संस्करण: 13 अगस्त-2012

क्या अब संघ परिवार

अन्ना टीम के सहारे सत्ता हथियाना चाहता है?

? वीरेन्द्र जैन

               क्षिण पंथ की राजनीति में अर्थ और आशय में बहुत अंतर होते हैं। नेताओं के बयानों के जो अर्थ होते हैं जरूरी नहीं कि उनका आशय भी वही हो। इस विषय पर आज से पच्चीस वर्ष पहले रमेश शर्मा की एक फिल्म आयी थी 'न्यू दिल्ली टाइम्स'जिसमें मीडिया का उपयोग करते हुए सत्ता की राजनीति के दोगले चरित्र का बहुत ही कुशल चित्रण था। माननीय श्री लाल कृष्ण अडवाणीजी की ताजा भविष्यवाणी को भी 'बिटवीन दि लाइंस' पढे जाने की जरूरत है जिसमें उन्होंने कहा है कि आगामी प्रधानमंत्री न भाजपा का होगा और न ही कांग्रेस का। इस भविष्यवाणी का भी वही आशय नहीं हो सकता जो इसका भाषायी अर्थ दे रहा है।

                 प्रमुख प्रश्न है इस भविष्यवाणी के समय का। 2014 अभी इतनी दूर है कि सामान्य अवस्था में श्री अडवाणीजी को अभी से ऐसी भविष्यवाणी करने की जरूरत नहीं थी जिससे गुजरात,हिमाचल प्रदेश,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों से पूर्व ही भाजपा कैडर में हताशा फैले। आम तौर पर चुनाव लड़ने वाले नेता तो अंतिम समय तक अपनी पार्टी की जीत होने की घोषणाएं करते हुए कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाये रखते हैं। अडवाणीजी के इस बयान के दौरान की प्रमुख घटना अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा अनशन समाप्त करके चुनाव लड़ने की घोषणा करना है। मँहगाई,बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा कांग्रेस शासन और राज्यों में समान आरोपों के साथ साम्प्रदायिकता का अतिरिक्त कलंक लिये भाजपा से भी जनता में निराशा छायी है इसको अडवाणी से पहले आरएसएस सूंघ चुका है और सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर चुका है। एक तीसरे विकल्प के प्रयोग की सम्भावनाएं बलवती दिखाई देने लगी हैं,जिसे इन दो दलों में से किसी की जरूरत पड़ सकती है। पर भाजपा के साथ गठबन्धन करने में प्रत्येक दल नाक भौं सिकोड़ता है, उनका साथ कोई भी दल किसी मजबूरी में ही लेता देता है, जिसका सर्वोत्तम नमूना बिहार में जेडीयू, के साथ उनकी बिहार में बनी राज्य सरकार है, जो उनके प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छुपाती। यही कारण रहा कि मीडिया और संघ परिवार के सहारे अपनी राष्ट्रव्यापी छवि बना चुकी टीम अन्ना ने चुनाव में उतरने की घोषणा कर दी। इस घोषणा से नकारात्मक मतों का छींका टूटने की आस में बैठी भाजपा का निराश होना सहज स्वाभाविक है क्योंकि वह मुख्य विपक्षी दल है। सम्भवत:अडवाणीजी ने इसी यथार्थ में से संघ परिवार के हस्तक्षेप के लिए जगह तलाशने हेतु परखी लगायी है।

                स्मरणीय है कि संघ परिवार बहुत पहले ही यह समझ चुका था कि साम्प्रदायिक संकीर्णता की राजनीति द्वारा वे कभी भी हिन्दुस्तान पर शासन नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने दूसरे के कन्धों पर बन्दूक रख कर चलाने की कोशिश की जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी रहे अन्यथा विचार के आधार पर उनकी हैसियत अकाली दल या शिवसेना से अधिक समर्थन जुटाने की नहीं है। वे आज जिस स्थिति में हैं उसके पीछे इसी चतुराई का हाथ रहा है। भले ही गैर-कांग्रेसवाद का नारा लोहियाजी ने दिया था किंतु उससे लाभ उठाने वाले संघ परिवार के लोग रहे हैं। 1967 में जब कांग्रेस के असंतुष्टों के नेतृत्व में संविद सरकारें बनना प्रारम्भ हुयीं तब उनमें आतुर हो सबसे आगे बढ कर सहयोग देने वालों में जनसंघ ही था। 1977 में तो उन्होंने अपनी पूरी पार्टी को ही जनता पार्टी में विलीन कर देने का दिखावा किया क्योंकि वे अपनी बदनाम पहचान से अधिक सत्ता के दुरुपयोग के अवसरों के लिए सदैव तत्पर रहते रहे हैं। जनता पार्टी की सरकार में उन्होंने तब भी शामिल होना स्वीकार किया जब इसका नेतृत्व कांग्रेस से बाहर निकले मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, हेमवती नन्दन बहुगुणा, आदि कर रहे थे। उनका यह विलीनीकरण नकली और षड़यंत्रकारी था इसलिए उनकी दुहरी सदस्यता के सवाल पर ही देश की पहली गैर-कांग्रेसी केन्द्र सरकार गिरी और ये लोग जैसे गये थे वैसे ही समूचे बाहर आ गये। इस बीच उन्होंने विदेश मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय का मंत्रीपद लेकर अपनी जड़ें मजबूत कीं। अडवाणी जी के कार्यकाल में बहुत बड़ी संख्या में संघ के लोग मीडिया जगत में प्रविष्ट करा दिये गये जिन्होंने उसे आज के दूसरे सबसे बड़े दल तक पहुँचाने में बड़ा योगदान दिया। जनसंघ नाम से कोई मोह न रखने के कारण उन्होंने भाजपा नाम से नया नामकरण कर लिया, व जनता के बीच अपनी स्वीकारता बढाने के लिए अपनी पार्टी के लक्ष्यों मैं 'गान्धीवादी समाजवाद' को जोड़ दिया। 1985 के लोक सभा चुनावों में दो सीटों तक सिमिट गयी इस पार्टी ने हिम्मत नहीं हारी और फिर नया कन्धा तलाशने में जुट गयी। जल्दी ही उसे जनमोर्चा बना कर कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह का साथ मिल गया और वे सुहाने सपने देखने लगे। पर दुर्भाग्य से चुनाव परिणाम ऐसे आये कि दोनों दल मिल कर भी सरकार बना सकने लायक संख्या बल नहीं जुटा सकते थे इसलिए उन्हें वामपंथी दलों के सहयोग की जरूरत पड़ी। बिडम्बना यह रही कि उन्होंने इस शर्त पर बाहर से समर्थन देना मंजूर किया कि भाजपा भी सरकार में सम्मलित नहीं होगी, सो वे मन मारकर रह गये। बाद में रामजन्म भूमि मन्दिर के नाम रथयात्रा के पीछे पीछे चलने वाले दंगों, बाबरी मस्जिद ध्वंस और मुम्बई बम विस्फोटों ने व्यापक ध्रुवीकरण किया जिसके सहारे 98 के बाद उनकी सीटें अधिक आ गयीं तब कांग्रेस के खिलाफ चुनाव जीत कर आये क्षेत्रीय दलों के सहयोग से उन्होंने सरकार बनाने की कोशिश की। यह कोशिश तब सफल हुयी जब सहयोगी दलों की शर्तों के अनुसार उन्होंने अपनी पहचान के तीन प्रमुख मुद्दे, रामजन्म भूमि मन्दिर निर्माण धारा 370, और समान आचार संहिता को अलग कर दिया। कर्नाटक में तरह तरह के दाग रखने वाले येदुरप्पा के आगे इन्होंने जिस तरह से आत्म समर्पण किया वह इनके सत्ता समर्पण की सर्वज्ञात ताजा कथा है। कहने का अर्थ यह है कि सत्ता के लिए समझौता परस्ती का उनका पुराना इतिहास है और मन वचन में भेद के सर्वोत्ताम राजनीतिक प्रतीक हैं। यही कारण है कि सत्ता के लिए सिध्दांतों से किंचित भी समझौता न करने वाले बामपंथी इनके सबसे बड़े स्वाभाविक शत्रु हैं।

                 जब यह सुनिश्चित हो गया कि अन्ना हजारे की टीम अब राजनीति में उतरेगी और निराश जनता के लिए तीसरी शक्ति के रूप में वह किसी उम्मीद की किरण लग सकती है तो उन्होंने सत्ता में उनके सहारे प्रवेश की सम्भावना तलाशी। बदनाम और राजनीतिक अछूत पार्टी की छवि से उबरने के लिए वे जनसंघ के विलीनीकरण की तरह पार्टी में कृत्रिम विभाजन भी दिखा सकते हैं जो टीमअन्ना की राजनीतिक पार्टी का समर्थक बनके प्रकट हो। आन्दोलन में सहयोग के कारण उनका साथ तो पुराना है। एक स्वीकार्य प्रतीक बनने के लिए भाजपा में वैचारिक विभाजन का माहौल प्रचारित किया जाने लगा। संघ के संजय जोशी और मोदी के मतभेद, अडवाणी और मोदी के मतभेद, केशुभाई और मोदी के मतभेद, धूमल और शांता कुमार के मतभेद, कोश्यारी और खण्डूरी के मतभेद, गडकरी और गोपीनाथ मुण्डे के मतभेद, अनंतकुमार और येदुरप्पा के मतभेद, वसुन्धरा और गुलाब चन्द्र कटारिया के मतभेद, शिवराज और उमा भारती के मतभेद आदि मतभेद जग जाहिर किये गये हैं। यदि इनमें से कुछ लोग सोची समझी तरकीब से एक अलग दल बना लेते हैं तो पहले से अंतर्सम्बन्ध और तीसरे विकल्प की उम्मीद पाले बैठी टीम अन्ना के साथ उनका गठबन्धान बन सकता है जिससे टीम अन्ना पर भाजपा से गठबन्धन की बदनामी का आरोप नहीं लग सकेगा। दल के नाम के प्रति वे वैसे ही बहुत भावुक नहीं होते ये जनसंघ के विलीनीकरण के समय देख चुके हैं। उनके लिए मूल चीज सत्ता में भागीदारी है वह किसी भी तरह मिले।

               बहुत सम्भव है कि यह एक अनुमान भर हो किंतु किसी भी तरह सत्ता से जुड़े रहने को कृत संकल्प संघ परिवार के राजनीतिक चरित्र को देखते हुए बेबुनियाद नहीं है। भाजपा के शिखर पुरुष अडवाणीजी का असमय का वक्तव्य अकारण नहीं हो सकता। संसद में घनघोर विरोध करने के बाद सुखराम से सहयोग ले लेने वाले, जयललिता से समर्थन ले लेने वाले, झारखण्ड में सत्ता से जुड़ने के लिए शिबू सोरेन के साथ गठबन्धन कर लेने वाले दल के पुराने घाघ राजनेता इस संकट काल में किसी न किसी तरह का मुखौटा लगा कर प्रकट होंगे, जिसकी एक सम्भावना यह भी है।

? वीरेन्द्र जैन