संस्करण: 12 जुलाई-2010   

पीथमपुर को कार्बाइड का जहर

राखी रघुवंशी

          भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय दिलाने में असफल रही सरकार अब मध्यप्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर में दूसरी त्रासदी का इंतजाम कर रही है. मध्यप्रदेश सरकार द्वारा यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे को पीथमपुर में जलाने के निर्णय के बाद अब भोपाल गैस त्रासदी पर गठित मंत्री समूह ने भी इस कचरे को पीथमपुर में ही नष्ट करने की बात कही है. विषाक्त कचरे के निपटारे का यह कदम न सिर्फ पर्यावरण के लिए विनाशकारी है, बल्कि वहां रह रहे पांच लाख श्रमिकों के जीवन से खिलवाड़ भी है.

         भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा मानव जीवन के लिए अत्यन्त खतरनाक है. इस कचरे से वहां की जमीन और भूजल खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुका हैं. सन 1999 में ग्रीन पीस इंटरनेशनल के विशेषज्ञों ने भी अपनी रिपोर्ट में इस कचरे को भूमि के लिये खतरनाक स्तर तक प्रदूषित माना. इसके पहले मध्यप्रदेश सरकार द्वारा इस कचरे को गुजरात के अंकलेश्वर स्थित प्लांट में जलाने का निर्णय लिया गया था, किन्तु गुजरात के लोगों के विरोधा के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने इस कचरे को पीथमपुर के हवाले करने का निर्णय लिया.

       इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में हुई एक सुनवाई में भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के निदेशक द्वारा 13 अप्रैल 2009 को न्यायालय में प्रस्तुत किए गए शपथ पत्र में कहा गया कि ''यूनियन कार्बाइड के खतरनाक अवशिष्ट को अंकलेश्वर के भस्मक में जलाए जाने की अनुमति इसलिए रद्द कर दी गई, क्योंकि वहां के नागरिक अधिकार समूहों द्वारा तीव्र विरोध दर्ज कराया गया.'' इस शपथ पत्र से यह स्पष्ट है कि यूनियन कार्बाइड का कचरा मानव जीवन के लिए खतरनाक है. तब यह सवाल उठता है कि आखिर पीथमपुर और उसके आसपास के लोगों को ही इसका शिकार क्यों बनाया जा रहा है? हालांकि सरकार द्वारा यह आश्वासन दिया जा रहा है कि पीथमपुर के जिस भस्मक में यह कचरा जलाया जाएगा, उससे कोई दुष्परिणाम नहीं होंगे. किन्तु इसके तकनीकी पहलुओं का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि सरकार का यह आश्वासन समस्या पर पर्दा ढकने की तरह है. भोपाल गैस त्रासदी से पहले यूनियन कार्बाइड पर व्यक्त किए गए संदेहों पर भी तत्कालीन सरकार द्वारा इसी तरह का आश्वासन दिया गया था.

        इस मामले में कोई संदेह नहीं है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने में पड़ा जहरीला कचरा मानव जीवन के लिए अत्यन्त खतरनाक है. गैस राहत एवं पुनर्वास संचालनालय भोपाल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत इन्दौर के लोकमैत्री समूह को जारी किए गए दस्तावेज में कहा गया है कि ''यूनियन कार्बाइड में रखे हुए अवशिष्ट विषैले पदार्थ की श्रेणी में आते हैं.''

        विशेषज्ञों के अनुसार यूनियन कार्बाइड का यह जहरीला कचरा इतना खतरनाक है कि दुनिया के सिर्फ तीन देशों कनाडा, जर्मनी और डेनमार्क में ही इसे सुरक्षित रूप से जलाने के प्लांट स्थित है. बताया जाता है कि इस कचरे को 1200 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान पर जलाये जाने पर इसमें से कई ऐसे रासायनिक तत्व निकलेंगे, जिससे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.आकलन से अधिक कचरा सरकार द्वारा इस कारखाने में व्याप्त कचरे की मात्रा 350 टन बताई जा रही है, जबकि सन् 1969 में कारखाना स्थापित होने के बाद से ही लगातार जहरीला कचरा भोपाल की जमीन पर फेंका जा रहा था, जिसकी कुल मात्रा 27000 टन है. सन् 2007 में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में 39.6 टन ठोस कचरा पीथमपुर तथा 346 टन ज्वलनशील अवशिष्ट को गुजरात के अंकलेष्वर में स्थित भस्मक में जलाने के निर्देश दिए थे, जबकि गुजरात सरकार ने इस कचरे को अपने यहां जलाने से इंकार कर दिया है.

         दूसरी ओर जून 2008 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 39.3 टन कचरा पीथमपुर में दफन कर दिया गया. इस कचरे के दफन करने के बाद उसके समीप स्थित मंदिर के कुएं का पानी काला पड़ जाना और समीप बसे गांव तारपुर के लोगों द्वारा उस पानी का उपयोग बंद कर दिया जाना इसके दुष्परिणाम का ठोस सबूत है. इस दशा में यदि 27000 टन कचरा पीथमपुर में नष्ट किया जाएगा तो यहां के मानव जीवन पर होने वाले असर की कल्पना की जा सकती है.
संदेह के घेरे में भस्मक यूनियन कार्बाइड का कचरा पीथमपुर में स्थापित रामकी एनवायरो इंजीनियर्स लिमिटेड की मध्यप्रदेश वेस्ट मैनैजमेंट साईट के भस्मक में जलाया जाएगा. किन्तु तकनीकी दृष्टि से कई ऐसी बातें सामने आती है, जो इस भस्मक पर संदेह उत्पन्न करती हैं. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा इस भस्मक में मल्टीइफेक्ट इवेपोरेटर लगाने के निर्देश दिए गए थे, किन्तु मध्यप्रदेश के आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय के प्रमुख सचिव ने इस आधार पर यह नहीं लगाने की पैरवी की क्योंकि ऐसा करने से इस भस्मक की लागत बढ़ जाती. दूसरी ओर मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय धार द्वारा 27 जून 2006 को जारी पत्र क्रमांक 8963 से यह बात जाहिर होती है कि सिक्योर्ड लेण्डफिल में क्ले कंपेक्शन 1000 एमएम के निर्धारित मानदण्ड के स्थान पर 600 एमएम में किया गया. स्थान के चयन पर सवाल केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाईड लाईन के अनुसार किसी भी वेस्ट मैनेजमेंट साईट से 500 मीटर की परीधि में किसी भी प्रकार का रहवासी क्षेत्र नहीं होना चाहिए. रामकी प्रबंधन द्वारा अपने साईट से तारपुर नामक गांव की दूरी 500 मीटर से अधिक बताई जाती रही है, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इन्दौर कार्यालय ने आरंभ से ही यह चिन्हित कर लिया था कि साईट से तारपुर गांव की दूरी 100 मीटर से भी कम है. बोर्ड द्वारा निरीक्षण् के दौरान यह भी इंगित किया गया था कि कार्य प्रारंभ करने से पहले मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कोई डिजाईन व ले आउट प्रमाण प्रस्तुत कर स्वीकृति नहीं ली गई, जबकि खतरनाक अवशिष्ट (प्रबंधान व हस्तालन) नियम 1989 (संशोधन मई 2003) के अनुसार ऐसा किया जाना जरूरी था.

        मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तत्कालीन सदस्य सचिव ने 24 दिसम्बर 2005 के पत्र क्र. 661 के माध्यम से वेस्ट मैनेजमेंट साईट के अंतर्गत पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के ए, बी, सी, डी और ई ब्लॉकों को चिन्हित करते हुए निर्देशित किया था कि ब्लॉक ए व सी की रहवासी क्षेत्र से पांच सौ मीटर से कम दूरी होने के आधार पर सिक्योर्ड लेण्डफिल स्थगित रखा जाये व बी, डी, और ई ब्लाक में कार्य किया जा सकता है. किन्तु इसका उल्लंघन करते हुए ब्लॉक ए में लैण्डफिल का निर्माण किया गया, जो तारपुर ग्राम के अत्यन्त निकट है. जिस पहाडी पर लगे भस्मक में इस कचरे को जलाने की चर्चा हो रही है, उसके नजदीक तारपुर नामक गांव है. इस भस्मक से 2 किलोमीटर की दूरी पर इन्दौर की सीमा लगती है. यहां से 8-10 किलोमीटर पर इन्दौर व महू की आबादी प्रारंभ हो जाती है. क्या करें इस कचरे का?

      एक खास सवाल यह है कि आखिर यूनियन कार्बाइड के कचरे को कहां ले जाया जाए? यह कचरा दुनिया के किसी भी हिस्से में दफन किया जाएगा, वहां जनजीवन के लिए खतरनाक साबित होगा. इस दशा में दुनिया में कई ऐसे उदाहरण सामने आए है, जिनमें कचरा उत्पन्न करने वालों को ही कचरे के निष्पादन के लिए जिम्मेदार माना गया है.
सन 2003 में कोडेकनाल में अमरीकी उद्योग द्वारा उत्पन्न किए गए कचरे को अमरीका ही भेजा गया था. यानी इससे यूनियन कार्बाइड के कचरे के निष्पादन का रास्ता खुलता है. इस कचरे को अमरीका भेजने या अमरीका के खर्च पर कनाडा, जर्मनी या डेनमार्क के प्लांटों में नष्ट किया जाना चाहिए.

         विशेषज्ञों का सुझाव है कि जब तक अमरीका सरकार यह कचरा नहीं ले जाती, तब तक इस कचरे को सुरक्षित रूप से कंटेनरों में पैक करके रखा जाना चाहिए, ताकि उससे जमीन में जहरीले रसायनों के रिसन को रोका जा सकें. इसके लिए मध्यप्रदेश और भारत सरकार को तीव्र इच्छाशक्ति दिखानी होगी.

        यह स्पष्ट है कि पीथमपुर मध्यप्रदेश एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है, जहां हजारों औद्योगिक इकाइयां स्थापित है. औद्योगिकरण के कारण यहां मजदूरों की बस्तियां बडे पैमाने पर विकसित हुई है और करीब पांच लाख मजदूर यहां निवास करते हैं. जबकि इन उद्योगों के प्रबंधकों के आवास इन्दौर शहर में है. इस दशा में इस कचरे का सर्वाधिक दुष्परिणाम पीथमपुर के मजदूरों को भुगतना होगा. यही कारण है कि उद्योगों के प्रबंधक वर्ग द्वारा इस कचरे को यहां नष्ट किए जाने का आज तक विरोध नहीं किया गया, दूसरी ओर रोजी-रोटी के संघर्ष में जूझ रहे श्रमिकों को इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई.

       कानूनी परिप्रेक्ष्य में देखें तो पीथमपुर में यह कचरा जलाया जाना यहां के मजदूरों के जीवन जीने के अधिकार का हनन है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेह 21 का खुला उल्लंघन है. क्योंकि इस कचरे से उनके स्वास्थ्य और जीवन पर खतरनाक दुष्परिणाम पड़ने वाला है. इन्दौर के लोकमैत्री समूह द्वारा इस मुद्दे को कई मंचों पर उठाया गया और प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी चर्चा की गई, इसके बावजूद मानव जीवन और पर्यावरण विनाश के इस मुद्दे पर सरकार कोई रास्ता निकालने को फिलहाल तो तैयार नहीं है

राखी रघुवंशी