संस्करण: 12 जुलाई-2010

मोहन भागवत हाजिर हों!
आतंकवाद के भस्मासुर में उलझता जा रहा संघ



 

 

 

सुभाष गाताड़े

सूबा उत्तर प्रदेश के संघ के प्रमुख अशोक बेरी, संघ के कानपुर स्थित प्रांत प्रचारक अशोक वार्ष्णेय और अजमेर तथा मक्का मस्जिद बम धमाके के मास्टरमाइंड हाल तक झारखण्ड प्रांत के प्रमुख प्रचारक/आतंकवादी देवेन्द्रर गुप्ता में क्या समानता ढूंढी जा सकती है ? जहां संघ की शाखाओं में या संघ के आनुषंगिक संगठनों की गतिविधियों की देखरेख करने के उनके अपने अनुभव समान होंगे, वहीं एक ताजा समानता यह भी उभर आयी है कि हैद्राबाद में सीबीआई की जिस हिरासत में आतंकी देवेन्द्रर गुप्ता को रखा गया है, उसी के निशाने पर पिछले दिनों अशोक बेरी और अशोक वार्ष्णेय को भी हैद्राबाद में बुलाया गया तथा उनसे लम्बी पूछताछ की गयी। (RSS leaders from UP questioned in Mecca Masjid case, Smita Nair , Indian Express, Wed Jun 30 2010, 03:32 hrs Mumbai:) उन्हें यह साफ साफ पूछा गया कि आतंकी देवेन्द्र तथा अजमेर एवम मक्का मस्जिद धमाके के अन्य आतंकियों को - जो सभी संघ से सम्बध्द रहे हैं, जिनमें से दो इन दिनों फरार चल रहे हैं, उनके वे कितने दिनों से जानते हैं और उन्होंने जिस मानवद्रोही घटना को अंजाम दिया था, उसके बारे में आप को पहले पता था या नहीं तथा क्या आप ने उन्हें शरण दी थी या नहीं।

यह भी सूचना मिली है कि आतंकी देवेन्द्र गुप्ता जिसने अजमेर बम धमाके में तथा मक्का मस्जिद बम धमाके में संघ के अपने जिन अन्य प्रचारक/कार्यकर्ताओं के साथ योजना बनायी थी, जिन्होंने उसे इस दौरान शरण दी थी तथा अन्य सहयोग प्रदान किया था, उन सभी को एक एक करके सीबीआई के यहां हाजिरी लगानी पड़नेवाली है। मालूम हो कि पिछले दिनों सीबीआई ने देवेन्द्रर गुप्ता, रामचंन्द्र कलासांगरा, संदीप डांगे, लोकेश शर्मा और संघ के वरिष्ठ प्रचारक रहे सुनील जोशी (जिसकी दिसम्बर 2007 में रहस्यमय ढंग से हत्या हुई तथा मामले की खोजबीन करने के बजाय सूबा मध्यप्रदेश की सरकार ने मामले की फाईल बन्द कर दी) इन पांचों को मक्का मस्जिद बम धमाके में मुख्य आरोपी बनाया है।

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक मुस्लिम धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की योजना बनाने का असली मास्टरमाइंड संघ प्रचारक सुनील जोशी ही था, जो कथित तौर यात्री की भेष में मक्का मस्जिद में घुसा था और उसने वहां बम रखे थे। सीबीआई की जांच में पता चला कि जोशी, डांगे, कलासांगरा ये सभी इन्दोर से हैद्राबाद गए थे जहां सिकन्दराबाद के एक लॉज में रूके थे तथा वहां उन्होने बम बनाए थे। फिर आटोरिक्शा से वे मक्का मस्जिद पहुंचे थे।

भास्कर की ताजा रपट के मुताबिक (7 जुलाई 2010) आतंकवाद की घटनाओं में आते जा रहे कई संघ प्रचारकों के नाम से संघ का नेतृत्व 'बहुत चिन्तित' है तथा उसने अपने कई प्रभारियों को -जिनका नाम संदिग्धों की सूची में आने की बात की जा रही है -छुटटी पर भेजने की योजना बनायी है तथा कईयों को छुट्टी पर भेजा भी गया है। संघ का कहना है कि यह उन व्यक्तियों का 'अपना' मामला था और संघ का इससे कोई लेना देना नहीं रहा है। पिछले दिनों नीना व्यास के हवाले से द हिन्दू में भी जो खबर प्रकाशित हुई थी वह इसी बात को कह रही थी कि आतंकवाद की घटनाओं को लेकर संघ की जो समझदारी बनी है कि एक, ऐसे मामलों में आरोपियों के हक में कोई बयान न दिए जाएं ; दो, इनके लिए किसी भी तरह की मदद न पहुंचायी जाए तथा तीन, ऐसी जांच के मामले में पुलिस का सहयोग किया जाए।

लाजिम है कि संघ के नेतृत्व की चिन्ताएं जायज हैं नांदेड बम धमाके (अप्रैल 2006) जिसमें संघ के जो दो कार्यकर्ता -हिमांशु पानसे एवम राजीव - बम धमाके में मारे गए थे, उसके बाद से देश के अलग अलग हिस्सों में हुए कई बम धमाकों में अब संघ का ही नाम जुड़ता जा रहा है। तमिलनाडु के तेनकासी में संघ कार्यालय पर किए गए बम धमाके में भी उनके ही लोग पकड़े गए थे, जिन्होंने शहर की साम्प्रदायिक फिजा को खराब करने के लिए इसे अंजाम दिया था। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रीकाल में भी भोपाल में मुसलमानों की इज्तेमा के दौरान सुनील जोशी की अगुआईवाले आतंकी गिरोह ने बम रखे गए थे, जिन्हें समय रहते निष्क्रिय किया गया था।

संघ के लिए यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पहले अगर हिन्दू आतंकवाद के नाम पर नागरिक समाज का एक हिस्सा ही आंखें दरेर लेता था वहां पर भी स्थिति बदल गयी है। संघ भले ही आधिकारिक तौर पर इस बात से इन्कार करे कि देश भर में हुई विभिन्न आतंकी घटनाओं में पकड़े जा रहे संघ के प्रचारक/कार्यकर्ता अपने ही बलबूते योजना बनाते रहे हैं तथा संघ का इसमें कोई हाथ नहीं रहा है, मगर संघ जैसे श्रेणीबध्द संगठन को जाननेवाले लोग अन्दाज़ा लगाते हैं कि बातें इतनी आसान नहीं है।

लोगों को यह भी याद है कि मालेगांव बम धमाके की जांच जब हेमन्त करकरे की अगुआई में चल रही थी, तब भी शक की सुई कई संघी नेताओं की तरफ घुम गयी थी, विश्व हिन्दू परिषद के एक वरिष्ठ नेता जो गुजरात 2002 के दंगें में अपनी मानवद्रोही भूमिका से काफी कुख्यात हुए उन्हें पकड़ने की बाकायदा योजना बनी थी। 26/11 के हमले के बाद जिसमें खुद करकरे की रहस्यमय ढंग से हत्या की गयी, वह परिदृश्य बदल गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आप को सांस्कृतिक संगठन कहलाता है, उसके कर्णधारों से यह अवश्य पूछा जाना चाहिए कि संस्कृति के कामों के लिए निकले उसके प्रचारक बम और विस्फोटक क्यों बटोरने लगे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सांस्कृतिक कामों के नाम पर उन सभी के जो बौध्दिक लिए जाते हों उन्हें यही मतलब समझाया जाता हो।

सुभाष गाताड़े