संस्करण: 13अप्रेल-2009

लोकसभा चुनाव पर मंदी की मार नहीं
विज्ञापन पर करोड़ों खर्च कर रही हैं पार्टियां


 

 एम.के.सिंह

     वैश्विक मंदी से पूरा विश्व बौखलाया हुआ है। प्रत्येक दिन हजारों लोगों को नौकारी से हाथ धोना पड़ रहा है। बडी-बड़ी कंपनियो के दम फूलने लगे हैं। कई कंपनियां दिवालिया हो गई हैं। अमरीका समेत कई विकसित देशों को राहत पैकेजों की घोषणा करनी पड रही है, लेकिन हमारे देश में हो रहे लोकसभा चुनाव पर मंदी की मार दूर तक भी दिखाई नहीं दे रही है। लगभग सभी पार्टियां चुनाव में अपनी हैसियत से अधिक धन खर्च करने पर आमाद हैं।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के हाल के सर्वेक्षण में पर विश्वास किया जाए तो इस बार लोकसभा का चुनाव खर्च पिछले बार के 4500 करोड़ रुपए के मुकाबले करीब दोगुना बढ़कर दो अरब डालर यानी 10 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। यह राशि दुनिया के सबसे समृध्द देश अमरीका के 2008-09 के राष्ट्रपति चुनाव में खर्च 1.8 अरब डालर राशि से भी ज्यादा है। लोकसभा चुनावों में पार्टियां प्रचार अभियान पर चार सौ करोड़ रुपए खर्च करेंगी। मंदी से बेपरवाह कांग्रेस और भाजपा जमकर पैसा बहा रही हैं। जनता की जेब पर भारी पड़ रहे इस चुनाव में विज्ञापन एजेंसियों की चांदी कट रही है। विज्ञापन युध्द में कांग्रेस अव्वल है। कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान प्रमुख कंपनियों क्रेयान्स एडवर्टाजिंग और जेडब्ल्यूटी ने संभाली है। इन पर 150 करोड रुपए खर्च आएगा। कांग्रेस ने स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म के लोकप्रिय गीत 'जय हो' का कॉपीराइट खरीद लिया है, जिस पर एक करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। संप्रग सरकार ने पिछले वर्ष भारत निर्माण समेत विभिन्न विज्ञापनों पर 60 अरब रुपए खर्च किए। मंत्रियों की फोटो समेत इन विज्ञापनों पर इस वर्ष अभी तक दो अरब रुपए फूंके जा चुके हैं। भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी की छवि लोकप्रिय बनाने के लिए ऑन लाइन मीडिया और मोबाइल सवस आपरेटरों का सहारा लिया है। आजकल आडवाणी मोबइल और इंटरनेट पर छाए हुए हैं । औसतन 14 हजार लोग प्रतिदिन आडवाणी की वेबसाइट देख रहे हैं। भाजपा प्रचार के लिए तीन एजेंसियों की सेवाएं लेगी। कम्प्यूटर से भी मतदाताओं की बढ़ती तादाद के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों ने इस बार साइबर प्रचार में धनराशि का आवंटन करीब 10 गुना बढ़ा दिया है। 2004 के लोकसभा चुनाव में पाटयों ने साइबर प्रचार पर जहां कुल खर्च का मात्र एक प्रतिशत खर्च किया था, वहीं इस बार इस मद पर चार से पांच करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान है।

टेलीविजन के किसी भी खबरिया और मनोरंजन चैनल पर कांग्रेस के जय हो और भाजपा के भय हो को हर दस पांच मिनट के बाद सुना जा सकता है। कांग्रेस ने जय हो पर आधारित कई प्रचार दिए हैं। इसके अलावा कांग्रेस के प्रचार में आम आदमी के बढ़ते कदम बुलंद भारत के साथ भी है, जिसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की सफलता और बालिका शिक्षा का प्रचार किया जा रहा है। कांग्रेस के प्रचार में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही दिखायी देते। चौदहवां लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने चुनाव प्रचार में करीब 115 अरब रुपये खर्च किए गए। ये तब था जब चुनाव आयोग ने हर चुनाव क्षेत्र में अधिकतम खर्च की सीमा 25 लाख रुपए तय की थी।

इसका मतलब ये हुआ कि असल में चुनाव खर्च अधिकतम सीमा से दस गुना हुआ। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सिर्फ साढ़े छह अरब रुपए चुनाव प्रचार में इस्तेमाल एक लाख पचास हजार गाड़ियों पर ही खर्च किए गए जबकि 100 करोड़ रुपए हेलिकॉप्टर और हवाई जहाज के इस्तेमाल में। चुनाव आयोग को दिए आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में एक सौ दो करोड़ रुपए खर्च किए। चुनाव आयोग को दिए अपने बयान में बीजेपी ने बताया कि पार्टी ने 48 करोड़ रुपए पब्लिसिटी, विज्ञापन, पोस्टर, पैम्फलेट्स और होर्डिंग पर खर्च किए। जब इतना पैसा विभिन्न पार्टियों ने सिर्फ विज्ञापन पर खर्च किए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रचार भी हाइटेक और महंगे होंगे। टीवी, वेब, अखबार हर वो जगह जहां विज्ञापन की गुंजाइश थी वोट की अपील से पटे पड़े थे।

इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा लगभग 300 करोड़ रुपए का ठेका विज्ञापन एंजेसियों को पहले ही दे चुकी हैं। इसके बाद से विज्ञापन एजेंसियां समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों और व्यक्तिगत तौर पर प्रचार कराने वाले उम्मीदवारों पर निशाना साध रही हैं। पार्टी और प्रत्याशियों से प्रचार ठेका हासिल करने के लिए विज्ञापन एजेंसियां एक से बढ़कर एक प्रेजेंटेशन दे रही हैं। साथ ही पार्टियों के लिए विशेष पैकेज भी दिया जा रहा है। इन पैकेजों में दस लोकसभा सीटों पर प्रचार का ठेका देने पर दो सीटों पर प्रचार मुफ्त जैसे लुभावने ऑफर भी शमिल हैं।

प्रचार की अहमियत समझते हुए सपा, टीडीपी, डीएमके, एडीएमके और चिंरजीवी की नई बनी पार्टी प्रजा राज्यम पार्टी जैसी पार्टियां भी विज्ञापन एंजेसियों की शरण में ही जाने की योजना बना रही हैं। कुल मिलाकर इसबार का चुनाव जनता की जेब पर ज्यादा भारी पड़ने वाला है। चुनाव जीतने के बाद उम्मीदवार अपना खर्चा-पानी ब्याज के साथ वापस निकाल लेंगे, पर पहले से ही मंदी और महंगाई की मार झेल रही जनता को और परेशानियों से दो-चार होना पड़ेगा। चुनाव में खर्च धनराशि का एक बड़ा हिस्सा जनता को टैक्स और अन्य माध्यमों से चुकाना पड़ता है।

एम.के.सिंह