संस्करण: 13अप्रेल-2009

साबरमती जेल में
कैदी भूख हड़ताल पर क्यों ?


 

 

 

सुभाष गाताड़े

बर पहुंचने तक साबरमती जेल में 250 से अधिक कैदियों द्वारा की गयी भूख हड़ताल समाप्त हुई होगी और उम्मीद है कि 2002 के दंगों के दरमियान पोटा के तहत या पिछले साल बम धामाकों के सिलसिले में गिरफ्तार बन्दियों को उनके आत्मीयजनों एवम वकीलों से मिलने दिया जा रहा होगा ! लेकिन मार्च के अन्तिम सप्ताह में साबरमती जेल में बन्द खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के कैदियों के साथ जो कुछ बीता उसे याद करके भी कोई सिहर सकता है।

यह अकारण नहीं था कि मार्च के अन्तिम सप्ताह में गुजरात की उच्च अदालत ने बन्दियों के साथ हुई कथित ज्यादतियों के आरोपों को लेकर जनसंघर्ष मंच की याचिका पर गुजरात के इन्स्पेक्टर जनरल आफ पुलिस (कारागार) और साबरमती सेन्ट्रल जेल के अधीक्षक वी. चन्द्रशेखर को नोटिस जारी किए और सेशन जज को साबरमती जेल जाने का निर्देश दिया और कैदियों के साथ मुलाकात कर स्थिति की रिपोर्ट जारी करने की मांग की। ( इण्डियन एक्सप्रेस 28 मार्च 2009)बताया जाता है कि जेल के अधीक्षक द्वारा कथित तौर पर बन्दियों के अधिकारों की मनमाने ढंग से कटौती करवाने के खिलाफ जिस दिन गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर दी गयी थी जिसमें जेल अधीक्षक वी चंद्रशेखर के तबादले और उसके द्वारा की गयी ज्यादतियों की जांच के लिए कोर्ट कमीशन बिठाने की मांग की गयी थी उसी दिन शाम को बन्दियों पर हमला हुआ। (26 मार्च 2009) झगड़ा तब शुरू हुआ जब यूनूस सरेसवाला नामक बन्दी को उसकी बीमार मां से मिलने नहीं दिया गया। उसी वक्त बन्दियों के समूह एवम जेल अधिकारियों के बीच झगड़ा हुआ। अपरान्ह पोटा के आरोपी भूख हड़ताल पर चले गए जिनका साथ दोष सिध्द बन्दियों एवम विचाराधी न कैदियों ने भी दिया। उन लोगों ने जेल मैन्युअल की भी मांग की जिस की बुनियाद पर जेल संचालित किया जाता है। भूख हड़ताल में जब अन्य कैदी शामिल होते गए तब 27 की दोपहर फिर बन्दियों की पिटाई हुई  जिसके लिए शहर से अन्य पुलिसबल भी मंगाया गया था। 28 की शाम जब कैदी असर की नमाज़ के वक्त झुके थे उस वक्त चुन चुन कर लोगों को पीटा गया। दूसरी तरफ यह भी सच है कि पुलिस एवम जेल अधिकारियों ने इसे कैदियों एवम जेल अधिकारियों के बीच हुई मारपीट के रूप में ही प्रस्तुत किया।

वे सभी जो गुजरात में जेल के अन्दर मानवाधिकार की स्थितियों पर निगाह रखे हुए हैं आप को बता सकते हैं कि उपरोक्त जेल के हिसाब से ऐसी घटनाओं में अनहोनी जैसी कोई बात नहीं है। आज से पांच साल पहले भी वडोदरा जेल में अल्पसंख्यक समुदाय के कैदियों पर नमाज़ पढ़ते वक्त हुए लाठीचार्ज की घटना (राष्ट्रीय सहारा 26 जनवरी 2004) राष्ट्रीय फलक पर सूर्खियां बनी थीं। और उसके कुछ रोज पहले आठ जनवरी को साबरमती जेल में 'असर' की नमाज़ पढ़ रहे कैदियों पर पुलिस ने बर्बरता से लाठीचार्ज किया था जिसमें छह कैदियों को चोटें आयीं। उल्लेखनीय है कि इन कैदियों पर हरेन पंडया की हत्या और गोधारा कांड के मामले दर्ज थे।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि साम्प्रदायिक आधारों पर बंदियों को यातनायें देने या उन्हें प्रताडित करने के मसले को जेल की चहारदीवारियों के बाहर आम लोगों के प्रति पुलिस अमानवीयकृत व्यवहार का ही विस्तार माना जा सकता है। गुजरात 2002 में राज्य सरकार तथा हिन्दुत्व की सियासत के अतिवादी गिरोहों की शह पर अल्पसंख्यकों के जनसंहार की जो घटनायें सामने आयीं थीं वह इसी बात का सबूत थीं कि पुलिस का वहशीपन कभी किस तरह सीमायें तोड़ता दिखता है। इन दंगापीड़ितों में से कईयों ने पत्रकारों या मानवाधिकारकर्मियों को बताया था कि किस तरह पुलिस ने उन्हें बचाने के बजाय दंगाइयों के हवाले किया था। गुजरात में 2002 में फैलाये गए इस संगठित हिंसाचार के मामले में जिन 240 लोगों को पोटा के तहत गिरफ्तार भी किया गया था उनमें से 239 लोग मुस्लिम थे तथा एक सिख धार्मावलम्बी था।

इकानामिक एण्ड पोलिटिकल वीकली के अपने एक लेख  वैश्विक संदर्भ में भारत में मानवाधिकारो का सवाल' में (1 फरवरी 2003 ) प्रख्यात समाजविज्ञानी जनाब सुमन्त बॅनर्जी ठीक ही रेखांकित किया था कि किस तरह हमारे सरकारों की दोषपूर्ण नीतियां और पारदर्शिता की कमी ने यह स्थिति पैदा की है कि हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में लगातार तेजी आती जा रही है। उनके मुताबिक ''संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह हमारी सरकार ने भी इस मामले में जवाबदेही मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। उसने न केवल अंतरराष्ट्रीय आपराधि क न्यायालय (इण्टरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट) के गठन के प्रति अपना विरोधा दर्ज किया है बल्कि संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा प्रस्तावित यातना और अन्य क्रूर अमानवीय व्यवहार को लेकर कन्वेन्शन पर दस्तखत करने से भी इन्कार किया है।'' यह जानने योग्य है कि यूरोप के ज्यादातर देशों ने इस कन्वेन्शन पर दस्तखत किये हैं जिसके तहत स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थायें उन स्थानों तक नियमित जा सकेंगी जहां बन्दियों को रखा गया है ताकि वे ऐसे व्यक्तियों के मानवाधि कारों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकें।

कानून की साधारण किताब भी बता सकती है कि जेलों का निर्माण राज्य की निगाह में अपराधी साबित किये गये व्यक्तियों के सुधार के लिए हुआ है। यह उम्मीद की जाती है कि वे लोग जो किन्हीं कारणों से जेलों में अपने किये की सज़ा भुगत रहे हैं वे जेल से जब बाहर आएंगे तो एक बेहतर इन्सान के तौर पर समाज का हिस्सा बनेंगे। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह बता रही है कि अपराधी पुलिस या सियासतदानों की आपसी सांठगांठ का मामला एक खुला रहस्य है तथा साधारण कैदियो पर रोज ब रोज ढाया जानेवाला कहर भी किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि गुजरात की जेलें एक अपवाद हैं और शेष मुल्क की जेलों में समुदाय आधाार पर ज्यादतियां नहीं होती हैं। निश्चित ही इस देश के 'सर्वोत्ताम जेलों' में गिनी जाने वाली तिहाड़ जेल के बारे में देश के प्रख्यात मानवाधि कार कर्मियों की याचिका इस स्याह पहलू के दूसरे चिन्ताजनक आयाम को उजागर करती है।
आज से कुछ वर्ष पूर्व भारत के मशहूर मानवाधाकार कार्यकर्ताओं बुध्दिजीवियों की ओर से ''तिहाड़ जेल के अधिकारियों की साम्प्रदायिक नीतियों की जांच करने की'' दरखास्त (The Kashmir Times, 11 January, 2004] 'Victims may forget torture but not verbal abuse'.) ने भारतीय जेलों में प्रशासन के एकांगी रूख के चलते साम्प्रदायिक सद्भाव की बिगड़ती स्थिति तथा कैदियों के अपने मानवाधिकार के प्रश्न को लेकर नयी बहस को जनम दिया था।

जहां तक राष्ट्रीय मानवाधि कार आयोग को भेजी गयी याचिका का सवाल था तो उसे सैयद अब्दुल रहमान गिलानी की रिहाई के लिए बनी 'आल इण्डिया डिफेन्स कमेटी' की ओर से भेजा गया था। कमेटी की ओर से भेजी अपनी शिकायत में प्रख्यात समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन ने ''जेल अधि कारियों द्वारा पूर्वाग्रहों से लैस होकर अपनायी जा रही कथित साम्प्रदायिक नीतियों का उल्लेख करते हुए तिहाड़ जेल की नारकीय परिस्थितियों के बारे में जांच शुरू करने का आग्रह किया था।'' कमेटी के मुताबिक '' आम तौर पर मुस्लिम बन्दियों तथा विशेषकर कश्मीरी बन्दियों के साथ हो रहा भेदभाव अंतरराष्ट्रीय मानवाधि कार कानून के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाता है।'' इसी बुनियाद पर उसने आयोग से यह मांग की थी कि वह जेल में मानवाधि कारों की जांच के लिये कमेटी बना दे और 'अतिसुरक्षित सेल' के बन्दियों की समस्याओं के बारे में रपट तैयार करे।''

एक साधारण व्यक्ति भी जानता है कि जीवन का अधि कार या व्यक्तिगत आजादी का अधि कार जिसमें मानवीय गरिमा के साथ रहने का अधि कार शामिल है हमारा बुनियादी अधि कार है। इसमें राज्य या उसके कर्मचारियों द्वारा यातना या किसी भी तरह के हमले से बचने की गारंटी भी निहित होती है।

यह बात कम विचलित करनेवाली नहीं है कि अतिसुरक्षित सेल में बन्दियो की यातना का प्रश्न अपने आप में कोई अपवाद नहीं है बल्कि वह सभी बन्दियों के साथ किये जानेवाले व्यवहार का ही एक हिस्सा है। राष्ट्रीय मानवाधि कार आयोग द्वारा ही एकत्रित आंकड़े बताते हैं कि तिहाड़ के इन विशिष्ट कैदियों के साथ होने वाला व्यवहार अपवाद नहीं है। अपने स्थापना के वर्ष में जहां उसके पास दर्ज शिकायतों की संख्या 500 थी वहीं अब यह आंकड़ा 70 हजार तक पहुंचा है जिसमें से 40 फीसदी शिकायतें पुलिस के खिलाफ हैं तो उसके बाद के आंकड़ें जेलों में हो रहे मानवाधि कारों के हनन के हैं।

70 के दशक में मेरी टाइलर नामक एक ब्रिटिश युवती द्वारा लिखी एक किताब 'भारतीय जेलों में पांच साल' ने जेलों में मानवाधि कारों की स्थिति पर एक नयी बहस छेड़ने में योगदान दिया था। अपने पति के क्रांतिकारी वामपंथी आन्दोलन से जुड़े होने के कारण  देशद्रोह के आरोप में मेरी टाइलर को भी कई जेलों में रहना पड़ा था। क्या उम्मीद की जा सकती है कि गुजरात जेल की बन्द चहारदीवारियों से उठी ये कराहें कम से कम समाज में ही एक व्यापक विचार विमर्श को जनम दे सकेगी ?




 

सुभाष गाताड़े