संस्करण: 13अप्रेल-2009

कौन लेगा किसानों की ख़ैर खबर
 

 

 


महेश बाग़ी

        धयप्रदेश में किसानों की हालत दिनों दिन खस्ता होती जा रही है। देश की आज़ादी के बाद यह पहला अवसर है, जब किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अब तक प्रदेश में आठ किसानों द्वारा आत्महत्या करने की ख़बरें आ चुकी हैं। इन आत्महत्याओं के लिए एक हद तक राज्य की भाजपा सरकार तो ज़िम्मेदार है ही, विपक्षी दलों की भी इसमें भागीदारी है, जो अन्नदाता की आत्महत्याओं पर ख़ामोश बैठे हैं। अगर जल्द ही इस दिशा में कोई प्रभावी पहल नहीं की गई तो आने वाले दिनों में किसानों द्वारा आत्महत्याओं की और ख़बरें भी आ सकती हैं।

सवाल यह है कि प्रदेश के किसान आत्महत्या करने को क्यों मज़बूर हुए या हो रहे हैं ? क्या यह राज्य की भाजपा सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह इतने संवेदनशील मुद्दे पर कोई ठोस उपाय करे ? दर-असल मौजूदा दौर में खेती करना घाटे का सौदा होता जा रहा है, जिसके चलते किसानां को कर्ज़ लेकर खेती करना पड़ रही है। किसान हर साल यह सोचता है कि इस बार अच्छी फ़सल आएगी और उसे उसके उचित भाव मिल जाएंगे। लेकिन हर साल उसे निराशा ही हाथ लगती है और कर्ज़ का बोझ बढ़ जाता है। जब समय पर कर्ज अदायगी न हो तो ऋणदाता दबाव बनाता है और इसी दबाव के चलते वह आत्महत्या जैसा क़दम उठाने को मज़बूर हो जाता है।

किसानों द्वारा आत्महत्या करने के पीछे एक ओर जहां सरकार ज़िम्मेदार है, वहीं दूसरी ओर बड़ी कंपनियों और व्यापारियों की मुनाफ़ाखोर प्रवृत्ति भी। खाद-खरीदने से लेकर कृषि उत्पाद को मंडियों में लाने तक हर जगह किसानों का शोषण होता है। नेशनल और इंटरनेशनल कंपनियों ने बाज़ार पर अपना एकाधिकार जमा लिया है, जिन पर राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। ये कंपनियां खाद और बीजों के मनमाने भाव निधर्रित करती हैं, जिन्हें ख़रीदना किसानों की मज़बूरी होती है। बाज़ार में गोभी का बीज 18 से 36 हज़ार रुपए प्रति किलो है, जबकि मंडी में गोभी 2 रुपए 3 रुपए प्रति किलो में बिकता है। इसी तरह टमाटर का बीज 60 से 70 हजार रुपए प्रति किलो है, जबकि मंडी में उसकी कीमत 2 रुपए किलो भी नहीं मिलती है। इसमें भी मंडी के आढ़तिये अपना कमीशन वसूल लेते है।

राज्य सरकार द्वारा इस लूटखोरी पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया है। यदि सरकार बीजों के मूल्यों पर नियंत्रण रखे और शासकीय स्तर पर अनुसंधाान प्रक्रिया को तेज़ करे तो किसानों को सस्ती पर बीज मुहैया कराए जा सकते हैं। सस्ते बीज उपलब्धा होने से नेशनल-मल्टीनेशनल कंपनियां भी कीमत कम करने पर मज़बूर होंगी, जिसका लाभ किसानों को मिलेगा। दुर्भाग्य से शासन द्वारा इस तरह की कोई पहल करना तो दूर, इस दिशा में अब तक विचार विमर्श भी नहीं किया गया है। शासन की इस उदासीनता के कारण नेशनल और मल्टी नेशनल कंपनियां चांदी काट रही हैं। बीज के अलावा कीट-नाशक दवाइयों के भाव भी आसमान छू रहे हैं। सब्जियों में इल्ली, कीड़े, माऊ, मच्छर, कुकड़ा, फुद्दी आदि के हमले अब आम बात हो गए हैं, जिनसे निपटने के लिए किसान को कीटनाशक ख़रीदना ज़रूरी हो जाता है। इस कीटनाशक दवा की 10 ग्राम की डिब्बी 900 से 1000 रुपए में मिलती है।

किसानों को सरकारी स्तर पर सहकारी समितियों के माधयम से सस्ती खाद भी नहीं मिल पाती है। प्रदेश में भाजपा की सरकार के बनने के बाद से अधिकांश सहकारी समितियों पर भाजपायियों ने कब्ज़ा कर लिया है, जिनके माधयम से छोटे और सीमांत किसानों को खाद नहीं मिल पाती है और सारा माल चंद बड़े और प्रभावी किसान ले जाते हैं। नतीजतन किसानों को खुले बाज़ार से महंगा खाद ख़रीदना पड़ता है, जिसमें नकली और घटिया खाद उनकी फ़सल तबाह कर देता है। किसानों की परेशानियां यहीं ख़त्मश् नहीं होती। उन्हें पानी और बिजली के लिए भी भारी संघर्ष करना पड़ता है। अल्पवर्षा के कारण वैसे ही बुरी स्थिति है। उस पर बिजली संकट ने क़हर ढा दिया है। गांवों में रोज़ाना 2-3 घंटे भी बिजली मिल जाए तो गनीमत है। ऐसे में किसानों को डीज़ल लाकर पंपों के ज़रिये सिंचाई करना पड़ती है। एक साल में बिजली संकट हल करने का वादा कर सत्ता में आई भाजपा पूरे पांच साल कुछ नहीं कर पाई और अब अपनी नाकामी का ठीकरा केंद्र के माथे फोड़ रही है।

ये वे परिस्थितियां हैं, जिनके कारण किसानों को कर्ज़ पर कर्ज़ लेने को मज़बूर होना पड़ रहा है। प्रदेश के लगभग 64 हज़ार किसानों में से लगभग आधो किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। इन पर लगभग नौ हज़ार करोड़ का कर्ज है। केंद्र सरकार ने पिछले साल किसानों के दो हज़ार करोड़ रुपयों के कर्ज़ माफ कर उन्हें बड़ी राहत दी है, लेकिन राज्य की भाजपा सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर पाई है। हालांकि भाजपा ने विधाानसभा चुनाव के समय किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्धा कराने का वादा किया था, किंतु उसे आज तक पूरा नहीं किया जा सका है। इसकी वजह यह है कि सरकारी ख़जाना ख़ाली है और उसकी राजस्व आय में भी भारी गिरावट आई है। इस कारण चुनाव घोषणापत्र में की गई घोषणा काग़जी बन कर रह गई है। पिछले साल चूंकि चुनाव थे, इस कारण सरकार ने गेहूं के समर्थन मूल्य पर बोनस दिया था। अब भाजपा फिर सरकार में आ गई है, किंतु बोनस देने के नाम पर खामोश है। गेहूं का उचित मूल्य न मिलने से किसान इसकी खेती से मुंह मोड़ने का मन बना रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो गेहूं का उत्पादन अगले साल घट सकता है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो उससे उपजे संकट के लिए भाजपा सरकार ज़िम्मेदार होगी। बेहतर होगा कि शिवराज सरकार जागे और किसानों के हित में सकारात्मक कदम उठाए। उन्हें सस्ता खाद, बीज और कीटनाशक दवाएं मुहैया कराने के लिए प्रभावी क़दम उठाए। साथ ही मांग के अनुरूप बिजली भी उपलब्धा कराए। केंद्र पर दोषारोपण करने की बजाय कोयला कंपनियों को बकाया धनराशि जमा कर नगद कोयला ख़रीदे। कोयले के नाम पर जनता को बरगलाने के बजाय शिवराज सरकार को इस हाथ दे, उस हाथ दे की नीति पर चलना होगा। इसी में उसकी और इस प्रदेश की भलाई है।
 

 

भवानी शंकर