संस्करण: 13 अगस्त-2012

विकास की राह पर कुपोषित राज्य

 

? राखी रघुवंशी

                  स देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। खुली अर्थव्यवस्था,बाजारवाद और नव उपभोक्तावाद की चकाचौंध में कई मूलभूत समस्याएं सरकारी फाइलों में और समाज के बदलते दृष्टिकोण के चलते दबकर रह जाती हैं। गरीबी,बदतर स्वास्थ्य सेवाएं और अशिक्षा के साथ-साथ बच्चों का बढ़ता कुपोषण भारत में एक बड़ी समस्या है । यूनिसेफ द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के उन देशों में भारत शुमार है,जहां यह संख्या अत्यधिक है। एशिया में अफगानिस्तान के बाद भारत वह देश है,जहां पांच वर्ष से कम उम्र के कुपोषित बच्चों की संख्या करोड़ों में है। यूनिसेफ रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या छह करोड़ से अधिक है और इस मामले में हम पाकिस्तान और नेपाल जैसे पिछड़े और छोटे देशों से भी पीछे हैं।

                 कुपोषण कई वर्षो से एक बड़ी समस्या रही है पर योजना आयोग व महिला बाल विकास मंत्रालय और राज्य सरकारों की सामाजिक उत्थान की अनेक योजनाओं के बावजूद पांच वर्ष की आयु से नीचे के कुल बच्चों में से यदि 45प्रतिशत कुपोषित हैं तो यह इक्कीसवीं सदी में अग्रणी बनने की होड़ में लगे इस देश में आर्थिक वृध्दि दर बढ़ाने की कई योजनाओं पर सवाल लगाती हैं। इन योजनाओं के मूल में समग्र समाज की बेहतरी ही है,पर अनेकों कारणों से सरकारी पैसा इन योजनाओं के लाभान्वितों के पास नहीं पहुंच पाता है। हमारे देश में लगातार बढ़ रहे कुपोषण का प्रमुख कारण भ्रष्टाचार भी है। यह बात सही है कि देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, फिर भी बच्चों का कुपोषण और उसके फलस्वरूप होने वाली अकाल मौतें किसी भी प्रगत समाज के लिए शर्म की बात है। इस मामले में मध्य प्रदेश काफी बदनाम रहा है प्रदेश के आंकड़े बताते है कि कुपोषण का प्रतिशत 60के आसपास है। बीते साल कुपोषण से प्रदेश के चार जिलों खंडवा, सतना, सीधी और श्योपुर में 169 बच्चे काल के गाल में समा गए थे। बच्चों की इन मौतों से सरकार की भी खूब किरकिरी हुई थी। प्रदेश सरकार अब कुपोषण से मुक्ति पाने के लिए थाईलैंड मॉडल को अपनाने की तैयारी कर रही है। प्रदेश में कुपोषण के लिए थाईलैंड मॉडल अपनाने के प्रयासों को स्वयं सेवी संगठन गलत करार देते है। आज जरूरत महिलाओं और बच्चों को ऐसे पोषण आहार की है जो उनकी सेहत को ठीक रह सके। यह तभी मिल सकता है जब उनकी आय का इंतजाम किया जाए। सिर्फ बाल संजीवनी केन्द्र में कुपोषित बच्चों को कुछ दिन रखकर उन्हें तंदुरूस्त नहीं बनाया जा सकता। महिलाओं और बच्चों के बीच लंबे अरसे से काम कर रह संगठन गरीबों को बांटे जाने वाले पोषण आहार की गुणवक्ता पर ही सवाल खड़े करत है। उनका कहना है कि आंगनवाड़ी केन्द्रों से ऐसा पोषण आहार मिल रहा है जो बच्चों और महिलाओं को कुपोषण से बचाने की बजाए कुपोषित बना देने वाला है। कुपोषित बच्चे को 15 दिन तक पुनर्वास केन्द्र में रखा जाता है, मगर कुछ दिन बाद वह बच्चा फिर उसी हाल में लौट आता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके पालक के पास रोजगार ही नहीं है तो वह बच्चे को खिलाए क्या। सरकार की जिम्मेदारी है कि पहले रोजगार का इंतजाम करें। ऐसा नहीं होता है तो कुपोषण से भी मुक्ति नहीं मिलेगी।

                कहना न होगा कि देश के बच्चों में कुपोषण आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अनाधिकारिक आंकड़े तो यहां तक कहते हैं कि हर साल कुपोषण की वजह से देश में हजार से ज्यादा बच्चे काल की गाल में समा जाते हैं। सरकारी आंकड़ों को देखते हुए इस बात पर शक करने की गुंजाइश भी नहीं बचती। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में तीन साल से कम उम्र के 46फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ऐसे बच्चों को बचपन की बीमारियों से जान गंवाने का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में आठ गुना अधिक होता है। उल्लेखनीय है कि 1998-99के अंत में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या 47फीसद थी। यानि बीते दस सालों में कुपोषण के स्तर में महज एक फीसद की कमी आई है।

               अहम सवाल यह है कि आखिर बच्चों के कुपोषण के पीछे कारण क्या है? सबसे पहले तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक तंगी बच्चों के कुपोषण की बड़ी वजह है। व्यावहारिक धरातल पर इस तर्क की सत्यता चाहे जो भी हो लेकिन आंकडे इससे मेल नहीं खा रहे हैं। भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या 26 फीसद है। कुपोषित बच्चों की संख्या इसके आसपास न होकर 46 फीसद है। एक बात और कि इस रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात और उत्तर प्रदेश में तय मानक से कम वजन के 47 फीसद बच्चे हैं। गौरतलब है कि गुजरात की प्रति व्यक्ति आय और उत्तर प्रदेश के प्रति व्यक्ति आय में बहुत फर्क है। पर दोनों राज्यों में बच्चों की हालत कम से कम कुपोषण के मामले में समान है।

                कुपोषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार अगर कोई कारण है तो वो यह कि गर्भवती महिलाओं को आवश्यक भोजन और सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। जब मां ही कुपोषण का शिकार हो जा रही है तो फिर वह जिस बच्चे को जनेगी वह भला स्वस्थ्य कैसे हो सकता है। गर्भवती महिलाओं की खराब स्वास्थ्य की वजह से ही कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में पैदा होने वाले बच्चों में से तकरीबन तीस फीसद बच्चे जन्म के वक्त तय मानक से कम वजन वाले होते हैं।

               बच्चों के कुपोषण के पीछे दूसरी बड़ी वजह स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। आवश्यक टीके भी अपेक्षाकृत कम बच्चों को ही मुहैया हो पा रहे हैं। इस समस्या को गहराने के लिए लोगों में जागरूकता का अभाव भी काफी हद तक जिम्मेवार है। इसके अलावा सरकारी उदासीनता भी इस समस्या को बढ़ाने में कम जिम्मेदार नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक आधा से ज्यादा बच्चों का जन्म आज भी बगैर किसी चिकित्सीय देखरेख के हो रहा है। जाहिर,जब ऐसा होगा तो कई खतरों का सामना इन बच्चों को स्वभाविक तौर पर करना पड़ेगा।

                   बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाना भी कुपोषण की बड़ी वजह है। जानकारों के मुताबिक चार से छह माह के बच्चों को मां के दूध के अतिरिक्त भी कुछ दिया जाना चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक छह से नौ माह के मात्र 56फीसदी बच्चों को ही मां के दूध के अतिरिक्त कुछ खाद्य पदार्थ मिल पा रहा है। इसलिए छह माह से आठ माह के उम्र में ही ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। क्योंकि यही वह दौर होता है जब मां का दूध घटने लगता है। जिससे बच्चे को मिलने वाले पोषक तत्वों में भी कमी आती है।

                बहरहाल, गर्भवती महिलाओं का शक्षणिक स्तर भी बच्चों के कुपोषण को दूर करने में आड़े आ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक कम से कम दस साल की स्कूली शिक्षा ग्रहण गर्भवती महिलाओं के बच्चों में 26 फीसद कुपोषण के शिकार हैं। जबकि अशिक्षित महिलाओं के बच्चों में से पचपन फीसद कुपोषण की मार झेल रहे हैं। इसलिए महिलाओं तक स्वास्थ्य संबंधित जानकारियां पहुंचाना बेहद जरूरी है। हालांकि, सरकार की तरफ से जागरूकता के बहुत बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि ये दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। इसे स्वास्थ्य सुविधाओं की दुर्दशा ही कहना होगा कि अभी भी देश में पांच साल से कम उम्र के हजार बच्चों में से 95 काल के गाल में समा जा रहे हैं। उड़ीसा में यह संख्या सबसे अधिक 98 है तो केरल में सबसे कम चौदह है। बताते चलें कि शिक्षा के मामले में केरल की हालत बेहतर है जबकि उड़ीसा की हालत उतनी अच्छी नहीं है। अगर केरल में पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मरने की संख्या कम है तो जाहिर है कि इसमें वहां के शिक्षा स्तर का अहम योगदान है। वहीं उड़ीसा में शिक्षा की हालत उतनी अच्छी नहीं है और इस वजह से वहां इस आयु वर्ग में जान गंवाने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसलिए अगर सही मायने में सरकार कुपोषण की समस्या से पार पाने को लेकर प्रतिबध्द है तो उसे दूसरे जरूरी उपायों के अलावा शिक्षा के प्रसार पर भी विशेष जोर देना चाहिए।

? राखी रघुवंशी