संस्करण: 13अप्रेल-2009

लोक लुभावन नारा और सस्ता अनाज

 


प्रमोद भार्गव

      ताजा घोषणा पत्र के साथ कांग्रेस कथित आर्थिक सुधारों से मुंह मोड़ती दिखाई दे रही है। दो दशक पहले भारत की जो अर्थव्यवस्था अंतर्मुखी थी उसे उदारवादी नीतियों के तहत बहिर्मुखी करने के तमाम उपक्रम करते हुए बाजार को जन - उत्थान का माई-बाप मान लिया गया था। अब इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिस अर्थशास्त्री और आर्थिकसुधारों के प्रणेता मनमोहन सिंह ने भूमण्डलीकरण को बढ़ावा दिया, वही अब लोक-लुभावन नारों के साथ गरीब को सस्ता अनाज देने का वादा कर रहें हैं। सच पूछा जाए तो कांग्रेस आम-आदमी को समृध्द बनाने की दृष्टि से कोई रचनात्मक उपाय करने की बजाए एक बड़ी आबादी के हाथ में मधयान्ह भोजन की तरह भीख का कटोरा थमाने का काम कर रही है। कुछ ऐसी ही नीतियों की अनुगामी बनती हुई भाजपा ने भी अपने घोषणा पत्र में दो रूपये प्रति किलो अनाज देने का लोक लुभावन वादा गरीब जनता से किया है। जबकि इन घोषणा पत्रों में गरीब को प्राकृतिक संपदा से जोड़ कर उसकी क्रय शक्ति बढ़ाने और स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के उपाय संबंधी वादों की प्रतिच्छाया होनी चाहिए थी।

कांग्रेस के चुनावी घोषणा-पत्र में जनता से वादा किया है कि वह गरीबों को तीन रुपये किलो अनाज देगी। सच पूछा जाए तो ये वादे वोट की राजनीति के चलते लोक लुभावने जरुर हैं गरीब के स्थायी रुप से हित साधाने वाले नहीं हैं। कांग्रेस ने यह भ्रम जरुर बनाने की कोशिश की हैं कि उसका हाथ आम-आदमी के साथ है। इस चुनावी इरादे के साथ वह गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली आबादी को तीन रुपये किलो अनाज तो देगी ही, आर्थिक अनुदान के बूते सस्ते सामुदायिक भोजनालय, गरीब परिवारों को सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा की सुविधा और ग्रामीण रोजगार गारंटी में जरुरी सुधार किये जाने के लुभावने वादे भी कर रही हैं।

दरअसल इस तरह के फौरी लाभ पहुंचाने वाले वादों की शुरुआत आठवें दशक में आंधारप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव ने कीं थी। उन्होंने राज्य में दो रुपये किलो के भाव चावल उपलब्धा भी कराया। लेकिन देखते - देखते प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। आखिरकार पांच साल वादा निभाने के वायदे से रामाराव मुकर गए और उन्होंने इस लोक हितकारी फैसले को उलट दि उलट दिया। वोट बटोरने के तात्कालिक लाभ के लिए कुछ अन्य नेता भी ऐसी योजनाएं अमल में लाए लेकिन उनका हश्र भी आंधारप्रदेश की तरह ही हुआ। अब आंधा्र में फिर से चन्द्रबाबू नायडू सस्ता चावल मुहैया कराने की शर्त पर चुनाव समर में हैं। हालांकि पांच साल पहले जब नायडू आंधारप्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने भी आर्थिकसुधारों की शुरुआत की थी।

जन कल्याणकारी योजनाओं को दी जाने वाली छूट सबसिडी भी प्रतिबंधित कर दी थी। इस कार्यवाही पर विश्व बैंक ने उनकी पीठ भी खूब थपथपाई थी। उनके आधुनिक विकास कार्यों को एक मिसाल भी माना जाने लगा था। लेकिन असमानता बढ़ाने वाली ये योजनायें आम आदमी को पसंद नहीं आईं, नतीजतन उनके दल को पराजित होना पड़ा। तमिलनाडू में करुणानिधि और ओड़ीसा में नवीन पटनायक भी सस्ते चावल के वादे के साथ पांच साल पहले सत्ता में आए थे। लेकिन यह चावल गरीब के पेट में गया अथवा कालाबाजारी का शिकार होकर पूंजीपतियों की तिजोरी में, इसका जवाब तो जनता आने वाले विधानसभा चुनाव में देगी।

ये योजनाएं निश्चित रुप से अच्छी हैं लेकिन इनका अमल उस सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर है जो देश व्यापी भ्रष्टाचार की गुंजलक में जकड़ी है और इसे दुरुस्त बनाने में न राजनीतिक दलों की रुचि है और न ही सरकारी अमले की ? हां, गरीब की भूख के हिस्से का गेहूं- चावल की कालाबाजारी कर काले धान की बंदरबाट में सब शामिल हैं।

दरअसल, आर्थिकसुधारों के अब तक जितने भी उपाय सामने आए, उनसे गरीब के हित कतई नहीं सधो। इसीलिए उनमें इन उपायों के प्रति कोई उत्साह दिखाई नहीं देता। गरीब उत्साहित, उत्प्रेरित होकर मुख्यधारा में शामिल हों इसके लिए दरअसल ऐसे बुनियादी उपायों की जरुरत है, जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़े। विकास की अवधाारणा न्यायसंगत होने के साथ समावेशी साबित हो। शायद इसीलिए सस्ते अनाज के साथ नौकरियों में आर्थिक आधाार पर आरक्षण के साथ विधानमंडलों में महिलाओं के 33 फीसदी और पंचायतों व नगर पालिकाओं में युवाओं के लिए आरक्षण उपलब्धा कराने की बात कही गई हैं। हालांकि इस तरह के वादे मायावती के साथ अन्य दल भी कर रहे हैं। लेकिन ये वादे खयाली पुलाव पकाने की दृष्टि से वोट बटोरने के तात्कालिक उपाय भर हैं क्योंकि वाकई राजनीतिक दल महिलाओं व युवाओं के इतने ही हितैषी हैं तो वे इनकी मदद कानून में प्रावधान लागू होने के बाद ही क्यों करना चाहते हैं, अपने-अपने दलों में तत्काल महिलाओं और युवाओं को टिकट देने की प्रक्रिया के साथ शुरु क्यों नहीं कर देते ? महिला आरक्षण विधोयक को पास कराने में कांग्रेस सरकार ने उतनी दृढ़ता व दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई जितनी परमाणु करार की शर्तों को अमल मे लाने के लिए लोकसभा में दिखाई। इससे जाहिर होता है कि महिला आरक्षण राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में नहीं है। न्यायसंगत व समावेशी विकास की अवधारणा के तहत ही कांग्रेस ने किसानों को लुभाने के लिए तीन प्रमुख वादे किए हैं। एक, भूमि अधिग्रहण के तहत जो जमीन ली जाए, उसकी बाजार दर से कीमत तय हो। दो, जो किसान बैंक कर्ज चुका रहे हैं, उन्हे ब्याज में राहत दी जाएगी। तीन, खेती को लाभकारी बनाया जाएगा। लेकिन जिस भ्रामक भाषा में कांग्रेस ने वादे किए हैं उनसे यह जाहिर होता हैं कि वह वर्तमान नीतियों और प्राथमिकताओं को आगे भी जारी रखने के लिए हकीकत पर पर्दा डालने का काम कर रही है। क्योंकि भूमि अधिग्रहण संबंधी शर्त में बाजार मूल्य से भूमि की कीमत चुकाने की बात तो कही गई है लेकिन किसान को न तो कारखाने में शेयर धाारक बनाए जाने की बात कही गई है और न ही किसान परिवार के किसी सदस्य को कारखाने में नौकरी देने की शर्त रखी गई है। खेती को लाभकारी बनाने का वायदा भी कांग्रेस ने किया है, लेकिन कृषि में आर्थिकसुधारों के चलते जो 2.2 की गिरावट आई है उसमें कैसे उभार लाया जाएगा इसका कोई संकेत नहीं है। दरअसल लघु व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिए बिना खेती को न तो लाभकारी बनाया जा सकता और न ही किसान को समृध्द ? लेकिन इन उद्योगों के लिए कांग्रेस के वादे साफ नहीं हैं। उनके अर्थ मनोनुकूल लगाये जा सकते हैं। क्योंकि किसान को जब तक डेयरी और फसल के प्रसंस्करण संबंधी उद्योगों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक न किसान का भला होने वाला है और न खेती का ? आदिवासी व अन्य प्रकृति पर निर्भर जनजातियों को प्राकृतिक संपदा से जोडे जाने का कोई इरादा भी इस घोषणा पत्र में नजर नहीं आता। देश के करीब बयालीस करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यह हमारे देश की कुल श्रमशक्ति का 92 फीसदी है। इनमें से करीब 90 प्रतिशत लोग अक्सर सरकार की ओर से निधर्रित न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करते हैं। इस विशाल आबादी की आय बढ़ाकर इनकी क्रयशक्ति बढ़े इस ओर भी घोषणा-पत्र में कोई धयान नहीं दिया गया है। इससे लगता है कांग्रेस समावेशी विकास का केवल बहाना गढ़ रही है, गरीब को गरीबी से उबरने के लिए कोई रचनात्मक उपाय नहीं तलाश रही ? इसीलिए कांग्रेस का लोक लुभावन घोषणाओं व वायदों का पिटारा मतदाता को फौरी तौर से भुलावे डालकर छलने का थोथा उपाय भर है।

 


प्रमोद भार्गव