संस्करण: 13 अगस्त-2012

बारिश का मौसम और डिप्रेशन

? डॉ. महेश परिमल

                    चपन में पिताजी जब कहते कि आज बादल छा गए हैं, इसलिए हाथ-पाँव में दर्द हो रहा है। हम उनकी बातें सुनकर हँसते। भला बादलों से हाथ-पाँव का क्या संबंध? आज जब वही स्थिति हमारी है, तो समझ में आ रहा है कि सचमुच पिताजी सही कहते थे। इन दिनों बारिश भले ही न हो,पर बादल तो छाए ही रहते हैं। ऐसे में जब दो-तीन दिनों तक सूरज के दर्शन नहीं होते, तो हमारे भी हाथ-पाँव में दर्द शुरू हो जाता है। आखिर क्या कारण है बादलों का हाथ-पाँव से? आखिर बादलों के पास ऐसा क्या है, जिससे इंसान का मूड ही बदल जाता है? क्यों दिन भर सुस्ती लगती है? कोई फुर्तीला क्यों दिखाई नहीं देता, इन दिनों? आखिर क्या है इसमें कि काम पर भी जाने की इच्छा नहीं होती? कुछ तो है, आइए इस पर सोच-विचार करें-

               एक पति पत्नी से शिकायत रहा था कि बदली के इस मौसम में मुझे डर लगता है। इस मौसम में अगर कहीं बिजली चमके या बादल गरजें, तो मुझे भीतर से अकुलाहट होती है। बेचौनी घेर लेती है। मुझे लगता है कि अभी मुझे कुछ हो जाएगा। मैं उदास हो जाता हूं। नकारात्मक विचार आने लगते हैं। छोटे-छोटे काम करने की भी इच्छा नहीं होती। ऐसी स्थिति केवल उस युवा की ही नहीं,बल्कि अधिकांश लोगों की है। मानव एक संवेदनशील प्राणी है। हमारे आसपास होने वाली एक-एक घटना का असर हमारे मन पर पड़ रहा है। जिस तरह से गर्मी के तापक्रम का पारा बढ़ता है,उसी तरह हमारा गुस्सा भी बढ़ता है। कई बार जब हम ट्रेफिक में फंस जाते हैं,तब तो स्वयं पर काबू पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। वहाँ से निकलने के बाद जो मानसिक थकान होती है,वह बहुत ही जबर्दस्त होती है। ठीक उसी तरह बदली का मौसम भी हमारे जीवन पर असरकारी प्रभाव डालता है।

               बारिश की बूंदें और गरजते हुए बादल, तमाम तरह की निराशाओं और हताशाओं को भगा देते हैं। लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इस बात पर सहजता से भले ही विश्वास न हों लेकिन यह एक सच्चाई है कि बरसात का यह मौसम कुछ लोगों को डिप्रेशन में भी ले जाता है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट से पला चला कि सावन भादों के इन रोमांटिक महीनों में अकेलापन,तनाव,बेचौनी और डिप्रेशन का शिकार होने वाले लोगों की संख्या दूसरे महीनों के मुकाबले यादा होती है। नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ.गौरव गुप्ता का कहना है कि  मॉनसून आ चुका है। चारों तरफ काले बादल, कड़कड़ाती बिजली और ठंडी हवाएं चल रही हैं। वैसे तो इस मौसम का अपना ही लुत्फ है,लेकिन दिक्कत तब आती है,जब आप घर से स्कूल,ऑफिस या कॉलेज के लिए निकलते हैं और वहां आपको लंबी बस लाइन, ट्रेन लेट, सड़कों पर भरा पानी, ट्रेफिक की लंबी लाइन और न जाने कितनी सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में हो सकता है कि आप बारिश का मजा लेना छोड़कर यह सोचने लगे कि काश यह बारिश थमे और हम समय पर काम पर पहुंच सकें।

               इन दिक्कतों के अलावा, यह मौसम उन लोगों के लिए यादा मुसीबत बनकर आता है, जो थकान, आलस, काम में मन न लग पाना,छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव में आ जाने,जैसी दिक्कतों से गुजरते हैं। कई लोग तो इतने परेशान हो जाते हैं कि डिप्रेशन तक के शिकार हो जाते हैं। अगर आप भी इन दिनों ऐसी किसी समस्या से दो चार हो रहे हैं तो जरूरी है कुछ बातों पर गौर करना। उदासी के बादल, दुख के बादल, निराशा के बादल आदि उपमाएँ तो दी जाती हैं। पर सुख के बादल या फिर आनंद के बादल की उपमाएँ पढने को नहीं मिलती। हाँ आशा की किरण अवश्य सुनने-पढने को मिलता है। फिल्मों में भी जब नायक-नायिका उदास होते हैं,तो उस वातावरण को बदली से दिखाया जाता है। कितने ही चित्रकार ऐसे हुए हैं,जिन्होंने बादलों के माध्यम से उदासीनता को दर्शाया है। इससे यह कहा जा सकता है कि बादलों का डिप्रेशन से कुछ न कुछ तो संबंध है। मनोवैज्ञानिक इस बात पर तो सहमत हैं कि मन की स्थिति और बादलों के बीच एक तयशुदा संबंध हैं। इस समय मन हताशा से घिर जाता है। व्यक्ति डिप्रेशन में चला जाता है। हमारे वैज्ञानिक मानते हैं कि वास्तव में मन की यह दशा सूर्य प्रकाश न मिलने के कारण होती है। सूर्य प्रकाश की कमी ही हताशा को जन्म देती है। बदली के इस मौसम में इंसान को पर्याप्त मात्रा में सूर्य प्रकाश नहीं मिलता, इससे शरीर के अंतस्रावों विशेषकर मेलेनोसाइट स्टीम्युलेटी हार्मोन (एमएसएच) की मात्रा में बदलाव होता है। इसी कारण डीप्रेशन होता है। ऐसा दावा इसलिए किया गया,क्योंकि इस तरह के कुछ मरीजों के लिए कृत्रिम सूर्यप्रकाश की व्यवस्था की गई, तो उनके डिप्रेशन में कमी देखी गई। इसे सिजनल डिप्रेशन कहा जाता है। एक शोध के अनुसार अक्टूबर से शुरू होकर फरवरी तक इस तरह के मरीज कम ही देखने में आते हैं। इस दौरानं सूर्य प्रकाश की कमी नहीं होती, इसलिए मरीज भी कम हो जाते हैं। यह भी देखा गया है कि इस दौरान कुछ काल-कवलित डिप्रेशन बाहर आ जाते हैं। यानी बरसों बाद ये डिप्रेशन पुनरू बाहर आकर व्यक्ति को परेशान करने लगते हैं। डिप्रेशन के नए मरीज भी इसी बदली के मौसम सामने आते हैं।

                 रिसर्च से पता चला है कि सूरज की रोशनी कम होने और आसमान में काले बादल छाए रहने से हमारे दिमाग में सेरॉटोनिन केमिकल का निर्माण कम होता है ,जिसका सीधा असर हमारे मूड पर पड़ता है। जब यह कम बनता है , तो मूड नॉर्मल नहीं रह पाता , जिससे व्यक्ति को उदासी , बेचौनी और डिप्रेशन होने लगता है। कुछ लोगों पर यह केमिकल ज्यादा असर करता है और कुछ पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

               यही नहीं, अगर कई दिनों तक लगातार बारिश होती है , तो कई लोग सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर के शिकार भी हो जाते हैं। आमतौर पर वैसे यह दिक्कत सर्दियों में होती है ,लेकिन कुछ लोग इस सीजन में भी इससे ग्रस्त रहते हैं। यह डिप्रेसिव मूड डिसऑर्डर की तरह ही है और आमतौर पर महिलाओं को होता है। यह रोशनी के कम - ज्यादा होने से होता है। अगर आप हाउस वाइफ हैं और आपका बार -बार मीठा और स्टार्च युक्त चीजें खाने और साथ ही अंधेरे और ठंडी हवा में सोने का भी मन करता है ,तो समझ जाएं कि आप सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। यह डिसऑर्डर आपको आलसी बना देता है। इससे सिर में दर्द रहता है , जिससे स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। थकान और उदासी छाई रहती है। अगर आप इस डिसऑर्डर से कई दिनों तक परेशान रहें,तो डॉक्टर को अवश्य दिखाएं। इसके अलावा जो लोग रात पाली में काम करते हैं,उन्हें भी सूर्य का प्रकाश पूरी मात्रा में नहीं मिल पाता, इसलिए वे भी डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। दूसरी ओर दिन में अपने एसी कार्यालय में काम करने वाले,जहाँ केवल टयूब लाइट ही होती है, ऐसे में काम करने वाले लोग भी सूर्य प्रकाश की कमी के कारण डिप्रेशन में आ सकते हैं।

               अगर आप डिप्रेशन से बाहर आना चाहते हैं , तो बारिश को तरह-तरह से इंजॉय करें। नेचर की खूबसूरती को निहारें। अगर आप उनमें से हैं , जिन्हें बारिश के मौसम में गंदा और जीवाणु होने का भय सताता है , तो समझ जाएं कि आप ऑब्सेसिव कम्पलसेंसिव डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को साफ-सफाई बेहद पसंद होती है और वे ऐसे मौसम में बाहर निकलने से घबराते हैं। अगर आप उन लोगों में से एक हैं ,जो रोजाना बारिश के डर से अम्ब्रेला या रेनकोट कैरी करते हैं , तो भी आपको डॉक्टर को दिखाने की जरूरत है। ऐसे लोगों को हमेशा यही डर लगा रहता है कि कहीं बारिश न आ जाए और हमारे ड्रेस व शूज गंदे न हो जाएं।

कैसे पाएँ छुटकारा

n सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर को कम करने के लिए एक्सरसाइज करें। एक्सरसाइज आपके मूड को बदलने में भी बेहद मदद करती है। जहां तक संभव हो, आराम करें। अपनी डाइट बैलेंस रखें और खाने में न्यूट्रिशंस शामिल करें।

n जब भी फुर्सत मिले , अपनी पसंदीदा किताब पढ़ें। मनपसंद सगीत या गाने सुनें और फिल्में देखें। ऐसी चीजें करें, जो आपको खुशी दे। बारिश में गरमा-गरम  पकौड़े आपके मूड को बदलने में मदद करेंगे।

n बारिश में भीगने की इच्छा नहीं है , तो घर की खिड़की से बारिश का नजारा लें। साथ ही, ग्रीन टी, लेमन टी या सूप पीना भी आपको खुश कर देगा।

n बारिश के मौसम में बाहर घूमने जाएं। अगर संभव हो , तो गरमा-गरम भुट्टे भी खाएं। बारिश से जुड़ी चीजों की शॉपिंग करें।

n इस मौसम में सड़क किनारे लगने वाले ठेलों से चाट-पकौड़े खाने से बचें।

n साफ पानी पिएं। लंबे समय तक गीले कपड़े पहनकर न रहें।

n बारिश से लौटकर जब भी घर आएं , तो नहाएं जरूर।

n बारिश के मौसम में अपने परिवार या दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाएं।

                इस तरह छोटी -छोटी चीजों का धयान रखने से आपके लिए अपने मॉनसून डिप्रेशन से बाहर आना आसान हो जाएगा। इस दिशा में अभी शोध जारी है निश्चित ही कुछ समय बाद कुछ नए तथ्यों का इसमें समावेश हो जाए।

? डॉ. महेश परिमल