संस्करण: 12 अगस्त-2013

15 अगस्त : स्वाधीनता दिवस पर विशेष

'स्वाधीनता' और हम : सरसठवें बरस में...

? डॉ. गीता गुप्त

           स्वाधीनता दिवस की 67वीं वर्षगांठ पर विचार करते समय कई प्रश्न मन में उपजते हैं। 15 अगस्त 1947 को पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने प्रथम भाषण में बड़ी महत्वपूर्ण बात कही थी- ''आज हम एक आज़ाद लोग हैं, आजाद मुल्क हैं। एक आज़ाद हैसियत से हमें आगे बढ़ना है और अपने बड़े-बड़े सवालों को हल करना है। सवाल हमारी सारी जनता का उध्दार करने के हैं,हमें गरीबी को दूर करना है,बीमारी और अशिक्षा को दूर करना है,कई मुसीबतें हैं जिनको हमें दूर करना है। आज़ादी महज एक सियासी चीज़ नहीं है।...मैं आपको इस शुभ दिन की मुबारकबाद देता हूं। लेकिन उसी के साथ याद दिलाता हूं कि हमारी जिम्मेदारियां जो हैं इसके मायने हैं कि हमें आइन्दा आराम नहीं करना बल्कि मेहनत करनी है,एक दूसरे के सहयोग के साथ काम करना है। तभी हम अपने बड़े सवालों को हल कर सकेंगे।... सारे हमारे देश में अमन हो, शान्ति हो, आपस के लड़ाई-झगड़े बिल्कुल बन्द हों क्योंकि जब तक लड़ाई-झगड़े होते हैं,उस वक्त तक कोई काम माकूल तरीके से नहीं हो सकता। प्रजातन्त्रवाद में, जो सवाल हैं-हमें आपस में सलाह-मशविरा करके, एक-दूसरे का ख्याल रखके हल करने हैं और अपने फैसले पर अमल करना है। हमेशा जनता को मालूम होना चाहिए कि क्या हम करते हैं, क्या हम सोचते हैं और वह उसको पसन्द होना चाहिए। उसी की सलाह से सब काम होना चाहिए।''

                 यदि 66 वर्षों के बाद भी सारे सवाल उसी जगह खड़े हैं, जहां से स्वतंत्रता की यात्रा आरंभ हुई थी, तो 'मेरा भारत महान है' कहकर गौरवान्वित होने का सौभाग्य अभी हमें अप्राप्त है। आखिर किस बात पर गर्व करें-हम अपने अतीत पर या त्रासद वर्तमान पर ? नेहरू, गांधी, पटेल, आजाद सहित तमाम स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत अब तक आकार नहीं ले पाया, क्या यह सच नहीं ? इन वर्षों में राजनीतिक दलों ने अपनी विश्वसनीयता निरन्तर खोयी है। जोड़-तोड़ की राजनीति द्वारा सत्तासीन होने की प्रवृत्ति इतनी बलवती हो चुकी है कि विगत कुछ दशकों में राजनीतिक दलों में सिध्दांतों की जगह व्यक्तिगत स्वार्थों ने ले ली है और स्वार्थ पूर्ति हेतु नियम-कानून अब तक तोड़े-मरोड़े जा रहे हैं। राजनीति का अपराधीकरण अपने चरम पर हैं। 4807 सांसद/विधायकों में से 1460 के विरुध्द आपराधिक मामले दर्ज हैं। राज्य सभा के 232 में से 40 सदस्यों, लोकसभा के 543 में से 162 सांसदों पर आपराधिक मामले और 76 सांसदों पर गंभीर मामले दर्ज हैं। 4032 में से 1258 विधायकों पर केस दर्ज हैं। हर राज्य में दागी नेताओं के आंकड़े चिन्ताजनक हैं। इसे जनता का दुर्भाग्य कहें या देश का ? सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जुलाई 2013 को निर्णय दिया कि दो साल से अधिक सजा होते ही विधायक/सांसद स्वत: अयोग्य हो जाएंगे, तो सारे राजनेता एकजुट हो राजनीति में शुचिता के विरुध्द अपनी ताकत दिखाते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधान की मांग सरकार से कर बैठै। यदि नेताओं के लाभ के लिए उक्त कानून ही खत्म कर दिया जाए तो जनता के साथ कितना बड़ा छलावा होगा ?

               प्रति वर्ष 15 अगस्त को लाल किले पर ध्वजारोहण कर हमारे प्रधानमंत्री देश की महिमा का बखान करते हैं, राज्यवार समृध्दि की झांकियां प्रदर्शित की जाती हैं, विदेशी अतिथियों के सामने जश्न मनाया जाता है। पर देश की हकीकत क्या है किसी से छिपी हैं ? अब जाकर सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा विधेयक लाकर 67 प्रतिशत आबादी को खाद्य सुरक्षा सुलभ कराने का मतलब क्या है ? स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं के सपनों का भारत ऐसा था, जिसमें सबको अन्न-जल मिले, सबको राजनीतिक सामाजिक-आर्थिक बराबरी का दर्जा मिले। पर मिला क्या ? सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिली। अंग्रेजों की नीति, उनकी भाषा, उनकी संस्कृति, उनकी शिक्षा पध्दति, उनकी न्याय प्रणाली, उनकी पुलिस व्यवस्था, उनके कानून और उनके विचारों की गुलामी से हम अब तक मुक्त नहीं हो पाये। यह कैसी 'स्वाधीनता' है ? ऐसी व्यवस्था जिसमें देशीपन, आजादी और भारतीयता की सुगंधा रची बसी हो, जो हमारी धारती हमारे देशवासियों के अनुकूल हो-हमारे नेताओं को स्वीकार नहीं। स्वतंत्र भारत की यह कैसी विडम्बना है!

              नि:संदेह, देश ने विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की है जबकि श्रेष्ठ प्रतिभाओं का विदेशों में पलायन जारी है। उपग्रह-प्रक्षेपण, प्रक्षेपास्त्र, सुपर कम्प्यूटर आदि के निर्माण की दिशा में भारत की प्रगति गौरवान्वित करने वाली है। लेकिन यह भी सत्य है कि वैज्ञानिक प्रगति ने आज मनुष्य, समाज और संसार को ज्वालामुखी के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। यह कैसी प्रगति है, जिसने एक समृध्द सांस्कृतिक देश में जीवन-मूल्यों, संस्कारों, आस्थाओं और संवेदनाओं को नष्ट कर दिया है। जहां महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद जैसे कई मनीषी, चिन्तक, योगी, सन्त, कवि, लेखक, समाज सुधारक आदि हुए, जहां स्वतंत्रता के यज्ञ में प्राणों की आहुतियां देने वाले अगणित नि:स्वार्थ बलिदानी हुए, जहां 'भारत माता की जय' और वंदे मातरम का घोष सबकी नसों में राष्ट्रीयता का संचार कर देता था, वहां आज भी अशिक्षा, अन्याय, भेदभाव और निर्धानता का अंधाकार व्याप्त है। स्वतंत्रता आंदोलन का सर्वोपरि लक्ष्य था-अन्याय, असमानता और शोषणविहीन समाज की स्थापना। इस लक्ष्य तक हम कहां पहुंच पाये ? सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक-सभी स्तरों पर जो हालात हैं, वे न होते यदि आजादी मिलने के बाद ईमानदारीपूर्वक राष्ट्र के नवनिर्माण हेतु प्रयास किये गये होते। भ्रष्टाचारमुक्त राजनीतिक नेतृत्व देश को आर्थिक उन्नति के शिखर पर पहुंचा सकता था मगर वह लक्ष्यभ्रष्ट हो सत्ता सुख तक सिमटकर रह गया कहें, तो गलत न होगा।

              वर्तमान भारत में संविधान में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। राजनीति में भी सुधार की दरकार है। राजनीति अब मुनाफे का व्यवसाय हो गई है। राष्ट्रहित और जन सेवा से उसका कोई सीधा सरोकार नहीं दिखता। राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु देश को खण्ड-खण्ड किया जा रहो है। छोटे-छोटे पृथक राज्यों की मांग के पीछे की मंशा कौन नहीं जानता ? समाज में लिंग-भेद, दहेज-प्रथा, अन्धविश्वास, भ्रष्टाचार, आरक्षण का रोग, अशिक्षा का अंधकार, कुपोषण, गरीबी, न्याय में अनावश्यक विलम्ब, महिला-हिंसा, छुआछूत, जातीय भेदभाव जैसी अनेक समस्याएं देश के समग्र विकास में अब तक बाधक बनी हुई है। यह सब बहुत दु:खद है। लेकिन इन सबका निदान हमें करना होगा।

              आज देश में चरित्र का संकट है, जो अन्य सभी संकटों का मूल है। इसे हमें स्वीकारना होगा। हम 'स्वतंत्र' तो हो गए लेकिन अब तक 'स्वाधीन' नहीं हो पाये है। स्वाधीनता के मर्म को समझना और उस पर गर्व करना, अभी हमें सीखना बाकी है। 'स्वतंत्रता' का सही अर्थ ही समझ पाये होते तो आज हम सचमुच 'स्वाभिमानी' और 'स्वाधीन' होते और अपनी भाषा-भूषा,संस्कृति,कलाओं, परम्पराओं एवं ज्ञान के भण्डार के बल पर देश का पुनरुत्थान कर गौरवान्व्ति हो रहे होते। परन्तु कितने दु:ख की बात है कि विकास के नाम पर हम 'भारत माता' की अस्मिता को छल रहे हैं। निरंकुशता और उच्छृंखलता को 'स्वतंत्रता' का पर्याय मान बैठै हैं। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति के गीत तो वातावरण में गूंजते हैं, घर-घर तिरंगे भी लहराते दिखाई देते हैं मगर महान शहीदों के बलिदान को कौन याद करता है, उनके संकल्पों से कौन प्रेरणा लेता है ? उनके सपनों के भारत की कल्पना को साकार करने की चिन्ता कितनों के हृदय को तड़पाती है ?

              यह विचारणीय है कि हमारी सांस्कृतिक सोच क्यों विकृत होती जा रही है ? पहले की तरह आन्दोलित और ऊर्जास्वित कर देने वाली देशभक्ति की भावना अब क्यों नहीं रही ? हमारी राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना पर शिथिलता का कुहासा क्यों छाता जा रहा है ?जबकि हम पर शहीदों का ऋण है,उनके सपनों का भारत बनाने-संवारने की जिम्मेदारी हम सब पर है। 'स्वाधीनता' की स्वर्ण जयंती तक तो हम नहीं चेते, क्या हीरक जयंती तक अपने देश का परिदृश्य बदलने का बीड़ा उठाने की नैतिकता हममे हैं ?     

                
? डॉ. गीता गुप्त