संस्करण: 12 अगस्त-2013

माफियाओं के भरोसे चुनाव में जीत की आस में सपा

? हरे राम मिश्र

             न दिनों लखनऊ की सड़कों के किनारे हाल ही में लगाई गयी कुछ होर्डिंग ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस होर्डिंग में मुलायम सिंह के साथ अखिलेश यादव हैं तथा सपा सरकार में पूर्व मंत्री राजा भइया का एक बड़ा सा चित्र भी चिपका हुआ है। होर्डिंग पर लिखा है कि सत्य परेशान हो सकता है पराजित नही। यह होर्डिंग कुंडा के सीओ हत्या कांड में फंसे पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह को सीबीआई द्वारा क्लीन चिट दिये जाने के तुरंत बाद आयी है। गौरतलब है कि मरहूम सीओ की पत्नी परवीन आजाद ने सीओ जिया-उल-हक की हत्या के बाद कुंडा से विधायक राजा भइया पर हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगाया था तथा इसी प्रकरण के पीछे उन्हे अपनी मंत्री की कुर्सी भी गंवानी पड़ी थी। लगभग चार माह की जांच के बाद जब सीबीआई द्वारा उन्हे क्लीन चिट दे दी गयी है तब राजनैतिक गलियारों में उनकी सपा सरकार में जल्द वापसी की अटकलें तेज हो गयी हैं। बहरहाल राजा भइया ने सपा सरकार में वापस मंत्री बनने के लिए अखिलेश सरकार पर दबाव बनाना षुरू कर दिया है और सब कुछ ठीक रहा तो राजा भइया जल्द ही सरकार में फिर मंत्री बन जाएंगे। उत्तर प्रदेश में राजा भइया की छवि एक दबंग, माफिया और घोर अन्यायी सामंती मानसिकता वाली व्यवस्था के एक प्रतिनिधि की है। यह होर्डिंग यह बताने के लिए पर्याप्त है कि इस लोकतंत्र में माफिया तथा सामंती मानसिकता के लोग परिस्थिति वश भले ही कुछ समय के लिए राजनीति से ओझल हो जांय, पर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी मौजूदगी एक सच्चाई है। उनके बिना इस लोकतंत्र की अब कल्पना ही नही की जा सकती।होर्डिंग का यही संदेश है।

               गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से लगभग साठ सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। चाहे जातिगत सम्मेलनों का ताबड़तोड़ आयोजन हो या फिर पिछड़ा वर्ग का सम्मेलन, भाईचारा कमेटियों के गठन से लेकर सवर्ण ब्राहमणों पर से दलित उत्पीड़न के केस वापस लेने की बात, हर कदम पर सरकार की राजनीति साफ नजर आती है। अपनी चुनाव तैयारियों से सपा सरकार ने विपक्षियों के सामने यह साफ कर दिया है कि वह भी जातिगत और क्षेत्रीयता के गुणा गणित को आधार बना कर उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी रणनीति का निर्धारण कर रही है। एनआरएचएम घोटाले के आरोपी पूर्व बसपा सरकार में मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा जो इन दिनों जेल में हैं, के पत्नी और परिवार को सपा में शामिल कराकर मुलायम ने यह साफ कर दिया है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव में जातिगत दखल रखने वाले किसी भी माफिया अपराधी और गुंडे को सपा में शामिल करने और सत्ता की मलाई की हिस्सेदारी देने में संकोच नही करेंगें। लोकसभा चुनाव अधिकतम सीटें जीतना सपा की पहली प्राथमिकता में है। तरीकों को लेकर कोई कन्फ्यूजन नही है। राजा भइया की सपा मंत्रिमंडल में वापसी के बाद सरकार को आगामी लोकसभा चुनाव में कितना राजनैतिक लाभ प्रदेश में मिल सकता है इसका हिसाब सपा के राजनैतिक रणनीतिकारों ने लगाना शुरू कर दिया है।

                राजनीतिक रणनीतिकार यह बताते हैं कि राजा भइया प्रदेश की लगभग तीन लोकसभा सीटों पर अपना सीधा दखल रखते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति राजनीतिज्ञों के क्षेत्रीय पहचान पर चलती है और वर्तमान  परिदृष्य में इस बात की पूरी संभावना है कि इन इलाकाई क्षत्रप राजनीतिज्ञों का अपने-अपने सीटों पर प्रभावी दखल जरूर रहेगा। एक इलाकाई क्षत्रप के बतौर राजा भइया को इस परिदृष्य में वजन मिलना तय है। उत्तर प्रदेष के ठाकुर मतदाताओं के प्रतिनिधि चेहरे के बतौर भी राजा भइया स्थापित हो चुके हैं। समाजवादी पार्टी का प्रयास है कि हर जाति का प्रतिनिधि चेहरा लोकसभा चुनाव में जनता के सामने रहे। अन्य जातियों के कुछ मजबूत प्रतिनिधि चेहरों की तलाश भी सपा बड़ी तेजी से कर रही है।

               बहरहाल, राजा भइया की सपा में वापसी के बाद कई ऐसे सवाल फिर से पैदा हो जाएंगे जिनके ठोस उत्तर खोजे बिना मुलायम सिंह यादव अपने पांव उत्तर प्रदेश की राजनीति में टिका नही पाएंगे। दरअसल, उत्तर प्रदेश का अल्प संख्यक मुसलमान मतदाता इस समय समाजवादी पार्टी की सरकार से बेहद नाराज है। मुसलमानों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह यह है कि सपा सरकार ने उनसे विधानसभा चुनाव में किये गये वादे को अब तक पूरा नही किया। चाहे मुसलमानों को आरक्षण देने का मामला हो या फिर आतंकवाद के नाम पर जेलों में कैद मुसलमानों को छोड़ने का, सपा सरकार ने मुसलमानों से केवल एक लफ्फाजी ही की है और यह सब बातें मुसलमानों को खल रही हैं। पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश में ताबड़ तोड़ दंगों की जो बौछार आयी उसने भी मुसलमान मतदाताओं को काफी हद तक नाराज किया है। पिछले चुनाव में मुसलमान सपा के साथ था। इस समय सपा का विकल्प तलाष रहा है। निराशा में वह बसपा और कांग्रेस को वोट कर सकता है लेकिन इस बार वह समाजवादी पार्टी को वोट नही देगा।

              इस स्थिति के बाद सपा के चुनावी रणनीतिकारों ने मुसलमान वोटरों का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश का यादव वोट उसके हाथ से नही खिसकेगा। क्योंकि प्रदेश की राजनीति में उसके पास राजनैतिक विकल्प के तौर पर तो कोई नही है लिहाजा यादव कहां जाएंगे? सपा की समस्या नई राजनीतिक परिस्थितियों के मुकाबले तथा मुसलमानों के वोट गैप को भरने की है। समाजवादी पार्टी राजा भइया सरीखे सामंती ताकतों तथा माफिया घोटाले बाजों की शरण में जाकर जातिगत और माफिया गुणागणित के सहारे इस गैपिंग को पूरा करना चाह रही है। सवर्ण जातियों के सम्मेलन इसी मानसिकता की उपज हैं। लेकिन उसकी राहें इतनी आसान नही हैं। भाजपा भी नरेन्द्र मोदी मंदिर मुद्दा और हिन्दुत्व के बल पर सवर्ण वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ा रही है। इन स्थितियों में भाजपा के हिन्दत्व कार्ड के आगे सपा की ये चालें सवर्ण वोटरों को उसके पक्ष में पोलराइज कैसे कर पाएंगी।

                 वास्तव में जिस सामाजिक न्याय के सवाल पर देश में हुए आंदोलन, और मंडल आयोग की उपज मुलायम सिंह जैसे लोग है वे आज उससे और उसके उद्देष्यों से भटक कर काफी दूर चले गये हैं। सामाजिक न्याय के सवाल पर अब ये केवल घड़ियाली आंसू बहाते हैं। केवल सत्ता की मलाई चाटना अब ही इनका उद्देश्य है। इसके लिए उन्हे माफिया, सामंत, गुंडों और पूंजीपतियों का साथ लेने में भी हिचक नही है। लोकसभा चुनाव के पहले जिस तरह से यूपी में जातिगत गुणा गणित तथा सामंती मानसिकता के विधायकों, माफियाओं के सहारे किसी भी तरह सत्ता में आने की कोशिशें सपा द्वारा की जा रही हैं वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरनाक है। ये प्रयास बताते हैं कि प्रदेश में खुद की सरकार के होते हुए भी सपा अपनी सम्मान जनक जीत के प्रति आश्वस्त नही है।

               दरअसल समाजवादी पार्टी की सरकार आज अपने ही बुने हुए चक्रव्यूह में बुरी तरह से फंस चुकी है। इस सरकार के पास लगभग डेढ़ साल के शासन काल में केवल असफलताएं और नाकामियां हैं। चुनाव की वैतरिणी पार करने के लिए राजा भइया और बाबू सिंह कुशवाहा जैसे लोगों की शरण में जाने के अलावा अब सपा के पास कोई विकल्प ही नही है। और अफसोस यह कि यह विकल्पहीनता इन्ही जैसे लोगों ने पैदा की है। मुलायम सिंह आम जनता को हाशिए पर फेकते लोकतंत्र को पुष्ट करते हुए अपने वर्गीय स्वार्थ को पूरा कर रहे हैं। माफियाओं के रण में जाना क्या यही सिध्द नही करता है?

? हरे राम मिश्र