संस्करण: 12 अगस्त-2013

एनडीए में व्याप्त भ्रष्टाचार से व्यथित हो जब वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दिया

? एस.एस.हरदेनिया

            ह मानवीय स्वभाव है कि वह इतिहास को शीघ्र भूल जाता है। आज भारतीय जनता पार्टी के नेता चिल्ला चिल्लाकर केन्द्रीय सरकार और कांग्रेसी नेताओं के भ्रष्टाचार के विरूध्द आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनका इरादा है कि 2014 का चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा जाए। पर भाजपा के नेता इस बात को भूल गए हैं कि वर्ष 2001 में कुछ ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुईं थीं कि अटल बिहारी वाजपेयी को त्यागपत्र की धमकी देना पड़ी थी। उस समय के समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर बड़े बड़े अक्षरों में प्रधानमंत्री की धमकी का समाचार छपा था। दिनांक 26मार्च 2001 के 'इंडिया टुडे' के कवर पेज पर पार्टी के भीतर तनाव से परेशान वाजपेयी जी का चित्र छपा था। चित्र में वाजपेयी अपनी आंखों को अपने हाथ से छिपाये हुए दिख रहे हैं। इस चित्र का शीर्षक था 'शेम्ड एण्ड क्रिपल्ड' (Shammed and crippled) अर्थात शर्म से लड़खड़ाते हुये। 26 मार्च के अंक के आसपास भाजपा के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रक्षा मंत्रालय के सौदे से संबंधित एक मामले में रिश्वत लेते पकड़े गये थे। जब यह मामला संसद में उठा तो प्रतिपक्ष के सदस्यों ने सत्ताधारी दल को 'चोर' के विशेषण से संबोधित किया था। उस समय के समाचार पत्रों में लिखा गया था कि यह देश के लिये शर्म की बात है कि केन्द्र में शासन कर रहे दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष देश की रक्षा के समान संवदेनशील मामले में रिश्वत लेते पकड़ा गया। यह बात इतनी बढ़ी कि अंतत:तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस को इस्तीफा देना पड़ा।

                    इसी दरम्यान एक और सनसनीखेज घटनाक्रम हुआ। इस घटनाक्रम में रक्षा मंत्री फर्नाडीस की मित्र जया जेटली ने हथियारों के कुछ व्यापारियों को रक्षा मंत्री के शासकीय निवास पर आमंत्रित किया और हथियारों के खरीद फरोख्त के बारे में विस्तृत बातें कीं। न सिर्फ बातचीत हुई वरन् जया जेटली ने इन व्यापारियों से 2लाख रूपये की सहायता भी स्वीकार की।

                  इस घटनाक्रम से वाजपेयी का सिर शर्म से झुक गया। इस घटनाक्रम के अलावा प्रधानमंत्री सचिवालय जिसे पीएमओ कहते हैं,भी विवाद में फंस गया। उस दौरान वाजपेयी के चहेते अधिकारी, पूर्व विदेश सचिव, ब्रजेश मिश्रा एक प्रमुख सत्ता केन्द्र के रूप में उभर कर आये थे। उनकी ताकत इतनी बढ़ गयी कि वे भी वाजपेयी के लिये परेशानी का कारण बने। इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुये समाचार पत्रों में लिखा गया कि अपने 44वर्ष से ज्यादा संसदीय कार्यकाल में वाजपेयी को ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों से नहीं गुजरना पड़ा।

                 इस समय भाजपा का नेतृत्व सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को अपनी तीखी आलोचना का निशाना बनाये हुये है। अभी हाल में मधयप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी आशीर्वाद यात्रा के दौरान सोनिया गांधी से कहा कि उनमें हिम्मत हो तो वे अपने दामाद की गतिविधियों की जांच करायें। परन्तु भाजपा का नेतृत्व भूल गया, वाजपेयी के एक तथाकथित दामाद ने भी वाजपेयी को मानसिक क्लेश दिया था। वाजपेयी के इस तथाकथित दामाद का नाम है रंजन भट्टाचार्य। भट्टाचार्य का शासकीय मामलों में हस्तक्षेप अनेक लोगों की नाराजगी का कारण था। उन्हें संविधानेतरअथोरिटी माना जाता था। उनके हस्तक्षेप के किस्से वाजपेयी के कानों तक पहुँचते थे। 1996 में अपनी 16दिन की सरकार के दौरान वाजपेयी ने रंजन भट्टाचार्य को आफिसर ऑन स्पेशल डयूटी बनाया था। भट्टाचार्य वाजपेयी की अनेक यात्राओं में उनके साथ जाते थे। बंगारू लक्ष्मण ने तहलका टेप में रंजीत भट्टाचार्य की भूमिका का उल्लेख किया था। लक्ष्मण ने कहा था कि रंजीत भी व्यापारियों और उद्योगपतियों की भरसक मदद करते हैं।

                यह भी भुला दिया गया कि जब बंगारू लक्ष्मण और जया जेटली द्वारा देश की रक्षा के साथ की गई खिलवाड़ का पर्दाफाश हुआ था, उस समय, सारे देश में एनडीए सरकार के विरूध्द आक्रोश की लहर फैल गयी थी। जनता की प्रतिक्रिया जानने के लिए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण के नतीजे में जनता ने कहा था कि सत्ताधारी राजनीतिज्ञ समाज के भ्रष्टतम लोगों की श्रेणी में आते हैं। सबने एक स्वर से रक्षा के क्षेत्र में रिश्वतखेरी की तीव्र शब्दों में निन्दा की थी। एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या रक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार के सनसनीखेज रहस्योद्धाटन के चलते रक्षा मंत्री जार्ज को इस्तीफा देना चाहिये। 61प्रतिशत लोगों ने उत्तर दिया 'हाँ'। एक सवाल यह भी पूछा गया कि क्या इस घटनाक्रम से भारतीय जनता पार्टी की छवि धूमिल हुई है, तो 73प्रतिशत लोगों ने इससे सहमति जताई थी। 42प्रतिशत लोगों ने कहा कि वाजपेयी सरकार की छवि भी धूमिल हुई है। एक और प्रश्न के उत्तर में लोगों ने कहा कि इससे रक्षा के बारे में सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। लोगों से यह भी पूछा गया था कि उनकी नजरों में किस वर्ग के लोग सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं। 83प्रतिशत ने कहा कि राजनीतिज्ञ, 6 प्रतिशत ने बताया कि नौकरशाह, 4 प्रतिशत ने बताया कि क्रिकेट के खिलाड़ी,2 प्रतिशत ने कहा कि स्टाक ब्रोकर,1प्रतिशत ने फिल्मी सितारे और अन्य एक प्रतिशत ने कहा कि पत्रकार। इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा मानसिक क्लेश वाजपेयी को हुआ।

                 2001 के अगस्त माह में एनडीए में हुये घटनाक्रम से परेशान होकर वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने की धमकी दी थी। उस दिन सत्ताधारी दल के सांसदों की बैठक संसद भवन में चल रही थी। उस दिन सांसदों से अपने विचार प्रगट करने का आव्हान किया गया। उस दिन की बैठक में लालकृष्ण आडवाणी उपस्थित नहीं थे। एकाएक वाजपेयी ने माईक थाम लिया और कहा कि,''जो कुछ हो रहा है मैं उसकी जिम्मेदारी लेता हूँ। मैं,अपना पद त्यागना चाहता हूँ। कृप्या मेरे स्थान पर किसी और को चुन लें। मुझे बताया जाता है कि मैं वृध्द हो गया हूँ और मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। इसके पहले कि दूसरे लोग कहें,मैं त्यागपत्र देना चाहता हूँ।'' वाजपेयी का इतना कहना था कि चारों तरफ से आवाजें उठीं 'नहीं नहीं' उसके बाद हाल में पूरी तरह से सन्नाटा छा गया। वाजपेयी अपनी कुर्सी से उठे और जाने लगे। जसवंत सिंह उनके पीछे दौड़े। प्रमोद महाजन ने कहा यह हमारी अग्नि परीक्षा है। प्रमोद महाजन ने यह भी कहा कि,अभी जो कुछ हुआ है उसके बारे में एक शब्द भी हाल के बाहर नहीं जाना चाहिये। मिनटों में समाचार बाहर पहुँच गया और टीवी चैनलों ने वाजपेयी की इस्तीफे की पेशकश की खबर दे दी। महाजन ने आडवाणी को खबर दी। फिर आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी के साथ वाजपेयी की मान-मनौव्वल के लिए आए। स्पष्ट है कि वाजपेयी मान गये। बाद में पता लगा कि वाजपेयी ने अपने इस गंभीर फैसले के बारे में किसी को भी नहीं बताया था। यहां तक कि ब्रजेश मिश्रा को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। वाजपेयी ने शायद अपने परिवार के सदस्यों से परामर्श कर यह फैसला किया था। बाद में लोगों ने कहा कि वाजपेयी ने इस्तीफे की धमकी देकर अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी का विश्वास जीत लिया। परन्तु यह घटनाक्रम बताता है कि 2001 के आते-आते एन.डी.ए. की आंतरिक स्थिति कितनी डांवाडोल हो गई थी। यह स्वाभाविक है कि जब लोगों को 2001 में घटे इस घटनाक्रम के बारे में पता लगेगा तो वे आज के भाजपा नेताओं द्वारा की जाने वाली कांग्रेस की स्थिति की तुलना सन् 2001 की भाजपा की स्थिति से करना चाहेंगे।

   

   ? एस.एस.हरदेनिया