संस्करण: 13अप्रेल-2009

तीसरा मोर्चा एक सच्चाई है
आडवाणीजी

 

 वीरेंद्र जैन

  त दिनों अपने चुनावी दौरों में भाजपा के प्रधानमंत्री पद पत्याश लालकृष्ण आडवाण ने तसरे मोर्चे क बढत संभावनाओं से घबरा कर उसे नकारने की जोरदार मुहिम पारंभ की है।वे कह रहे हैं कि तीसरा मोर्चा एक भ्रम है और वे जनता तथा अपने आप को धोखा दे रहे हैं। किंतु बदलती परिस्तिथियों में तीसरा मोर्चा एक सच्चाई है और ज्वलंत सच्चाई है जो आडवाणीजी के नकारे जाने से वैसे ही मिट नहीं सकती जैसे कि सामने आ गये भय को देख कर शुतुरमुर्ग रेत में अपनी गरदन धांसा कर सोचता है कि उसके न दिखने के कारण खतरा टल गया। तीसरे मोर्चे का एक मात्र आधार है गैरभाजपा गैरकाँग्रेस सरकार का गठन और यह आइने की तरह साफ है कि विभिन्न दल इस आधार पर काम कर रहे हैं जिसमें से कुछ एक मंच पर आकर साझे प्रत्याशी खड़े कर रहे हैं और कुछ स्वतंत्र रूप से चुनाव में उतरे हैं। सच तो यह है कि इस गिनती को अगर प्रथम द्वित्तीय तृत्तीय की तरह लें तो उनका खुद का मोर्चा राजग आज की तारीख में तीसरे नम्बर पर है और इस तरह 'तीसरा' मोर्चा वे स्वयं हैं।

गत दिनों वे बार बार अपने आदर्श देश अमेरिका की तरह की दो दलीय प्रणाली की वकालत करते रहे हैं व उसकी तरह की राष्ट्रपति शासन प्रणाली के लिए वातावरण तैयार करने के लिए प्रयासरत रहे हैं। उनका विश्वास है कि दो दलीय प्रणाली होने से उनका संगठन आसानी से धार्मिक बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता के उन्माद को भड़का कर सत्ता पा लेगा। इसीलिए वे अभी तक जिन सत्ताविरोधी वोटों के आधार पर प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं सूंघ रहे थे ऐसे में तीसरे मोर्चे का उदय उनके सपनों पर तुषारापात है।

अटलबिहारी के नेतृत्व वाली जिस राजग सरकार को समर्थन देने वाले बाइस दल थे उस गठबंधान में अब छह बचे हैं। उनमें से भी कई बड़े दल, जैसे कि तेलगुदेशम, एआईडीएमके, बीजू जनता दल आदि उस वाममोर्चे के साथ जुड़ गयेहैं जो तीसरे मोर्चे के केन्द्र में है व जिसके पिछली संसद में भी इतने सदस्य थे कि बहुमत का संतुलन बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। दूसरी तरफ स्वयं भाजपा में से भाजश और कल्याण सिंह ही अलग नहीं हो गये अपितु उसके सबसे कद्दावर नेताओं में से एक भैंरों सिंह शेखावत की एक घुड़की से ही भाजपा की हवा खराब होने लगती है। बिहार में जेडी(यू) ने वरूण गांधी के मामले पर जिस तरह से अपना रूख प्रकट किया है वह अपने आप में एक संकेत है कि वे राजग में दोयम दर्जें के सदस्य नहीं हैं और राजग में रहने की उनकी अपनी शर्तें हैं वे बिहार में शासन कर रहे हैं और वहाँ भाजपा उनके कारण शासन में है वे भाजपा के कारण नहीं हैं। भाजपा के सबसे प्रिय नेता जार्ज फर्नाडीज को उन्होंने पहले तो टिकिट नहीं दिया और बाद में पार्टी से निकाल दिया। जनता दल (यू) के अधयक्ष शरद यादव ने सीताराम येचुरी के साथ गत दिनों बैठक की है। शिवसेना के साथ गठजोड़ का हाल यह है कि उन्होंने कहा ही है कि मराठी प्रधानमंत्री को समर्थन देने का अवसर आने पर वे भाजपा की जगह मराठी प्रधानमंत्री को समर्थन देना पसंद करेंगे जैसा कि राष्ट्रपति के चुनाव में कर ही चुके हैं। भाजपा के घोषणा पत्र में जिस तरह से राम मंदिर समेत पुराने विवादित मुद्दों को रखा गया है उस पर शिवसेना को छोड़ कर राजग का कोई भी दूसरा दल सहमत नहीं हैं। अब यह तय है कि वे अपने राजग सहयोगियों और उनके राममंदिर नारे से भ्रमित जनता के एक वर्ग, दोनों को एक साथ बरगला नहीं सकते। काँग्रेस के नेतृत्व वाले जिस यूपीए गठबंधान में सम्मिलित और समर्थन देने वाली राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी, और समाजवादी पार्टी ने एक साथ चुनाव लड़ने, एक दूसरे को समर्थन देने की जो घोषणा की है उसके साथ उन्होंने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे भले ही काँग्रेस के साथ चुनाव नहीं लड़ रहे पर अभी भी यूपीए में हैं और उनके प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी कांग्रेस द्वारा घोषित श्री मनमोहन सिंह ही हैं। इससे यह साफ है कि वे बाद में भी भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को समर्थन देने नहीं जा रहे।

भले ही तीसरे मोर्चे का गठन भी किसी साझा कार्यक्रम के हिसाब से नहीं हुआ है अपितु अभी यह एक चुनावी मोर्चा भर है किंतु दो बार संयुक्त मोर्चा सरकार बनवाने वाले इस मोर्चे में इतना तो तय है कि वे राम मंदिर, धारा तीन सौ सत्तर, और समान नागरिक आचार संहिता को चुनावी घोषणापत्र में रखने वाली भाजपा के नेतृत्व में केन्द्र की सरकार बनाने को किसी भी तरह सहमत नहीं हो सकते क्योंकि इस मोर्चे का आधार ही धार्मनिरपेक्षता है तथा जिसके केन्द्र में धर्म निरपेक्षता की सबसे बड़ी अलम्बरदार वामपंथी पार्टियांहैं जिन्होंने पिछले सदन में कांग्रेस से अपने तीखे विरोधा और उनके प्रभाव क्षेत्रों में प्रमुख प्रतिद्वंदी होने के बाद भी भाजपा की जगह कांग्रेस की सरकार को बाहर से समर्थन देना मंजूर किया था।

भाजपा के चुनाव में जीतने की संभावना ना तो पश्चिम बंगाल में है ना केरल में ना तमिलनाडु में ना त्रिपुरा में और ना ही आंधार प्रदेश में। कर्नाटक में भले ही उन्होंने जोड़ तोड़ कर सरकार बना ली हो किंतु जिस लौह अयस्क के उत्पादक के पैसे की दम पर उन्होंने जीत हासिल की थी उसे लोहे के दामों में भारी गिरावट के कारण बड़े नुकसान हुयेहैं। वहाँ से उनके अठारह सांसद चुने गये थे पर विधानसभा चुनावों में प्राप्त वोटों को लोकसभा क्षेत्र में बदलने पर उनके कुल दस प्रत्याशी ही जीत रहे थे। गत विधानसभा चुनाव परिणामों के अनुसार राजस्थान में उनकी सीटें घटने वाली हैं तथा महाराष्ट्र दिल्ली, हरियाणा उड़ीसा पंजाब गुजरात छत्तीसगढ मधयप्रदेश जैसे राज्यों में उनकी सीटें अभी जितनी हैं उससे ज्यादा बढने की कोई संभावना नहीं है। अधाक से अधिक संगमा आदि की नाराजी के कारणों से एकाधा सीट का लाभ उत्तरपूर्व में उन्हें हो सकता है।

चुनाव बाद वे सबसे बड़ा दॉव अकेले चुनाव लड़ने वाली तथा तीसरे मोर्चे के नेताओं को डिनर पर आमंत्रित करके भी तीसरे मोर्चे में समिमलित होने की स्पष्ट घोषणा न करने वालीष्बहुजन समाज पार्टी पर खेलने की फिराक मेंहैं इसलिए उन्होंने वरूण मामले पर रासुका लगाये जाने पर उसे बसपा बनाम भाजपा बनाने की जगह मनेका बनाम मायावती ही बनने दिया। किंतु मायावती कभी दब कर सौदा नहीं करतीं और उनके साथ तीन बार सरकार बनाने व हर बार तौबा कर लेने के बाद वे उन्हें प्रधानमंत्री बनाने को सहमत नहीं हो सकेंगे जबकि पूरे एक साल से आडवाणीजी प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बने घूम रहे हैं। दूसरी ओर तीसरे मोर्चे के लगभग सारे ही दल इस बात के लिए कृतसंकल्प हैं कि वे अंतत: धार्म निरपेक्ष सरकार ही बनाएंगे।

इसलिए तीसरा मोर्चा एक यथार्थ है और पिछली बार जो ढाइवाँ मोर्चा था वह पूरी तरह तीसरा मोर्चा है व कम से कम एक तिहाई सीटों का प्रतिनिधात्व करने वाला है जिसमें वामपंथी जैसे भागीदार हैं जिनके साथ पदो के सवाल पर कोई झगड़ा नहीं होने वाला। हो सकता है कि चुनाव के समय बड़े बड़े औद्योगिक घरानों से चन्दा पाने की आशा में आडवाणीजी तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को झुठलाने की कोशिश कर रहे हों पर यदि वे सचमुच ही ऐसा सोच रहे हों तो उन्हें पुर्नविचार करने की जरूरत है क्योंकि मीडिया में आये समाचारों के अनुसार प्रसिध्द उद्योगपति मुकेश अम्बानी ने पहल करके गत दिनों माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के महासचिव के साथ एक घन्टे की मुलाकात की थी और औद्योगिक घरानों की दृष्टि बहुत पैनी होती है जिससे आडवाणीजी बहुत अच्छी तरह परिचित हैं।
 

 वीरेंद्र जैन