संस्करण: 12 अगस्त-2013

दिग्विजय सिंह को बदनाम करो.....

आगे बढ़ो।

? दिव्या शर्मा

         जुलाई 2013 का दूसरा पखवाड़ा देश की मुख्य धारा के मीडिया द्वारा कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को समर्पित किया गया है। दिग्विजय सिंह एक ऐसे असाधारण राजनेता है जो अपनी टिप्पणियों, भाषण, ब्लॉग और ट्वीट के कारण हमेशा से विपक्ष के निशाने पर रहे है। विपक्षी दलों के कुछ लोग उन्हे पागल कहते है  और उपचार के लिये उन्हे पागलखाने भेजने की सलाह देते है। कुछ विपक्षी कहते है कि वे एक बेवकूफ है और उनकी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया करने की कोई जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया जैसे-फेसबुक, टि्वटर, ऑर्कुट और अन्य पर भाजपा द्वारा समर्थित एवं वित्तापोषित संगठित समूह द्वारा उन पर गंदी भाषा के साथ हमला किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह लड़ाई दिग्विजय सिंह और तथाकथित सामाजिक संगठन ''राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'' सहित दक्षिणपंथी विपक्ष के बीच हो रही है।

                यहाँ मैं भाजपा के दिग्विजय विरोधी अभियान के वर्तमान परिदृश्य में कुछ सवाल उठाना चाहता हूॅ। क्या भाजपा के लिये इस वर्ष नवंबर में 4 राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में और 2014 के मध्य में होने वाले आम चुनाव में अकेले दिग्विजय सिंह ही एक कठिन चुनौती है? क्या भाजपा अब गुजरात मे फर्जी मुठभेड़ में मारी गई इशरत जहाँ के भूत से डरी हुई है जो दिग्विजयसिंह के तिलिस्म के कारण नरेंद्र मोदी के समक्ष प्रकट होने जा रहा है? क्या भाजपा के नेता यह सोचने लगे है कि दिग्विजय सिंह को कमजोर किये बगैर कांग्रेस को उखाड़कर नही फेंका जा सकता?

               भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के पास इन प्रश्नों का जवाब एकस्वर में ''हॉ'' में होगा। भाजपा के नेता यह जानते है कि दिग्विजय सिंह ही ऐसे व्यक्ति है जो अवसर उपलब्ध होने पर भी स्वेच्छापूर्वक सत्ता से दूरी बनाये रख सकते है। उन्हे सत्ता का कोई लालच नहीं है और सक्रिय राजनीति में उनकी यही एक खासियत है जो उन्हे अधिक शक्तिशाली बनाती है। दिग्विजय सिंह भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नकली राष्ट्रवाद को लंबे समय से उजागर करते रहे। उनसे यहाँ तक कि धर्मनिरपेक्षता का झंडा लिये मुलायम सिंह यादव जैसे लोग भी  सहमे हुये है। वे ही एक ऐसे व्यक्ति है जिन्होने भारत में आतंकवाद के एक दूसरे पहलू को ईमानदारी के साथ जनता के सामने लाने की कोशिश की जिसे उठाने से मीडिया हमेशा बचता रहा था। यदि वे साहस नही दिखाते और आतंक के दक्षिणपंथी आयाम को धयान मे नही लाते तो मालेगांव बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस विस्फोटों, मक्का मस्जिद विस्फोटों और अन्य आतंकी घटनाओं के अपराधियों की पहचान कभी नहीं हो सकती थी। दिग्विजय सिंह ने 2003 में मध्य प्रदेश में सत्ता चले जाने के बाद 10 साल तक चुनाव नही लड़ने व शासन में कोई पद धारण नही करने के संकल्प के बाद इन रहस्यों को प्रकट किया। यह उनकी नैतिक शक्ति थी जिसने उन्हे यह आरएसएस के बम से अधिक शक्तिशाली बना दिया। वे उन दुर्लभ व्यक्तियों में से एक जो भाजपा और आर.एस.की. कार्यप्रणाली को अच्छे से समझते है तथा 2013के आगामी विधानसभा चुनावों और 2014के आम चुनावों में वे विपक्ष को दृढ़ विश्वास के साथ व्यापक रूप से बेनकाब कर सकते है। भाजपा के दिग्विजय विरोधी अभियान का यह एक प्रमुख कारण है।

                 दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता है बल्कि वे एक धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी भी है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि वे हिन्दूधर्म का पालन करते है और सनातन धर्म में बताये गये नियमों के अनुसार धार्मिक आचरण करते है। विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके ताजा ब्लॉग ''क्या मैं हिंदू विरोधी हूँ?'' में उन्होने भाजपा और उसके साथियों द्वारा उनके विरूध्द फैलाये जा रहे भ्रम को स्पष्ट किया था। इस ब्लॉग ने पूरे देश का धयान उनकी ओर आकर्षित किया था। उन्हे यह ब्लॉग इसलिये लिखना पड़ा कि भाजपा और उसके साथी उनके विरूध्द दुष्प्रचार में इतने अधिक गिर गये थे कि उन्होने उनके धर्म पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिये। राघौगढ़ में उनके घर के भीतर 9 मंदिर है जहाँ नियमित रूप से पूजा और प्रार्थना होती है। राघौगढ़ में 10 से अधिक मंदिर ऐसे है जहाँ वे समय समय पर दर्शन करने के लिये जाते है। उनके घर में गैर हिंदुओं को भी उनके आराधय राघवजी (भगवान राम के लिए प्रयोग किया जाने वाला नाम) के दर्शन से नही रोका जाता। हिंदू धर्म कट्टरता नही सिखाता और नाम, क्षेत्र, जाति, भाषा या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नही करता। हिन्दू धर्म केदारनाथ की त्रासदी के दौरान मोदी की तरह सिर्फ गुजरातियों को ही नही बचाता बल्कि सबको गले लगाता है।  दिग्विजय सिंह के हिंदू धर्म की यही तो महानता है।

               इस देश में कई फर्जी मुठभेडें हुई है। इनमें अनेक लोगों को भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिये बगैर बेरहमी से कत्ल कर दिया गया है। भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, देश में 2002-2007 के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों के 440 मामलों सामने आये थे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 2008 से जून 2011 के बीच कथित फर्जी मुठभेड़ों के 369 मामले दर्ज किए गए। यदि इन तथ्यों के मद्देनजर दिग्विजय सिंह बाटला हाउस मुठभेड़ या गुजरात मुठभेड़ों में  न्यायिक जांच की मांग करते है तो इसमें गलत क्या है? क्या भाजपा हमारे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ जाकर फर्जी मुठभेड़ों का समर्थन करती है? यदि नहीं, तो क्यां उसके नेता ऐसी मुठभेड़ों में न्यायिक जांच की मांग करने पर दिग्विजय सिंह पर हमला करते हैं?  भारतीय न्यायपालिका में अपील का प्रावधान भी इसीलिये किया गया है कि किसी के साथ अन्याय न हो और सभी को उचित न्याय मिल सके।

                दिग्विजय सिंह एक जननेता है और वे अनेक बार लोकसभा और विधानसभा में जनता का प्रतिनिधित्व कर चुके है। उन्होने एक मुख्यमंत्री के रूप में 10 वर्षों तक मध्यप्रदेश पर शासन किया है और उनके 10 वर्ष लंबे शासनकाल में राज्य में सांप्रदायिक दंगे की एक भी घटना घटित नही हुई। वे यह अच्छी तरह जानते है कि समाज में सांप्रदायिक सद्भाव को कैसे बनाये रखा जाता है तथा किस प्रकार एक सरकार दंगों तथा उनमे की जाने वाली निर्मम हत्याओं को रोक सकती है जैसा कि 2002 में मोदी द्वारा गुजरात में नहीं किया गया। भाजपा को अपने विरूध्द दिग्विजय सिंह के संभावित नैतिक हमले से डर लग रहा है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता उनके खिलाफ प्रचार कर रहे हैं और उनके चमचे उन्हे डॉगविजय सिंह और पिगविजय सिंह का नाम दे रहे है। क्या भाजपा का यह अभियान सफल होगा? मुझे इसमे संदेह है।

               भाजपा के नेता सोचते है कि यदि उन्हे कांग्रेस को उखाड़ फेंकना है तो पहले उन्हे दिग्विजय सिंह को कमजोर करना चाहिये जो उसके लिये निरंतर असहज सवाल पैदा करते रहते है। यह एक सच है कि जब राष्ट्र अन्ना आंदोलन के दौरान उद्वेलित हो रहा था, और देश को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के शब्दों की जरूरत थी, ऐसे समय में उन्होने लोकपाल बिल पर और लोगों की भावनाओं पर जनता से सीधा संवाद स्थापित नही किया।  यद्यपि राहुल के पास भारतीय युवाओं के भविष्य और देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए महत्वाकांक्षी सोच है। उन्होंने देश भर में कई दूरदराज के क्षेत्रों का दौरा किया है और लोगों की समस्याओं को गहराई से महसूस किया गया है।  उन्होंने वे उस महान नेहरू के उत्तराधिकारी है जिन्होने इस समृध्द देश की नीव रखी है। किन्तु राहुल के समक्ष एक समस्या यह है कि वे लोगों के समक्ष अपनी बात को कुशलतापूर्वक नही कह पाते। यद्यपि उनकी इस कमी को दिग्विजय सिंह ने अवश्य पूरा किया है।

               भाजपा दिग्विजय सिंह को बोलने को विवश करके ऐन-केन-प्रकारेण उन्हे फॅंसाना चाहती है। भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा भोपाल के पुलिस थानों में उनके विरूध्द ''बच्चा-बच्चा राम का'' ट्वीट को लेकर तथा मंदसौर की सांसद मीनाक्षी नटराजन की प्रशंसा में कहे गये शब्दों को लेकर जो शिकायतें की है वह भाजपा की हताशा को दर्शाता है।

                भाजपा दिग्विजय सिंह नामक व्यक्ति से डरी हुई नही है बल्कि उनके ऊॅंचे चरित्र और नैतिक मूल्यों से डर रही है। उनके पास उनके असहज सवालों का कोई जवाब नही है और यही कारण है कि भाजपा ने सोशल मीडिया पर उन्हे गंदी गालियाँ देने और बदनाम करने के लिये अपने गुर्गों को छोड़ दिया है। भाजपा के पास न तो उनके सवालों का कोई जवाब है और न ही उसके पास उनके जैसा ऊॅंचा चरित्र है। इसलिये वह केवल एक ही काम कर सकती है। दिग्विजय को बदनाम करे और आगे बढ़ो। 

? दिव्या शर्मा

(लेखिका एक स्वतंत्र चिन्तक और लेखक है। )