संस्करण: 12 जुलाई-2010

भाजपा पर बरगद का साया
 




 

महेश बाग़ी

 

                          लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की मनमानियों पर अंकुश रखने के लिए सबल विपक्ष की ज़रूरत होती है। भारत में प्रमुख विपक्षी दल है भारतीय जनता पार्टी, जो विपक्ष की भूमिका निभाने में नाकाम नज़र आ रही है। ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने का यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है। पता नहीं, भाजपा नेता चैतन्यावस्था में नज़र क्यों नहीं आ रहे हैं ? दरअसल, राजनीति आज ऐसी महत्वाकांक्षी हो गई है, जहां एक बार सत्ता-सुख भोगने वाला दल उससे उबर नहीं पाता है। भाजपा के साथ भी यही हो रहा है। भाजपा के जंग लगे लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी भी ऐसी ही अवस्था में दिखाई दे रहे हैं।

              भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद स्थिति में कोई अंतर नहीं नज़र आ रहा है। वह आज भी सांडों और भेड़ों की श्रेणी के नेताओं में बंटी दिखाई देती है। इन सांडों ने हमेशा भेड़ों को दबाए रखा और नितिन गडकरी के नेतृत्व के बावजूद यही स्थिति है। उमा भारती को जब हुबली कांड के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, तब उन्होंने भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को सांड कहा था। उन्होंने साफ़ कहा था कि सांड भेड़ों को डराते हैं, किंतु दूसरे सांडों से उनका व्यवहार एकदम अलग है। इसे भाजपा का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि लोकसभा के दो-दो चुनावों में मुंह की खाने के बाद भी सांडों के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है।

             संघ ने काफ़ी मशक्कत के बाद नितिन गडकरी को पार्टी की कमान सौंपी, जो आज अलग-अलग गुटों में उलझ कर रह गए हैं। यह सच है कि गडकरी के अधयक्ष बनने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में आशा का संचार हुआ है और वे उत्साह से भरे हैं, लेकिन यह भी सच है कि विचार के मामले में पार्टी आज भी भटक रही है। इसकी एक ही वजह है और वह है पार्टी के शीर्ष नेताओं में समन्वय का अभाव। मौजूदा दौर में पार्टी में मची अंतर्कलह से तो ऐसा लग रहा है, गोया भाजपा कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि औद्योगिक घराना है। शीर्ष नेता एक दूसरे पर पीठ पीछे तीर चला रहे हैं। इन नेताओं का एक घड़ा उमा भारती को फिर पार्टी में लाने की कोशिशों में जुटा है, जबकि आडवाणी खेमा इसका विरोध कर रहा है। प्रधानमंत्री पद की 'वेटिंग' में लटक जाने के बाद भी आडवाणी की महत्वाकांक्षा हिलोरे मार रही है।

            सवाल यह है कि जब जसवंत सिंह की भाजपा में वापसी हो सकती है, तो उमा भारती की क्यों नहीं ? संभवत: आडवाणी को यह भय सता रहा है कि उमा की वापसी से भेड़ों को बल मिलेगा, जिन्हें काबू में रखना मुश्किल हो जाएगा। झारखंड और बिहार में ग़लत फैसले लेने का ख़ामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। इसके लिए सांडों का वह खेमा ज़िम्मेदार है, जिसके दबाव में ग़लत फैसले लिए गए। इस मामले में भाजपा और संघ ने मिल कर खूब मंथन भी किया, किंतु उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला।

             भाजपा और संघ में ज़ातिगत जनगणना को लेकर भी मतभेद हैं। संघ का मानना है कि इस मुद्दे पर भाजपा को राजनीतिक लाइन छोड़ कर राष्ट्रवाद को अपनाना चाहिए। संघ को यह भी आपत्ति है कि जिन्ना प्रकरण और जसवंत सिंह की वापसी को लेकर पार्टी ने लचीला रूख अपनाया। इस मुद्दे पर संघ ने पार्टी नेताओं को लताड़ा भी, किंतु उसका कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि पार्टी आज भी आडवाणी के प्रभाव में है। ऐसे में पार्टी में समन्वय स्थापित होने का प्रश्न ही नहीं है। संघ के आर्शीवाद के बावजूद नेताओं की आपसी खींचतान के कारण गडकरी अभी तक अपने पैर नहीं जमा सके हैं। गडकरी के अध्यक्ष बना कर संघ आडवाणी का प्रभाव कम करना चाहता था, किंतु इसमें वह सफल नहीं हो सका। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद आडवाणी संसद से संगठन तक हावी हो गए।

             आडवाणी आज भी कितने प्रभावी हैं, यह गत दिनों संपन्न राज्यसभा चुनावों में भी साफ़ हो गया। चंदन मित्रा को राज्यसभा में लाने के लिए आडवाणी ने काफ़ी ज़ोर लगाया। ये वही चंदन मित्रा हैं, जिनके कारण उड़ीसा में भाजपा और नवीन पटनायक अलग-अलग हो गए। इसी प्रकार राम जेठमलानी के मामले में भी आडवाणी ने पार्टी पर अपनी मर्ज़ी थोपी और उन्हें राज्यसभा सदस्य बनवाया। जेठमलानी का नरेन्द्र मोदी पर यह अहसान है कि उन्होंने गुजरात दंगे मामले में सुप्रीम कोर्ट में मोदी की ओर से पैरवी की थी, किंतु क्या इसी कारण उन्हें राज्यसभा में पहुंचाया जाना चाहिए था। ये वही जेठमलानी हैं, जिन्होंने लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ़ चुनाव लड़ा था। इतना ही नहीं, अफज़ल गुरु और इंदिरा गांधी के हत्यारों की पैरवी करने के कारण जेठमलानी की राष्ट्रभक्ति पर भी सवाल उठे थे। फिर आज वही जेठमलानी राष्ट्रभक्त कहीं जाने वाली भाजपा के कोटे से राज्यसभा में क्यों भेजे गए ?

            इन स्थितियों के लिए जितने आडवाणी दोषी है, उससे अधिक दोषी भाजपा है। जब आडवाणी पाकिस्तान में जिन्ना की मज़ार पर क़सीदे पढ़ कर आए थे, तभी पार्टी ने उनके विरुध्द अनुशासनात्मक कार्यवाही की होती, तो आज वे पार्टी में सिर उठाने की स्थिति में नहीं होते। उस समय तो उन्होंने संघ को भी कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। इससे साफ़ है कि भाजपा आज भी अपने वास्तविक स्वरूप में उभर नहीं पा रही है और सांड भेड़ों को हांकने में लगे हैं। अगर यही स्थिति रही तो 2014 के चुनाव में भी भाजपा को हाशिये पर ही रहना होगा। जागो गडकरी, जागो।

महेश बाग़ी