संस्करण: 13अप्रेल-2009

22 अप्रैल-विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष
''कूड़े के ढेर में बदलती धरती''


 

 स्वाति शर्मा

     ज हमारी धारती अपना प्राकृतिक रूप खोती जा रही है। जहाँ देखों वहाँ कूड़े के ढेर व बेतरतीब फैले कचरे ने इसके सौंदर्य को नष्ट कर दिया है। अब समय आ गया है जब हमें अपने वातावरण की स्वच्छता और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के कारगर उपाय करना चाहिए। विश्व में बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में तेज़ी से वृध्दि के साथ-साथ ठोस अपशिष्ट पदार्थों द्वारा उत्पन्न पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी विकराल होती जा रही है। ठोस अपशिष्ट पदार्थों के समुचित निपटान के लिए पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है। ठोस अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में लगातार वृध्दि के कारण उत्पन्न उनके निपटान की समस्या न केवल औद्योगिक स्तर पर अत्यंत विकसित देशों के लिए ही नहीं वरन कई विकासशील देशों के लिए भी सिरदर्द बन गई है। उदा. के लिए अकेले न्यूयार्क में प्रतिदिन 2500 ट्रक भार के बराबर ठोस अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन होता है, जिसमें बीयर एवं अन्य पेय पदार्थों के डिब्बे, दूधा की बोतलें, अन्य प्रकार की बोतलें, कागज, पुराने अखबार, प्लास्टिक के सामान, पॉलिथीन बैग्स आदि शामिल हैं। इस महानगर में प्रतिदिन 25,000 टन ठोस कचरा निकलता है। विकसित देशों में पुराने मोटर वाहनों के निपटान की भी विकट समस्या है।

हमारे देश में फसलो के अवशेष, पशु मल जैसे अपशिष्ट पदार्थ तो शुरूसे ही उत्पन्न होते रहे हैं लेकिन शहरीकरण व औद्योगीकरण के फलस्वरूप पॉलीथीन, बैग्स, प्लास्टिक डिब्बे, टिन तथा अन्य धातु के डिब्बे, कांच के अवशेष, कल-कारखानों में विभिन्न धातुओं की छीलन, औद्योगिक कचरा एक विकट समस्या बन चुका है। पिछले कुछ सालों में सारी दुनिया में प्लास्टिक का प्रयोग बहुत बढ़ा है। इस समय विश्व में प्रतिवर्ष प्लास्टिक का उत्पादन 10 करोड़ टन के लगभग है और इसमें प्रतिवर्ष उसे 4 प्रतिशत की वृध्दि हो रही है। भारत में भी प्लास्टिक का उत्पादन व उपयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। औसतन प्रत्येक भारतीय के पास प्रतिवर्ष आधा किलो प्लास्टिक अपशिष्ट पदार्थ इकट्ठा हो जाता है। इसका अधिकांश भाग कूड़े के ढेर पर और इधार-उधार बिखर कर पर्यावरण प्रदूषण फैलाता है। एक अनुमान के अनुसार केवल अमेरिका में ही एक करोड़ किलोग्राम प्लास्टिक प्रत्येक वर्ष कूड़ेदानों में पहुंचता है। इटली में प्लास्टिक के थैलों की सालाना खपत एक खरब है। इटली आज सर्वाधिक प्लास्टिक उत्पादक देशों में से एक है।

पश्चिमी देशों में कचरा जलाने या ट्रेचिंग ग्राउंड में फेंकने के बजाय उसके पुन: चक्रीकरण के मामले में काफी प्रगति की है, जबकि भारत में इस दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं हो सकी है। यद्यपि भारतीय प्लास्टिक उद्योग प्लास्टिक के अपशिष्टों का पूरी तरह रिसाइकिल हो जाने का दावा करता है,लेकिन 'रिसाइक्लिंग' की प्रक्रिया में नष्ट होने वाली बहुमूल्य ऊर्जा की बात आने पर वे चुप्पी साधा लेते हैं। यद्यपि कचरा सिर्फ कचरा नहीं होता, उसके कुछ हिस्से की 'रिसाइक्लिंग' कर फिर से उपयोग में लाया जा सकता है, किंतु प्लास्टिक के कचरे में से 15-20 प्रतिशत अंश को ही पुन: उपयोग में लाया जा सकता है। शेष विशुध्द कचरा होता है जो कम विषाक्त से लेकर अधिक विषाक्त तक हो सकता है। इसी विषाक्तता की वजह से कोई भी संपन्न देश प्लास्टिक कचरे को अपने यहाँ खपाना नहीं चाहता। आज प्लास्टिक कचरे के निर्यातक देशों में अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाड़ा आदि प्रमुख हैं। आयातक देशों में भारत, चीन, थाईलैंड, पाकिस्तान बंग्लादेश आदि हैं। प्लास्टिक कचरे का आयात करने वाले देशों में पर्यावरण संगठनों को इस आयात पर आपत्ति है। उनका कहना है कि प्लास्टिक कचरे को जिस विशेष प्रक्रिया द्वारा फिर इस्तेमाल करने लायक बनाया जाता है, उसमें कार्य करने वाले व्यक्ति प्रशिक्षित नहीं हैं और पुन: जो कचरा बनता है वह प्रदूषण फैलाता है। यह प्रदूषण घातक बीमारियों के लिए जिम्मेदार है,लेकिन इस आपत्ति की अनदेखी ही हो रही है।

आंकड़ों के अनुसार 1995 में भारत में 7916 टन प्लास्टिक कचरे का आयात किया। प्लास्टिक कचरे के अतिरिक्त भारत ने 1993 में 502 टन लेड कचरा, 346 टन लैड बैटरी कचरा, 30,498 टन टिन, कॉपर और अन्य धातुओं का कचरा आयात किया।1993 के बाद से भारत में कचरे का आयात बढ़ ही रहा है। जिस तरह प्लास्टिक कचरे का बहुत थोड़ा सा अंश रिसाइक्लिंग द्वारा पुनरोपयोगी बनाया जा सकता है, उसी तरह की स्थिति धात्विक कचरे की है। 80 से 85 प्रतिशत धात्विक कचरा किसी काम का नहीं होता। प्लास्टिक कचरे की तरह धातु कचरा भी पर्यावरण व मानव जीवन के लिए घातक है। धातु कचरे की 'रिसाइक्लिंग' करने वालों को मानसिक रोगो से ग्रस्त होने का खतरा रहता है। प्लास्टिक की 'रिसाइक्लिंग' में ऊर्जा का खर्च कांच जैसी वस्तुओं के 'रिसाइक्लिंग' से काफी अधिक है। प्लास्टिक को एक बार उत्पाद में बदलने के बाद उसकी 'रिसाइक्लिंग' जटिल कार्य है क्योंकि प्लास्टिक के अपशिष्ट में तेल, धाूल व गंदगी की मात्रा काफी अधिक होती है।

कूड़े-कचरे से बिजली बनाने की प्रौद्योगिकी भारत में सन् 1980 में आयात की तथा दिल्ली में संयंत्र स्थापित किया। लेकिन शहरी कूड़े-कचरे में वांछित कैलोरी ही नहीं पाई गई जिससे वह संयंत्र चल पाता। साथ ही संयंत्र को चलाने में बिजली का खर्च ही इतना अधिक होने लगा कि विद्युत उत्पादन काफी महंगा पड़ने लगा। अत: यह योजना 1991 में ठप्प हो गई। इस दिशा में पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए कदम काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। उनके अनुसार समस्या का हल ऐसी प्रौद्योगिकी में है जो कचरे को पुन: उपयोगी बना सके अथवा हम ऐसा कचरा बनने ही न दें जो पर्यावरण के लिए घातक हो। पर्यावरण विशेषज्ञों ने कचरा प्रबंधान की रणनीति के तहत सर्वप्रथम कचरे को वर्गीकृत करने पर बल दिया है। उनके अनुसार कचरे को उसके स्रोत पर ही बनने से रोका जाए अर्थात फेंकने योग्य सामग्री का निर्माण न्यूनतम हो। ऐसा करके हम प्लास्टिक कचरे से होने वाले प्रदूषण को कम कर सकते हैं। यद्यपि कूड़े-करकट के ढेर से प्लास्टिक की वस्तुएं बीनने वाले छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक के 'रिसाइक्लिंग' में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन वे सूक्ष्मजीव तो नहीं बन सकते, जो उसे अपघटित कर दें। अत: वैज्ञानिकों को प्लास्टिक को अपघटित करने वाले प्रभावी सूक्ष्मजीवों की खोज अभी जारी रखनी होगी, ताकि धारती को कूड़े के ढेर में बदलने से रोका जा सके।

स्वाति शर्मा