संस्करण: 12 अगस्त-2013

संदर्भ-दुर्गा शक्ति के बहाने आईएएस के संस्थागत ढांचे को ठेंगा

राष्ट्र बनाम् राज्य की अवधारणा

?  प्रमोद भार्गव

          देश में राजनीति कितने घटिया स्तर पर पहुंच गई है,यह हम युवा आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नगपाल के निलंबन की प्रतिक्रिया में सामने आ रहे नए राजनीतिक संघर्ष में देख सकते है। यहां तक तो फिर भी ठीक था कि तूल पकड़ चुके इस मुद्दे को राजनीतिक दल,दलीय हितों की दृष्टि से देख रहे थे,लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा रामगोपाल यादव ने केंद्र को जिस बेहूदे ढंग से अखिल भारतीय प्रशासानिक सेवा के सभी आधिकारियों को उत्तर प्रदेश से वापस बुला लेने का हवाला दिया है,यह स्थिति राष्ट्र बनाम राज्य की संस्थागत संवैधानिक अवधारणा को ठेंगा दिखाने जैसा है। कल को रामगोपाल या मुलायम सिंह यह भी कह सकते हैं कि आईपीएस,आईएफएस निर्वाचन आयोग और केंद्ररीय रिर्जव पुलिस बलों को भी बुला लीजिए? हम अपने स्तर पर राज्य सेवा के आधिकारियों से काम चला लेंगे?इस मंशा के लोगों को चुनाव आयोग की तो जरूरत ही नहीं रह जाएगी क्योंकि फिर राजशाही का दौर लौट आएगा और मुलायम सिंह यादव के एकतंत्रीय हुकूमत की वंश-बेल चल निकलेगी। तब कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार अधिकारियों के निलंबन तथा तबादले की जरूरत ही नहीं रह जाएगी,सीधे उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में मुलायम-अनुज का यह बयान राष्ट्र्र की संप्रभुता और जनतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है?

               भारत में वर्तमान में जनतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार पूंजीवादी व्यवस्था है, जो प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध दोहन पर अवलंबित है। इस पूंजी आधारित लोकतंत्र को जब राजनीतिक दल सामान्य ढंग से गतिशील बनाए रखने में खुद को अक्षम पाते हैं तो स्वेच्छाचरिता और निरकुंश्ता पर उतर आते हैं। आजादी के इन पैंसठ सालों में संवैधानिक लोकशाही के पटल पर तानाशाही की ये प्रवृतियां कई बार उभरी हैं। यह मनोवृत्ति विधायिका और न्यायपालिका में टकराव का कारण भी बनती रही है। न्यायपालिका के ऐतिहासिक फैसलों पर न्यायिक सक्रियता के आक्षेप लगाकर विधायिका फैसलों को बदलती रही है। यही वजह रही है कि भारत का संस्थागत ढांचा कमजोर होता चला जा रहा है। ऐसे में रामगोपाल का केंद्र को यह उलाहना मारना की आईएस अधिकारियों को वापस बुला लीजिए,चार खंबो पर टिके भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में है। क्योंकि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका लोकतंत्र केऐसे मजबूत स्तंभ हैं,जो भारत की राष्ट्र-राज्य की न केवल अवधारणा को मजबूती देते हैं,बल्कि अखण्डता और संप्रभुता को भी एक सूत्र बांधें रखने का काम करते हैं। यदि उत्तर प्रदेश से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को वाईदवे वापस बुला लिया जाता है ;हालांकि यह महज कल्पना है तो भारत का केंद्र शासित संघीय ढ़ांचा ही खतरे में पड़ जाएगा। यह स्थिति अलगाववादियों की मंशापूर्ति का आधार बन सकती है। आज कश्मीर भारत का हिस्सा है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वह केंद्र्र के नियंत्रण में है और भारतीय सेना पकिस्तानी घुसपैठीयों से लगातार मुठभेड़ करते हुए न केवल सीमा की सुरक्षा में डटी है,बल्कि अलगाववादियों की मंशा पर पानी भी फेर रही है। अस्सी के दशक में पंजाब को अलग देश खालिस्तान बना देने वाले हिंसक उग्रवाद को भी इसलिए नियंत्रित कर सके, क्योंकि अंतत राज्य सत्ता को नियंत्रित करने के संवैधानिक विशेषाधिकार केंद्र के पास थे ?राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ कार्यपालिका और सेना भी राष्ट्र्रीय अखण्डता के लिए प्रतिबध्द थे। इसी प्रतिबध्दता नतीजा है कि आज पंजाब और कश्मीर भारत के भौगोलिक नक्शे में शामिल हैं।

               भारत के ससंदीय लोकतंत्र की मूल अवधारणा ब्रिटिश वेस्ट मिनिस्टर मॉडल से ली गई है। जहां संसदीय संस्थाओं की नैतिकता और विकास का एक लंबा इतिहास रहा है। ब्रिटिश हाउस ऑंफ लॉर्ड पुरातन और आधुनिक पंरपराओं को साथ लेकर चलने का गवाह रहा है। संविधान के बुनियादी तत्वों को लोकतंत्रिक व्यवस्था में समायोजित करके चलने का एक आदर्श और अनुकरणीय उदाहरण पेश करता रहा है। इसी तर्ज पर संयुक्त राज्य अमेरिका के उच्च सदन सानेट में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया जाना,राष्ट्र की अवधारणा में राज्यों द्वारा समन्वयकारी भूमिका का निर्वाह करना और संवैधानिक संस्थागत सरंचना का सम्मान करना राज्यों की नैतिक जिम्मेबारियों में शामिल है। इसीलिए इन दोनों यूरोपीय देशों की संस्थाओ का अपने-अपने लोकतंत्रों को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका अंतनिर्हित है। लिहाजा इसलिए इनका न केवल आर्थिक वर्चस्व कायम है, बल्कि ये वैश्विक शक्तियों में सिरमौर भी हैं।

               अमेरिका और ब्रिटेन की लोकतातंत्रिक व्यवस्था में एक अच्छाई यह भी है कि वहां व्यक्ति जब सीनेटर अर्थात निर्वाचित जनप्रतिनिधी की हैसियत हासिल कर लेता है तो उसे संविधान की शपथ लेने से पूर्व अपने व्यावसायिक हितों को अनिवार्य रूप से छोड़ना होता है। जबकि हमारे यहां इसके ठीक उलट स्थिति है। अव्वल तो राजनीति में कालेधन के कुबेर ही आ रहे हैं अथवा  निर्वाचित जन प्रतिनिधी बन जाने के उपरांत वैध-अवैध करोबार से जुड़ जाते हैं। समाजवादी पार्टी द्वारा नोएडा से लोकसभा के उम्मीदवार घोषित किए गए नरेंद्र सिंह भाटी रेत माफिया हैं। यहां की एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल ने जब बालू के इस अवैधा उत्खनन पर अंकुश लगया तो उन्हें छद्म धर्मनिरपेक्षता वादियों ने मस्जिद की तथाकथित दीवार गिराने का आरोप लगाकर निलंबित कर दिया। जबकि इस मामले में खाबरिया चैनलों के माधयम से जो भारोसे के लायक तथ्य सामने आए हैं,उस परिप्रेक्ष्य में उनकी पीट थपथपाने की जरूरत थी। क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखते हुए सरकारी जमीन से एक अवैधा निर्माण को स्थगित किया था ? हकीकत से रूबरू होने के बावजूद मुस्लिम वोटों को धा्रुवीकृत किये जाने की दृष्टि से नेता बनाम नौकरशाही के इस मुद्दे ने सद्भाव के वातावरण को विडंबना का रूप दे दिया है और आदर्श व यथार्थ के बीच की खाई इतनी चौड़ी बना दी है कि एक उदीयमान कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की सेवा सुरक्षा का सवाल देश का राष्टीय अजेंडा बन गया है। इसे एक ईमानदार व उत्साही आधिकारी के विरूध्द राजनैतिक हित पूर्ति के लिए अवांछित कार्रवाई माना जा रहा है। वह तो अच्छा है कि देश का नागरिक साम्प्रदायिक दृष्टि से इतना परिपक्व हो गया है कि उसने मुद्दे की वास्तविकता को समझ लिया और वह  छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी राजनीतिकों के बहकावे में नहीं आया। बल्कि उसने दुर्गाशक्ति पर लगाए गये तथाकथित आरोपों का पुरजोरी से खण्डन किया। मस्जिदों के उलेमाओं ने भी इसी सुर में सुर मिलाया। जाहिर है मुखौटावादी सत्ताधारियों के मंसूबों पर पानी फिर गया। बावजूद वे हठ धारण किए हुए है। लिहाजा इस परिप्रेक्ष्य में प्रकारांतर से जहां कार्यपालिका का उत्साह ठंडा हुआ है, वहीं संविधान सम्मत स्ंथागत ढांचे को विधायिका की और से चुनौती भी पेश हुई है ? हालांकि केंद्र्र ने अब आखिल भारतीय सेवा नियमों - 1969 में बदलाव लाने की बात कही है। यह एक सही कदम हो सकता है, लेकिन जिस प्राकृतिक संपदा की लूट पर मौजूदा पूंजीवादी अर्थव्यस्था अटक गई है, वह अटकी रहे इस नजरिये से केंद्र सरकार, प्रशासन की मजबूती के कोई ऐसे उपाय कर पाएगें, जो उन्हें कानूनी स्वायत्ता देने वाले उपाय साबित हों। यह सवाल निर्णयात्मक मोड़ पर नहीं पहुंचने तक अनुत्तरित ही रहेगा ?

   
? प्रमोद भार्गव