संस्करण: 13अप्रेल-2009

हमारे देश में सूचना का अधिकार


 

 डॉ.देवप्रकाश खन्ना

     मारा भारत देश संसार के बड़े लोकतंत्रों में से एक है। इसकी अपनी धाक है, जो धीरे-धीरे जमती जा रही है। आख़िर क्यों न जमें, इसे संसार का गुरू जो बनना है। ऐसा जब भी हो अब शुरूआत तो हो ही चुकी है। अभी कुछ साल पूर्व ही जब संसार के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत का नाम काफ़ी ऊपर जा पहुंचा, तो देश के नेताओं व शासकों का माथा ठनका। उन्होंने ताबड़तोड़ कोशिश करके राजकीय कोष के अपव्यय व विकास के कार्यों में भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयासों के तहत अनेक उपायों की घोषणाएं कीं। उनमें से एक प्रमुख थी हमारे सांसदों द्वारा बनाये गये सूचना के अधिकार का कानून, 2005, इस कानून से भ्रष्टाचार रोकने के लिए जनता को उसके द्वारा चाही जानकारी उपलब्धा कराने का प्रयास किया गया था। प्रजातंत्र में कोई भी व्यक्ति देश व कानून की समीक्षा से परे नहीं होता। सूचना के अधिकार के बिल को संसद में प्रस्तुत करते हुए हमारे प्रधानमंत्री ''मनमोहन सिंह'' क्या खूब कहा था ''लोकतांत्रिक अवस्था की सफलता की कुंजी इसी बात में है कि इसके द्वारा बनाये कानूनों के द्वारा देश का आम आदमी जो पर्यवेक्षक है, उसे सारी जानकारी दी जानी चाहिए। सभी आवश्यक जानकारी भी उस तक पहुंच होना ज़रूरी है। सूचना का यह अधिकार मिलने के बाद देश का आम आदमी सरकारी संस्थाओं पर नज़र रख सकेगा। सूचना के अधिकार का यह कानून यह भी सुनिश्चित करेगा कि सरकारी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से पूरी करें। पंचायती राज संस्थाओं से लेकर केंद्र सरकार तक इस कानून के दायरें में होंगें।'' इस कानून का मसौदा संसद में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने यह अपेक्षा की थी कि देश के सभी लोक सेवक (जनता के सेवक यानी शासकीय अधिकारी व कर्मचारी) इस कानून के क्रियान्वयन के प्रति सकारात्मक सोच रखते हुए जनताको चाही जानकारी सहजता से उपलब्धा करायेंगे। इस कानून का उद्देश्य ही देश में व्यवस्था में, विकास कार्यों में लगे सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ जनसेवकों द्वारा की जा रही कार्यवाही व निर्णय-प्रक्रिया के बारे में जन सामान्य को जानकारी देकर उसे पारदर्शी बनाना था। इसके तहत देश का कोई भी नागरिक निधर्रित फार्मों पर आवेदन देकर, निधर्रित धानराशि जमा कर सार्वजनिक हित की कोई भी जानकारी शासन से प्राप्त कर सकता हैं। इस हेतु शासकीय कार्यालयों में सूचना अधिकारी नियुक्त किये गये हैं व राज्य व केंद्र सरकार के स्तर पर सूचना आयोग गठित कर इस कार्य पर निगरानी हेतु सूचना आयुक्त नियुक्त किये जा चुके हैं।

पर क्या विडंबना है। सन् 2005 में लागू हुए इस कानून को अभी तीन साल का समय ही बीता है कि अब ऐसा लगने लगा है कि लगभग सभी संबंधित शासकीय पक्ष,उनके गले की हड्डी बने इस कानून के लागू होते हुए भी, आमजन द्वारा चाही जानकारी उसे न देने के प्रयास में जुटे रहते हैं। विभिन्न प्रांतों में अनेक प्रकरणों में आवेदकों द्वारा चाही जानकारी उन्हें न दे पाने की बात कह कर मामला डाल दिया जाता है। मधयप्रदेश में भी राज्य सरकार से जानकारी लेने के लिए नागरिकों को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। समाचार पत्रों में छपे आंकड़ों के अनुसार सात हज़ार से ज्यादा लोग मधयप्रदेश सूचना आयोग की शरण ले चुके हैं, जिनमें उनका कहना है कि उन्हें विभाग ने सूचना देने से मना कर दिया। आयोग की धीमी चाल का भी एक उदाहरण यह है कि पांच हजार से अधिक शिकायतों का निराकरण वहां से भी नहीं हो पाया। आयोग में आने वाले मामलों में से करीब 90 प्रतिशत अपील-शिकायतें सरकारी विभागों के कर्मचारियों की हैं। विभिन्न सरकारी दफ्तरों में चाही गई जानकारी संबंधित को देने में घोर लापरवाही बरती जाती है।

भारत में सूचना के अधिकार का नियम बनने की दिशा में पहला कदम राजस्थान के मजदूर किसान शक्ति संगठन के 1992 में शुरू हुए आंदोलन से उठा। सन् 2000 में अशोक गहलोत की राज्य सरकार के कार्यकाल में इसने मूर्त रूप लिया।उसके बाद अब तक देश के नौ राज्यों में सूचना के अधिकार के कानून पास हो चुके हैं। सन् 2002 में केंद्र सरकार ने सूचना की स्वतंत्रता विधोयक पास कराया, पर राज-पत्र में प्रकाशित न हो पाने के कारण वह कानून का रूप न ले सका। इस विधोयक में नागरिक को सिर्फ़ सूचना लेने की स्वतंत्रता देना ही अभीष्ट था। सूचना उसे देना या नहीं देना अधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया गया। सन् 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सुझावों पर अमल करते हुए नया विधोयक संसद में प्रस्तुत किया। दिनांक 12 मई 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर यह विधोयक पारित होकर अधिनियम बन गया। इसके कुछ प्रावधान तो तुरंत लागू हो गये, पर कुछ अन्य प्रावधान निधर्ाारित पदस्थापनाएं दूरी होने के साथ 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुए।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत केंद्र व राज्य स्तर पर सूचना आयोग बनाने की व्यवस्था है। दोनों का दर्ज़ा समान रखा गया है। केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त व चार सूचना आयुक्तों की व्यवस्था है। वर्ष 2008 में इन आयुक्तों की संख्या बढ़ाकर 8 कर दी गई है। मधयप्रदेश में भी भी मुख्य सूचना आयुक्त व तीन सूचना आयुक्त पदासीन होकर कार्यरत हैं।

सूचना के अधिकार कानून का अधिकार क्षेत्र :-मई 2005 में बने सूचना के अधिकार के कानून को विश्व का एक श्रेष्ठ युगांतरकारी कानून मानते हुए प्रबुध्द भारतवासियों ने भ्रष्टाचार की दलदल में फंसते जा रही अपनी देश की सरकारों को उबारने की शक्ति पाने के अनेक सपने संजाये थे। ऐसा लगा था मानो जनता का अपना कानून अब देश को मिल गया है। पर जैसे-जैसे लोगों ने इस कानून का उपयोग करने हेतु शासकीय निर्णयों की जानकारी मांगने की शुरूआत की वैसे-वैसे हमारे लोकतंत्र के तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका ने अपने को इस दायरे से बाहर निकालने के प्रयास शुरू कर दिये। अब लगता है कि सूचना मांगने का विधिवत नोटिस मिलते ही संबंधित विभाग के अधिकारियों के पसीने छूटने से लगते हैं। परिणामत: आवेदक को वांछित सूचना मांगने से हतोत्साहित करने वाली है। सूचना न देने के प्रकरणों में मधयप्रदेशके सूचना आयोग ने हाल ही में दो विभागों का सूचना से संबंधित रिकार्ड ही बुलवा लिया। एक प्रकरण महिला एवं बाल विकास से संबंधित है, जिसमें आवेदक ने 30 जुलाई 2006 को हुई राज्य सरकार की महिला पंचायत के खर्चे की जानकारी मांगी थी। आयोग के निर्देश के बावजूद जानकारी उपलब्धा न कराने का संज्ञान लेकर आयोग ने अब सारी जानकारी अपने पास बुलाई है। दूसरा प्रकरण खेल एवं युवा कल्याण विभाग का होकर एक निजी एजेंसी को एक करोड़ रुपये से अधिक के विज्ञापन देने से संबंधित है। शासकीय विभागों द्वारा जानकारी उपलब्धा न कराते हुए टालमटोल करते जाने के अनेक प्रकरणों के समाचार अब आये दिन समाचार-पत्रों में छपते रहते हैं।

अधिनियम के प्रारंभिक दिनों में ही भारत सरकार के कार्मिक विभाग ने फाइलों पर अंकित ''नोटिंग'' को प्रतिबंधित बताकर न देने के प्रयास शुरू कर दिये थे। इस पर से अधिनियम में संशोधान करने तक पर विचार होने लगा था। न्यायपालिका ने अपने न्यायाधीशों को इस कानून से बाहर रखे जाने हेतु गंभीर प्रयास किये। संसदीय स्टेंडिग कमेटी के अधयक्ष ई.एम. सुदर्शन नच्चिययन ने तो स्पष्ट कहा कि जब प्रधानमंत्री और लोकसभाधयक्ष का सूचना के अधिकार के तहत रखा गया है तो फिर जजों को ऐसी छूट देने का कोई औचित्य नहीं। उनके अनुसार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों ही सूचना के अधिकार के दायरे में आते हैं। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा न्यायाधीशों की संपत्ति संबंधी सूचना को सार्वजनिक किये जाने के विरूध्द उच्चतम न्यायालय अपने अधीनस्थ दिल्ली न्यायालय में अपील में गया है। हमारे देश के न्यायिक इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा अपील में अपने अधीनस्थ न्यायालय में जाना एक अप्रत्याशित घटना है, जिससे अनेक संवैधानिक संकट उठना भी संभावित है। उच्चतम न्यायालय की एक पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने खुद यह स्वीकार किया है कि उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी लोकसेवक है। जिस देश में हर संस्था व सब लोकसेवक-राष्ट्रपति से नीचे तक सभी की जवाबदारी तय है तो फिर जजोंको इस जवाबदारी से मुक्त कैसे किया जा सकता है ? सूचना आयोग, कार्यपालिका के वरिष्ठ सदस्यगण, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता। ऐसे ही देश के विभिन्न राजनैतिक दल भी अपने आय-व्यय के विवरण को सार्वजनिक करना नहीं चाहते।

इन सबसे ऐसा आभास होता है कि देश की व्यवस्था व प्रशासन में संलग्न तीनों स्तंभ-विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका-स्वयं को सूचना के अधिकार के कानून के दायरे से बाहर निकालकर प्रशासनिक गोपनीयता कानून, 1923 के आवरण से ढंके रहने देना चाहते हैं। ऐसे में देश के सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने का ढोंग रचना व भ्रष्टाचार मिटाने की घोषणायें करना एक छलावे के अलावा और क्या है ?

डॉ.देवप्रकाश खन्ना