संस्करण: 13 अगस्त-2012

मन के हारे हार है...

?     विवेकानंद

                म हमेशा से सुनते आ रहे हैं मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। यानि जिनका मन उत्साह और विश्वास से भरा हो सफलता उन्हीं को मिलती है, नीरस और निरुत्साही मन आलस्य और पराजय का प्रतीक है। लेकिन मन में विश्वास और उत्साह का संचार तभी होता है जब विचार दूषित न हों और भावनाओं में कपट न हो, स्वार्थ का मैल न हो, संदेह की दरार न हो। स्वार्थ की नींव पर विश्वास की इमारत कभी नहीं खड़ी हो सकती, यदि कोशिश की गई तो उसका गिरना भी तय है। भाजपा के विद्वान नेता लालकृष्ण आडवाणी इन बातों को भली प्रकार समझते हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने इन परिस्थितियों से कई बार साक्षात्कार किया है। यदि वे कहते हैं कि इस बार भी भाजपा की सरकार नहीं बनेगी तो यह तय मान लीजिए कि भाजपा की सरकार नहीं बनेगी। अलबत्ता उन्होंने यह बात कांग्रेस को लपेटते हुए कही है,इसके लिए बुजुर्ग नेता की राजनीतिक मजबूरी समझी जा सकती है। जिस पार्टी को प्रण-प्राण से सींचा उसकी दुर्दशा का बयान वे सीधे-सीधे कैसे कर दें?इस सहज संकोच के कारण उन्होंने कांग्रेस की वापसी की उम्मीद भी क्षीण बता दी। बहरहाल आडवाणी जी की भविष्यवाणी जनता की कसौटी पर कितनी खरी उतरती है,इसका परिणाम आने में दो साल शेष हैं। इस दौरान राजनीतिक कितने करवट लेगी कोई नहीं कह सकता,लेकिन इतना तय है कि भाजपा में हताशा चरम पर पहुंच चुकी है। कारण चाहे अंतर्कलह हो,नेताओं की महत्वाकांक्षा हो या फिर लगातार मिल रहे निराशाजनक परिणामों का नतीजा।

                पिछले आम चुनावों में मिली पराजय के बाद से देखें तो भाजपा के नेताओं में पार्टी की वापसी के लिए जनता के बीच जाकर काम करने के बजाए खुद के अहंकार को पोसने की रस्साकशी चल रही है। शुरूआत में तो इसी बात को लेकर सिर फुटब्बल होती रही कि हार का जिम्मेदार कौन है?कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं दिखा तो अंतत:सामूहिक जिम्मेदारी मानकर मामले का पटाक्षेप किया गया। इससे उबरे ही थे कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रकरण सामने आ गया। उन्होंने पार्टी आलाकमान को तिगनी का नाच नचा दिया। इसके बाद तो खुद को पार्टी से बड़ा साबित करने की मानो होड़ लग गई। कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पार्टी से दक्षिण भारत में पहली सरकार बनाने का अहसान जताने लगे, नरेंद्र मोदी ने तो भाजपा को छोड़ो मातृ संस्था संघ को ही ठेंगा दिखा दिया। नतीजा राजस्थान, कर्नाटक और गुजरात में पार्टी दो फाड़ हो चुकी है। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा और सदानंद गोड़ा के बीच मुकाबला शुरू हो गया है राजस्थान में वसुंधरा राजे और गुलाबचंद कटारिया में टक्कर है तो गुजरात में केसूभाई पटेल ने परिवर्तन पार्टी बनाकर मोदी को मात देने की तैयारी कर रखी है। ऐसे में यदि आडवाणी जी भविष्यवाणी करते हैं कि भाजपा आम चुनाव नहीं जाती सकती तो गलत क्या करते हैं? आखिर उनका राजनीतिक अभुनव है और उन नेताओं से कई गुना यादा है जो खुद को पार्टी से बड़ा साबित करने पर उतारू हैं। दूसरी बात, पार्टी का कोई एजेंडा नहीं है, उसके पास कोई मुद्दा नहीं है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दिखावटी गुस्सा और महंगाई पर झूठा और खोखला विरोध उसके पास है। जनता बेशक महंगाई से परेशान हैं लेकिन वह बेहतर तरीके से जानती है कि इसके पीछे सरकार की नीतियां नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियां अधिक जिम्मेदार हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि जनता को राहत देना सरकार की जिम्मेदारी है,लेकिन उसके लिए यह प्रचारित किया जाए कि सरकार जानबूझकर विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए यह सब कर रही है, समझ से परे है। जनता इस झूठ को समझ रही है। भाजपा नेताओं में भले ही कुछ गुमान हो लेकिन आडवाणी जी चूंकि ऐसे कई दौर देख चुके हैं, पोखरण परमाणु विस्फोट और स्वर्णिम चतुर्भुज के सहारे भारत उदय और इंडिया साइनिंग के अतिविश्वास का हस्र क्या हुआ था, यह वे भली प्रकार जानते हैं। इसलिए पार्टी की मौजूदा हालत देखकर वे कह सकते हैं कि 2014 में भाजपा का प्रधानमंत्री नहीं होगा।

               इसका एक और बड़ा कारण है समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन का अपने ही लोगों की स्वार्थ की भेंट चढ़ना। इस आंदोलन से भाजपा को बड़ा सहारा मिला था।  हालांकि भविष्य में टीम अन्ना शायद वही करेगी जो पहले आंदोलन के रूप में कर रही थी, यानि कांग्रेस को कोसो और भाजपा को पोसो। लेकिन अब बात बिगड़ चुकी है। आम आदमी जिन्हें यह दिखाया गया था कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है, उनके सामने कलई खुल चुकी है। अब यदि टीम अन्ना भाजपा  के पक्ष में सीधे-सीधे भी प्रचार करे तो भी भगवा दल को वह लाभ नहीं मिलेगा जो वह आंदोलन के रूप में पाना चाहते थे। इस आंदोलन से भाजपा को क्या नफा होता या क्या नुकसान होगा यह भी दो साल बात ही पता चलता, लेकिन हालिया जो नुकसान देश को हुआ है उसकी पूर्ति बड़ी मुश्किल है। जन लोकपाल बिल को लेकर चलाए गए आंदोलन का अंतत:यही होना था। आंदोलन खत्म कर दिया गया और इसके लिए बनी अन्ना हजारे की कथित टीम भंग कर दी गई। दुख आंदोलन के खत्म होने का नहीं है और न ही टीम अन्ना के भंग होने का। अफसोस इस बात का है कि अब फिर से किसी भी जनहित के पावन कार्य के लिए जनता, खासतौर पर युवा इस भरोसे से खड़े होंगे इसमें संदेह बढ़ गया है। हालांकि बहुतेरे ऐसे लोग जिन्हें केवल बोलना है या जिन्होंने केवल फेसबुक और टि्वटर पर अपना संसार बसा लिया है, जिन्हें लगता है कि बस यही भारत है, वे कह रहे हैं कि कुछ नहीं हुआ है, लेकिन वास्तव में जो भारत है, जहां से युवा शक्ति ने अन्ना के आंदोलन को ऊर्जा दी थी उसके विश्वास को करारी चोट लगी है।

               डेढ़ साल पहले जब यह आंदोलन शुरू हुआ था, मैंने कहा था इसकी सफलता और असफलता दोनों में ही अंतत: नुकसान देश का होना है। सफल होने पर लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा जाएगी और असफलता लोगों के विश्वास को खंडित कर देगी, जो लोगों ने अन्ना हजारे पर जताया था। बहरहाल टीम अन्ना अब राजनीतिक विकल्प देने की बात कर रही है, यह कितना सफल होगा या आंदोलन की तरह ही राजनीतिक विकल्प का अभियान भी बीच रास्ते में दम तोड़ देगा, यह देखना होगा। लेकिन यह अभी सोचना होगा कि ऐसी क्या वजहें रही जो एक लोकप्रिय जन आंदोलन ने चरम छूने के बाद लेकिन लक्ष्य प्राप्ति से पहले ही दम तोड़ दिया? क्या अन्ना अपनी टीम की हरकतों से परेशान हो गए थे? क्या टीम अन्ना इतनी उकता गई थी कि अब उसे और इंतजार बर्दाश्त नहीं था? ऐसे अनेक सवाल हैं। लेकिन वस्तुत: इस आंदोलन के खत्म होने के पीछे कोई एक सवाल नहीं है, बल्कि कई सवाल मौजूद हैं। जब आंदोलन की शुरूआत हुई थी तब टीम, अन्ना हजारे की बात को पत्थर की लकीर की तरह मानती थी, लेकिन जैसे-जैसा आंदोलन आगे बढ़ता गया, मीडिया में टीम को पांडव कहा जाने लगा तो अभिमान बढ़ने लगा। दूसरी ओर टीम के सदस्यों की पोल खुलती गई, जिससे लोगों में भरोसा घटता गया। टीम के अभिमान का बढ़ना और आम लोगों के भरोसे की कमी मुंबई में हुए अनशन में देखने को मिली,जब अन्ना हजारे को समय से पहले अनशन खत्म करना पड़ा। अरविंद केजरीवाल सहित समूची टीम ने शायद इसे अन्ना की लोकप्रियता का ह्रास समझा और इसके बाद से उनको कई मौकों पर नजरअंदाज किया जाने लगा। मुंबई में जो हुआ वह अन्ना की लोकप्रियता का नहीं बल्कि टीम की उजागर हो रही कारगुजारियों का नतीजा था। अन्ना ने आखिर इसे दिल्ली में सच साबित कर दिया। पहले चार दिन जब टीम अनशन पर बैठी तो लोगों का सूखा था और जब अन्ना बैठे तो लोग उमड़ पड़े। लेकिन स्वार्थ की दीमक आंदोलन की नींव को खोल कर चुकी थी। इसलिए अन्ना की टीम राजनीतिक दिशा की ओर मुड़ गई। और सामने आ गई वह सच्चाई कि टीम की इच्छा भ्रष्टाचार मुक्त देश नहीं बल्कि सत्ता की शक्ति को हथियाना था। टीम अपने मुताबिक लोकपाल इसलिए चाहती थी, ताकि उसमें दी गई शर्तों के अनुसार टीम के सदस्य लोकपाल बॉडी में शामिल हो जाएं। जब सरकार ने नहीं सुनी तो अब राजनीति के रास्ते उन लोगों के सहारे सत्ता पाना चाहते हैं जिन्होंने सोशल मीडिया को पूरा हिंदुस्तान समझ लिया है। वास्तविकता अन्ना हजारे जानते हैं, इसलिए उन्होंने साफ कर दिया है कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। क्योंकि अन्ना यह भी जानते हैं कि भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के और भी कई रास्ते हैं। उन्होंने भारी मन से आंदोलन को एक ऐसी राह पर मोड़ दिया जहां टीम को यह अहसास हो जाएगा कि राजनीति गुड्डों-गुड़ियों का खेल नहीं है। यहां जिद नहीं जद्दोजहद करने पड़ती है। अन्ना की नफरमान टीम को यह अहसास जल्द ही हो जाएगा। लेकिन देश को रंज रहेगा कि अन्ना हजारे जैसे आदमी को जीवन में पहली बार उन लोगों के कारण ऐसा निराशाजनक निर्णय लेना पड़ा, जिन पर उन्होंने अटूट विश्वास किया था।

? विवेकानंद