संस्करण: 12 अगस्त-2013

तेलंगाना निर्माण दोनो क्षेत्रों के लिये फायदे का सौदा

? के.एस.चलम

         तेलंगाना के लोगों द्वारा लंबे समय से संजोया गया पृथक राज्य का सपना अब जल्द ही साकार होने जा रहा है। 56 साल तक साथ रहने के बाद संयुक्त राज्य (आंध्रप्रदेश) अब पुन: एक दूसरे से जुदा हो जायेंगे जो निश्चय ही भावनात्मक रूप से कठिन तथा वेदनादायी है। लेकिन राज्य अथवा राष्ट्र इसी प्रकार उभरते और विकसित होते है। यह हमारी साझा संस्कृति और विरासत को प्रतिबिंबित करने का समय नहीं है क्योंकि इसमें कोई एक उस तरह भौतिक रूप से अलग या पुनर्वासित नही हुआ है जैसा कि विभाजन में होता है। हमें हमारी साझा संस्कृति, भाषा और भविष्य को समृध्द करते हुये अपने अनुभवों और संसाधनों को एकदूसरे से साझा करके निरंतर आगे बढ़ना है।

               हम यहाँ क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर संक्षेप में प्रकाश डाल सकते हैं। अडापा सत्यनारायण, रामकृष्ण रेड्डी, तिरूमाली, वसंत बावा और अन्य विद्वानों द्वारा क्षेत्र के आर्थिक इतिहास का वर्णन किया गया है जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि  तेलंगाना की एक खासियत है जो दूसरे राज्यों से भिन्न है। यह सचमुच एक पहेली है कि निजाम ने समुद्रीतट रहित भूभाग से घिरे इस क्षैत्र में इतनी अकूत संपत्ति कैसे संचित कर ली। ऐसा पता चला है कि राज्य द्वारा औद्योगीकरण के रूप में आर्थिक गतिविधियाँ प्रारंभ की गई थी जिसने अपने प्राचीन संचित धन से संसाधन जुटाये। निजाम ही वे व्यक्ति थे जिन्होने 1920 के दशक के दौरान 40 लाख एकड़ बंजर भूमि को जोतने के लिए बाहरी लोगों को बुलाया था जिन्होने सार्वजनिक निवेश के लिये कृषि का अतिरिक्त उत्पादन करने मे मदद की।

               इस प्रकार, निजाम ने एक अलग-थलग पड़े प्रान्त की कमजोरी को दूर करने तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर निर्भरता समाप्त करने के लिये एक मॉडल विकसित किया था। उक्त विद्वानों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ठगों की चौकड़ी (प्रभावशाली जातियों) ने किस प्रकार राजस्व अभिलेखों में अपने नाम जमीन मालिकों के रूप में दर्ज कराने के लिए राजस्व अधिकारियों को घूॅस दी।

                बाद में तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष और क्षेत्र में भूमि के वितरण के साथ-साथ अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण कुछ अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग  भूमि स्वामी बन गये तथा उन्हे औसत जोतें प्राप्त हो गई जो तटीय आंध्रप्रदेश की तुलना में अधिक थी। इस स्वरूप को नवगठित होने जा रहे राज्य में आर्थिक कार्यक्रमों को तैयार करते समय धयान में रखा जाना चाहिए। ऑंकड़ों के पुन: समायोजन के बाद इन वर्गों की जनसंख्या के अनुपात में भी वृध्दि होगी।

                 देश में अनेक राज्य ऐसे है जहाँ समुद्री तट नही होकर वे थल सीमाओं से घिरे हुये है तथा कम विकसित है। तथाकथित बीमारू राज्य (बिहार, मधयप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) ऐसे ही राज्य है। यहां तक कि पंजाब, हरियाणा और हिमालयी राज्य भी व्यापार के उदारीकरण से लाभान्वित नहीं हुये है। वास्तव में, आर्थिक उदारीकरण के बाद क्षेत्रीय असमानताओं में वृध्दि हुई है क्योंकि निवेश, एफ.डी.आई. आदि सभी आर्थिक गतिविधियाँ सिर्फ तटीय क्षेत्रों और कुछ शहरी समूहों पर केंद्रित रही हैं।

               राष्ट्रीय राजधानी शहर होने तथा राजनीतिक रूप से उत्तार एवं पश्चिम का मधयवर्ती होने के कारण दिल्ली इस बात का एक अपवाद है। यही कारण है कि सरकार अब औद्योगिक विकास के लिए दिल्ली-मुंबई कॉरीडोर विकसित कर रही है। एक स्थल भूभाग से घिरे होने के कारण तेलंगाना को इन राज्यों के अनुभवों और अपने विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक परिवेश से सीखने की जरूरत है। हैदराबाद शहर भूमि संबंधी कारकों और अनेक सामाजिक-आर्थिक कारकों की वजह से विकसित किया गया था। यह शहर अब उन विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के हित समूहों के बीच विवाद की जड़ बन गया है जो निकटवर्ती है तथा 900 किलोमीटर तक बसे पिछड़े आंध्रप्रदेश की भॉति नही है।

                कुछ नेताओं का सुझाव है कि शहर को पूरे क्षेत्र के विकास की देखभाल के लिए एक विकास केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिये। हम उनका ध्यान अमेरिका और यूरोप में हाल ही में घटित घटनाओं की ओर आकर्षित कर सकते हैं जहॉ डेट्रोइट जैसे शहर बिखर गये है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि शहर और उसके संसाधानों का ग्रामीण तेलंगाना के विकास के लिए उपयोग किया जा सकता है, लेकिन, शहर का एक अधिकतम सीमा से अधिक विस्तार करके उसे अनुत्पादक और प्रतिगामी नही बनाया जा सकता।

                हैदराबाद शहर सेवा क्षेत्र, अनुसंधान और विकास के केंद्र के रूप में उभरा है जो किन्ही ठोस वस्तुओं का उत्पादन नही करते बल्कि सिर्फ भारविहीन सामग्री और सॉफ्टवेयर निर्माण करते है जिन्हे दूसरे देशों को निर्यात करने के लिए जलपोत या जहाजों की जरूरत नहीं पड़ती है। उनके निर्यात के लिये तो सिर्फ सैटेलाइट और इंटरनेट की सुविधा ही पर्याप्त हैं।

               एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य जिसे ध्यान में रखना चाहिए वह यह है कि समूचा सॉफ्टवेयर कारोबार कुछ सॉफ्ट कौशल और आधुनिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण पर आधारित है। हमारा मानना है कि इस क्षेत्र में तेलंगाना के युवक-युवतियों का अनुपात सीमित है क्योंकि उन्हे उच्च शिक्षा का कमजोर क्षेत्र विरासत में मिला है। जैसा कि किसी ने हाल ही में टिप्पणी की है कि हैदराबाद शहर में अधिकांश इंजीनियरिंग और व्यावसायिक कॉलेज या तो अल्पसंख्यकों के नियंत्रण है या दूसरों के। अतएव जैसा कि स्व. श्री जयशंकर चाहते थे- हमें तेलंगाना के युवाओं को भविष्य में अधिक जिम्मेदारी संभालने हेतु तैयार करने के लिए शिक्षण संस्थानों को प्राथमिकता देनी होगी।

               कुछ आलोचकों का कहना है कि हैदराबाद शहर ने लोगों को ग्रामीण तेलंगाना की स्थिति का पता लगाने की कभी भी अनुमति नहीं दी। हैदराबाद और उसके विस्तारित क्षेत्र- रंगा रेव्ी, मेडक, नलगोंडा के कुछ भागों में विकास संरचना का असर बहुत कम हुआ है। यह दिलचस्प है कि शहर से लगा हुआ महबूबनगर आज भी सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्रों में से एक बना हुआ है।

                 निजामाबाद, आदिलाबाद, महबूबनगर और यहां तक कि वारंगल की प्रति व्यक्ति एसडीपी (राज्य घरेलू उत्पाद) संयुक्त आंध्रप्रदेश और हैदराबाद की एसडीपी से कम है। (सीमांध्रा के कुछ जिलों की भी यही चिन्ता है।) यदि हम कृषि के लिए संभावनाओं की ओर धयान दें तो इसके लिये जोत का आकार और जल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। यह देखा गया है कि तेलंगाना में औसत जोत तटीय आंध्र की तुलना में बहुत अधिक (2.4 हेक्टेयर) है और शीर्ष 5 प्रतिशत लोगों का 33 प्रतिशत भूमि पर अधिकार है। यह दक्षिण आंध्रप्रदेश में बहुत अधिक है।

                 मुद्दा यह है कि तेलंगाना में जमींदारों या बड़े किसानों द्वारा अपनी अधिशेष भूमि का प्रयोग क्षेत्र के औद्योगीकरण के लिए नहीं किया गया है। हो सकता है कि वे शायद हैदराबाद के ग्लैमर के लालच में फॅस गये हो। हम आशा कर सकते है कि वे अब जिलों में औद्योगीकरण और उत्पादन का रूख करेंगे। नवगठित राज्य की जिम्मेदारी न सिर्फ तत्कालीन निजाम की तरह वहाँ औद्योगीकरण को बढ़ावा देने की है बल्कि उसे पिछड़े जिलों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उद्योगों का प्रसार भी करना होगा जिससे कि विकास से वंचित लोगों के सपनों को साकार किया जा सके।

                राज्य में जल एवं खनिज तथा प्राकृतिक संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिन्हे काफी सूझ-बूझ के साथ संवर्ध्दित करने की जरूरत है। दिलचस्प है कि तेलंगाना द्वारा धीरे-धीरे अपनी 30 प्रतिशत उपजाऊ भूमि को कपास के लिए स्थानांतरित कर दिया गया है। राज्य के पास हथकरघा और वस्त्र उद्योग में पर्याप्त कौशल उपलब्ध रहा है लेकिन उसका कभी भी प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया गया है। यहाँ से कच्चा कपास तमिलनाडु को निर्यात किया जाता है और हेण्डलूम और पॉवरलूम के लिये यार्न का आयात किया जाता है जो उसे बहुत मंहगा बना देता है। इसी कारण लोगों ने यहाँ से पलायन किया है और अनेक बुनकरों ने आत्महत्याएँ की है।

                इसके अतिरिक्त नये राज्य को नागपुर में उभरते इंटरनेशनल एयर कार्गो कोरीडोर के साथ जोड़ने और तटीय आंधा्रा के प्रकासम/गुन्टूर बन्दरगाहों तक आसान पंहुच बनाने के लिये अपनी सड़कों और कोरीडोर को विकसित करना होगा। नवगठित तेलंगाना को अपने अतिरिक्त संसाधन आंध्रप्रदेश के साथ साझा करके वहाँ के तटीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ प्रारंभ करने का अवसर प्राप्त होगा जिससे वह अपने पिछड़ेपन से उबरकर आंधा्र के साथ-साथ विकास कर सके।

                भाईचारे की विरासत को निरंतर बनाये रखने और बरसों तक अभिन्न रही महान तेलगू संस्कृति को दर्शाने के लिहाज से यह दोनों ही राज्यों के लिये फायदे का सौदा है।

? के.एस.चलम