यही जोर दिया था कि मनुस्मृति को ही अपनाया जाए। संघ के मुखपत्र 'आर्गनायज़र ( 30 नवम्बर, 1949, पेज 3) में छपे लेख में इसी बात की ताईद की गयी थी :

                ''लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत में किये गये अनोखे संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं दिखता। स्पार्टा के लिकर्गस या पर्शिया के सोलोन के पहले मनु के नियम लिखे गये थे। आज तक मनुस्मृति में प्रगट किये गये ये विचार दुनिया की प्रशंसा पा रहे हैं। मगर हमारे संवैधानिक विद्वानों के लिये उनका कोई मतलब नहीं है।' यह वही दौर था जब डा अम्बेडकर की विशेष पहल पर हिन्दु कोड बिल के जरिये हिन्दु महिलाओं को सम्पत्ति और उत्ताराधिकार में सीमित अधिकार देने की कोशिशें चल रही थीं, जिसका भी गोलवलकर और उनके अनुयायियों ने जम कर विरोध किया था। उनका कहना यही था कि यह कदम हिन्दु परम्पराओं और संस्कृति के प्रतिकूल होगा।

               समय समय पर दिए उनके तमाम आदेश भी देखे जा सकते हैं जिसमें उन्होंने आजादी के आन्दोलन का या शहीदों को मज़ाक उडाया था और इससे दूरी बनाए रखने का कार्यकर्ताओं को आदेश दिया था।

               मालूम हो कि शूद्र-अतिशूद्रों-स्त्रियों को सभी मानवीय अधिकार एवं गरिमा से वंचित रखनेवाली मनुस्मृति का सम्मोहन आज भी इतना हावी दिखता है कि जब सुश्री उमा भारती ने मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनने पर गोहत्या पर पाबन्दी के लिए जो कानून बनाया था,उसका आधार उन्होंने मनु के विधान को बनाया था। आजाद भारत में यह पहला मौका था जब कोई कानून बनाने के लिए मनु का गुणगान किया जा रहा था। हरियाणा के झज्जर में जब मरी हुई गाय को ले जा रहे पांच दलितों को थाने के सामने,वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पीट पीट कर मार डाला गया /2003/ तब विश्व हिन्दू परिषद के गिरिराज किशोर ने यह कह कर घटना को औचित्य प्रदान किया था कि पुराणों में इन्सान से ज्यादा गाय को अहमियत दी गयी है।

               गोलवलकर रचित वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड' का किस्सा तो और ही रोचक है। यह किताब गोलवलकर ने उस वक्त लिखी थी जब हिटलर-मुसोलिनी का आन्दोलन अपने उरूज पर था। तब जनाब गोलवलकर ने हिटलर के कसीदे पढ़े थे, इतना ही नहीं यहुदियों के सफाये की उसकी नीति को भारत के लिए भी प्रासंगिक बताया था। शायद उस वक्त गोलवलकर को यह गुमान नहीं था कि बमुश्किल पांच साल के अन्दर रूसी कम्युनिस्टों के शानदार संघर्ष के चलते इन्सानियत के लिए खतरा बने नात्सीवाद-फासीवाद को जबरदस्त शिकस्त मिलेगी और खुद उनकी सरजमीं पर उनका नाम लेना भी कुफ्र बन जाएगा। अपने सुप्रीमो का इस असुविधा से बचाने के लिए संघ परिवारियों ने पहले किताब का पुर्नप्रकाशन बन्द कर दिया और बाद में यही कहना शुरू कर दिया कि वह किताब दरअसल उन्होंने लिखी नहीं थी।

                 जरा 2002 के गुजरात जनसंहार की भी बात कर लें, जिनके चलते संघ के सबसे यशस्वी कहे जानेवाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए आज भी तमाम पश्चिमी मुल्कों के दरवाजे बन्द हैं और दंगों के दौरान राज्य हुकूमत की संलिप्तता तथा संघ कार्यकर्ताओं की भागीदारी को लेकर अदालत में मुकदमें भी चल रहे हैं,कइयों को सज़ा भी मिली है। मालूम हो कि गुजरात के उस स्याह दौर को लेकर मानवाधिकार की हिमायत में मुब्तिला राष्टीय-अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं , समूहों द्वारा 45 से अधिक रिपोर्टों का प्रकाशन हो चुका है। राजधर्म का पालन न करने के लिए मोदी अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री की सार्वजनिक झिड़की भी सुन चुके हैं। इस दौर को लेकर संघ परिवारीजनों का आकलन बिल्कुल अलग रहा है। यह अकारण नहीं कि विश्व हिन्दू परिषद के अगुआ अशोक सिंघल 'गुजरात के इस सफल प्रयोग' को दोहराने की बात अक्सर करते रहे हैं। '

                 उड़िसा में ग्राहम स्टींस एवं उसके दो बच्चों को जिन्दा जलाए जाने के खिलाफ जब पूरे मुल्क में गुस्से की लहर दौड़ी,तब खुद वाजपेयी का वह विवादास्पद बयान भी सूर्खियां बना था जब उन्होंने 'धर्मांतरण को लेकर राष्टीय बहस को चलाने की मांग की थी।'

                कहा जाता है कि आयडियाज् मेक ए मैन/वूर्मन अर्थात आप का निर्माण आप के विचार करते हैं। फिर अपनी बाल्यावस्था से ही संघ की शाखाओं में जानेवाले, उसके लिए अपना जीवन समर्पित करनेवाले सुदर्शन को लेकर ही ''परिवार' में इतनी निर्लिप्तता क्यों,  इतनी बेरूखी क्यों ? क्या वह महज इसी वजह से है कि सुदर्शन ने संघ के तमाम बौध्दिकों में जो समझदारी अर्जित की और बाद में अपने कार्यकर्ताओं में सांझा की,उन्हीं बातों को वह बेलागलपेट बोल रहे हैं, जिसमें किसी किस्म के साफिस्टिकेशन से बच रहे हैं।

                संघ को अगर सुदर्शन के प्रलापों से इतनी असहजता मालूम हो रही है तो उसे एकांगी होकर नहीं निरपेक्ष होकर सोचना होगा। उसे अपने अन्य माननीयों द्वारा समय समय पर दिए गए बयानों, लिखे गए लेखों पर अपनी राय बनानी होगी, वरना उस पर यही आरोप लगेगा कि वह पक्षपाती ढंग से सोच रहा है।

                दूसरी अहम बात यह है कि 21 वीं सदी पर वाकई वह नयी छाप छोड़ना चाह रहा है तो उसे समुदाय विशेष को वरीयता देनेवाले अपने नज़रिये से तौबा करनी होगी और इन्सान विशेष को - फिर चाहे वह किसी मजहब का हो या सम्प्रदाय का हो या मुल्क का हो - केन्द्र में लाना होगा। हम अन्दाज़ा ही लगा सकते हैं कि यह प्रस्ताव एक तरह से सर के बल टिके संघ को पैर के बल खड़ा करना जैसा कठिन है। संघ के लिए आसान शायद यही आजान पड़ता है कि वह सुदर्शनों को स्मृतिलोप में डाले और इस बात के लिए मुन्तज़िर हों कि लोग उसे अब नए अन्दाज़ में देखेंगे।

? सुभाष गाताड़े