संस्करण: 13 अगस्त-2012

15 अगस्त : स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

स्वतन्त्रता : छियासठवें वर्ष में

? डॉ. गीता गुप्त

                 स्वाधीनता दिवस की छियासठवीं वर्षगांठ पर देश की उपलब्धियों का आकलन करते समय एक विशाल राजनीतिक पटल आंखों से गुजर रहा है, जिसमें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उसके मूल लक्ष्य स्वाधीनता प्राप्ति की कथा लिखी गई। एक प्रश्न भी मन में कौंध रहा है, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों, शहीदों और आन्दोलनकारी नेताओं ने जिस स्वाधीन भारत का स्वप्न देखा था, क्या वह स्वप्न साकार हो पाया ? वह स्वप्न ऐसे स्वतंत्र देश का था, जिसमें सबको रोटी मिले, सबको पीने का पानी मिले, सबके सिर पर छत हो, और विभिन्न क्षेत्रों में सभी को समान अवसर एवं सुविधाएं प्राप्त हो। मगर इन 65 वर्षों में क्या हुआ ? देश को अंगरेज़ों की गुलामी से तो मुक्ति मिल गई पर क्या हम अंगरेज़ों की नीति, संस्कृति, भाषा और विचारों की गुलामी से मुक्त हो पाये हैं ? स्वतंत्रता-आन्दोलन का लक्ष्य क्या महज आज़ादी पाना था ? नहीं। उसका उद्देश्य था-शोषण, अन्याय और असमानता से मुक्त एक समतामूलक समाज की स्थापना। क्या हम इस उद्देश्य की प्राप्ति कर सके हैं ?

                 देश की स्थितियां गवाह है कि हम कहने भर को आज़ाद है। दर हक़ीकत हम अंगरेज़ों की गुलामी से अधिक गुलाम हो गए हैं। हमारा 'अपना' कुछ नहीं रह गया है, 'नकल' ही हमारी संस्कृति हो गई है। आज़ादी के 65 बरस बाद भी 65 प्रतिशत जनता गरीब है। हमारी 15 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है, शेष मानसून पर निर्भर है। खेती चौपट, लघु उद्योग-धंधे नष्ट, राष्ट्रीय आय में निरन्तर कमी, सत्ताधारियों के खर्च में लगातार वृध्दि, राजनेताओं में देश के प्रति निष्ठा व अभाव जैसी बातें चिंताजनक हैं। पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक दलों ने अनवरत् अपनी विश्वसनीयता खोयी है। उनके सिध्दांत पीछे छूटते चले गए और जोड़-तोड़ की राजनीति द्वारा सत्तासीन होने की प्रवृत्ति सर्वोपरि हो गई है।

                आज देश की चुनौतियां बढ़ती जा रही है। किसानों का भविष्य दांव पर लगा है क्योंकि कृषि योग्य भूमि घटती जा रही है। बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता, स्त्रियों के प्रति हिंसा, सामाजिक अन्याय, दलितों/आदिवासियों की बदहाली, नक्सलवाद, धार्मिक उन्माद, आतंकवाद, साम्प्रदायिक दंगे जैसी कई समस्याएं हैं जोकि सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में बाधक हैं। हालांकि आर्थिक उन्नति तो हुई है। विज्ञान तकनीक के क्षेत्र में तथा उपग्रह-प्रक्षेपण, सुपर कम्प्युटर आदि के निर्माण की दिशा में भी अभूतपूर्व सफलता मिली और देश आर्थिक दृष्टि से उन्नति की ओर अग्रसर हुआ है। परन्तु आज भी जो सामाजिक अंधाविश्वास, रूढ़ियां, आर्थिक विषमताएं और अशिक्षा जैसी विसंगतियां व्याप्त है, वे राष्ट्र को कलंकित करती हैं। इन सबसे मुक्ति के बाद ही राष्ट्र का वह स्वरूप विकसित होगा जिसकी कल्पना गांधी, तिलक, आजाद, बिस्मिल, पटेल, भगतसिंह आदि स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी।

                निस्संदेह, आज भारत एक युवा और प्रतिभाशाली राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने है और महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि 84प्रतिशत भारतीय युवा मानते है कि आज सभी पैसा कमाने में व्यस्त हैं,देश की चिंता किसी को नहीं है। अपनी लगन और मेहनत के बल पर आगे बढ़ते महत्वकांक्षी युवा समूचे विश्व पर छा जाना चाहते हैं। लेकिन सामाजिक विद्रूपताओं के निराकरण हेतु कोई आन्दोलन छेड़ने का साहस उनमें नहीं है। उनके जीवन में नैतिकता का कोई स्थान नहीं। राजनीति को वे सेवा का माध्यम नहीं मानते। भ्रष्टाचार उनके लिए कोई गंभीर विषय नहीं रह गया है। देश के लिए उनका कोई सपना नहीं है,पैसा उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है और वे पैसा कमाने की अन्तहीन दौड़ में शामिल हैं। क्या यह चिन्ताजनक नहीं ?जिस युवा पीढ़ी को देश का भविष्य माना जाता है, उसका जीवन महज फास्ट फूड़, बाइक, क्रिकेट, म्यूजिक, कॅरियर और सेलिब्रिटेशन के लिए है। वह ऋण लेकर घी पीने में विश्वास रखती है और अधकचरा पाश्चात्य संस्कृति के प्रति दीवानगी के कारण बर्थ डे, मेरिज एनीवर्सरी डे, वैलेण्टाईन डे, मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेण्डशिप डे और न्यू ईयर मनाती है। स्वाधीनता के लिए शहीद होने वाले युवाओं की कथा में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं। स्वतंत्रता दिवस को वह पिकनित के रूप में मनाती है। ऐसे युवाओं से क्या आशा की जाए ?

                 स्वाधीनता दिवस हर वर्ष हमें उन सपनों की याद दिलाता है, जो आजादी की लड़ाई में शहादत देने वालों ने देखे थे। उन प्रश्नों की याद दिलाता है,जो अब तक अनुत्तरित हैं। उदाहरणार्थ,यह कैसी स्वाधीनता है कि संसद में अपनी राष्ट्रभाषा नहीं बोली जाती। राष्ट्रभाषा में न्याय नहीं मिला,शिक्षा नहीं दी जाती। यह कैसी स्वतंत्रता है कि आज भी दलित जन मंदिरों में प्रवेश से वंचित हैं ?कि अब भी रात को कोई लड़की शहर में अकेली नहीं निकल सकती। कि स्त्री पुरुष और अमीरी-गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। कि शोषण, पाखण्ड व भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होती जा रही हैं। इन सबके निराकरण हेतु शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक-अनेक रूपों में क्रांति की आवश्यकता है। तभी भारत का वास्तविक स्थान होगा। बौध्दिक रूप से विकलांग और नैतिक रूप से भ्रष्ट राजनेताओं से कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती। परन्तु युवाओं और प्रबुध्द नागरिकों को देश के काया-कल्प की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करनाचाहिए जिसमें सबकी उन्नति और खुशहाली हो। जैसे धारती सबकी है, आकाश सबका है, ठीक वैसे ही। मगर स्वतंत्रता दिवस पर पहले जैसी स्फूर्ति, उत्कंठा और देशभक्ति की भावना अब देखने को नहीं मिलती, इसका उत्साह और उल्लास विद्यालयीन बच्चों तक सिमटकर रह गया है अथवा धवनि विस्तारक यंत्रों में बजते गीत इस दिन की याद दिलाते हैं। ऐसा क्यों है ? जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें स्वतंत्रता दिलवायी, क्या उनके सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी हमें नहीं निभानी चाहिए ?    

? डॉ. गीता गुप्त