संस्करण: 12 अगस्त-2013

20 अगस्त : राजीव गांधी जन्मदिन पर विशेष

राजीव...एक स्वप्नदृष्टा

? शोऐब अहमद खान

        काल की गति, घड़ी की सुइयों की मोहताज नहीं है।सेकेंड, मिनट में और मिनट घंटों में तब्दील होते हैं।ये घंटे दिन, महीनों और सालों का निर्माण करते हैं।इन सबसे बेखबर समय अपनी रफ्तार से भाग रहा है।बिना इस बात की परवाह किए,कि कौन उसके साथ जुड़ रहा है और कौन उसे छोड़ गया। आधुनिक भारत के उस स्वप्नदृष्टा को हमसे जुदा हुए बाइस साल बीत चुके हैं।आज कृतघ्न राष्ट्र उनकी उनहत्तारवीं जयंती मना रहा है।राजीव गांधी की पहचान देश का प्रधानमंत्री होने भर से नहीं थी।एक मुकम्मल शख्सियत का नाम था राजीव।वो शख्स जिसका दिल उम्मीद के तराने गाता था।जो देश की सूरत बदलने का जज्बा रखता था।जिसने बुलंदी की हसरत को पाला जरूर, लेकिन वो जमीनी हकीकत से कतई बेखबर नहीं रहा।और यही वजह है,कि सख्त से सख्त विरोधी भी उनके किए गए कामों को झुठला नहीं सके।

              बीस अगस्त उन्नीस सौ चौवालीस को मुम्बई में राजीव गांधी का जन्म हुआ।कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी और लंदन के इम्पीरियल कॉलेज से पढ़ा वो शख्स राजनीति के मैदान से कोसों दूर रहना चाहता था।लेकिन हाथ की लकीरों को खुद से रचना किसी इंसान के बस की बात नहीं है।साल उन्नीस सौ अस्सी में एक हवाई जहाज दुर्घटना में छोटे भाई संजय गांधी की मौत के बाद राजीव के राजनीति में प्रवेश की बुनियाद पड़ी।संजय के गुजरने के दो साल बाद उन्नीस सौ बयासी में मां, इंदिरा गांधी को सहयोग देने के इरादे से वह सियासत के समर में उतर गए।देश और राजनीति के लिहाज से साल उन्नीस सौ चौरासी बेहद अहम था।इसी साल इकत्तीस अक्टूबर के दिन इंदिरा की हत्या से देश सन्न रह गया था।

               हालात बेहद मुश्किल थे, लेकिन चुनौतियों के सामने चकनाचूर होकर बिखर जाना राजीव गांधी की फितरत नहीं थी।जो शख्स मां के हाथों को मजबूत करने के इरादे से सियासत में उतरा था।अब उसके सामने पार्टी और देश दोनों को चलाने की जिम्मेदारी थी।राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा।उन्नीस सौ चौरासी के इन चुनावों में पार्टी को ऐतिहासिक जनसमर्थन हासिल हुआ।इसे बड़ी आसानी के साथ सहानुभूति की लहर माना जा सकता है, लेकिन भूलना नहीं चाहिए, कि चुनाव प्रचार में जिस तरह राजीव ने जान झोंकी थी, उसने उन्हें जन-मानस के दिल में बसा दिया था।बिना थके राजीव देश भर में घूमते हुए रैलियों पर रैलियां करते रहे।वह बोलते गए।और लोग उनकी करिश्माई छवि में डूबते-उतराते चले गए।आखिरकार जनता ने अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री का इस्तकबाल किया।सनद रहे, कि महज चालीस साल की उम्र में राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने।पीएम के तौर पर उन्होंने पांच साल के कार्यकाल को पूरा किया।

               राजीव गांधी का एक वक्तव्य था।एक बड़ी समाचार एजेंसी ने उनसे पूछा, कि आप किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे, तो उनका उत्तार था- 'एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जो अपने देश को इक्कीसवीं शताब्दी में लेकर गया।उस बेचौन आत्मा की नजर इक्कीसवीं सदी के भारत को देखती थीं।तकनीक के तिलिस्म से वो बखूबी वाकिफ थे।राजीव दूरदर्शी थे,वो युवा-शक्ति के महत्व को भी समझते थे।देश की तरक्की के लिए उन्होंने युवाओं को आगे बढ़ाया और उन्हें विज्ञान की ताकत और अहमियत समझाई। भारत में सूचना क्रांति के इस जनक ने गांव-गांव में टेलीफोन पहुंचाने की बुनियाद रखी और विपक्ष के पुरजोर विरोध के बावजूद कम्प्यूटर शिक्षा और उसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया।रक्षा क्षेत्र की जरूरतों से भी वो बेखबर नहीं थे। मजबूत भारत के निर्माण के लिए उन्होंने मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया।इन सबके अलावा राजीव जानते थे,कि गांवों का अंधेरा छटे बिना तरक्की के मायने बेमानी हैं। तिहत्तारवें संविधान संशोधन के जरिए उनकी सरकार ने पंचायती राज्य व्यवस्था लागू की।महिलाओं को आगे लाने के लिए इसमें उनकी एक तिहाई हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की।

              राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में पंजाब सुलग रहा था।उन्होंने वहां आतंकी समस्या को हल करने की कोशिश की।इसमें काफी हद तक वो कामयाब भी रहे।लेकिन साल उन्नीस सौ सत्तासी में श्रीलंका में शांति सेना भेजने का उनका दांव नाकाम साबित हुआ।और यही फैसला उनकी मौत की वजह भी बना।तमिल विद्रोही गुटों से लड़ते हुए बारह सौ भारतीय जवान शहीद हो गए, लेकिन श्रीलंका ने कभी भी भारत का अहसान नहीं माना।इन सबके बीच लिट्टे और उसका सरगना प्रभाकरन राजीव गांधी के खून के प्यासे हो गए।साल उन्नीस सौ इक्यानवे के चुनावों में राजीव, कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए जबरदस्त प्रचार में जुटे थे।इस बात से पूरी तरह अंजान कि मौत साया बन उनका पीछा कर रही है।इक्कीस मई का दिन वो मनहूस खबर लेकर आया था।तमिलनाडु के श्रीपेरम्बदूर में चुनावी सभा को सम्बोधित करने पहुंचे राजीव गांधी, लिट्टे के आत्मघाती हमले का शिकार हो गए।अस्पताल ले जाने की भी नौबत नहीं आई, मौके पर ही वो शहीद हो गए।

               परिवार बिलख पड़ा।देश भी रो रहा था।खूबसूरत ख्वाबों को आसमां से जमीन पर उतारने वाला बाजीगर चला गया था।देश और खासकर युवाओं को नई दिशा दिखाने वाला वो शख्स अंतिम यात्रा पर निकल पड़ा था।राजीव के बिना पिछले बाइस सालों में भारत ने काफी तरक्की की है।गौर से देखने पर इस चमक-दमक और विकास के साए में उनका अक्स जरूर नजर आएगा।और यही 'राजीव गांधी' होने के मायने हैं।

? शोऐब अहमद खान