संस्करण: 12 अगस्त-2013

मध्यप्रदेश में भी महिला की शक्ति को मुक्ति का इंतजार

? अमिताभ पाण्डेय

         त्ता की मनमानियों में कानून कायदे किस तरह दरकिनार किये जाते हैं? बहुमत के दम पर तानाशाही का गुरूर किस तरह अपमान,उपेक्षा और उपहास करता है?प्रशासन की इच्छाशक्ति पर नेताओं की हठधर्मी कैसे सरेआम अन्याय करती है? इसका उदाहरण भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के रूप में सबके सामने हैं। समाजवाद का नारा बुलन्द करके सत्ता को लपकने वाली समाजवादी पार्टी ने नियम कानून का पालन करने,करवाने पर अडी दुर्गाशक्ति नागपाल के साथ जो अपमानजनक व्यवहार किया,वह उत्तरप्रदेश ही नहीं पूरे देश के लिए दुखद है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा महिला अधिकारी के विरूधद की कई कार्यवाही से साफ जाहिर है कि कानून व्यवस्था के प्रति,महिलाओं के प्रति उनके मन में सम्मान की भावना नहीं है। समाजवादी पार्टी की स्थापना भले ही समतामूलक समाज का निर्माण करने के आधार पर हुई हो,लेकिन अब जो समाजवाद के नाम का तमगा लगाये सत्ता पर बैठे हैं उनकी सामाजिक न्याय के प्रति कोई रूचि नहीं है। हमें मानना होगा कि  समाजवादी पार्टी के सत्ताधारी नेता धर्म,जाति,लैगिंक भेदभाव करके सामाजिक व्यवस्था के साथ ही शासन प्रशासन की व्यवस्थाओं को भी नुकसान पहॅुचा रहे हैं। राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति में आडें आ रही महिला अफसरों को धमकाया,निलम्बित किया जा रहा है। इससे केवल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही नहीं बल्कि पूरी समाजवादी पार्टी की महिला विरोधी मानसिकता उजागर हो गई है।

                 प्रसंगवश यह उल्लेख करना जरूरी हागा कि सत्ता के बल पर महिलाओं के साथ भेदभाव,अन्याय कोई नई बात नहीं है। अशिक्षित,दलित,पिछडी और आर्थिक दृष्टि सेस कमजोर मानी जाने वाली महिलाओं को ही इसका शिकार होना पडता हो,ऐसा नहीं है। सम्पन्न,समृधद परिवारों की उच्च शिक्षित महिलाएं भी श्शारीरिक,मानसिक प्रताडना का शिकार होती है। घर के चौके-चूल्हे,आंगन-गलियारे से लेकर सरकारी कार्यालयों,निजी कम्पनियों,खेत खलिहान और अन्य कार्यस्थलों पर महिलाओं को शोषण उत्पीडन का शिकार होना पडता है। शोषण-उत्पीडन-अन्याय के प्रकार अथवा तरीके भिन्न-भिन्न हो सकते हैं लेकिन घरों में झाडू,पौछा,बर्तन धाोने से लेकर सरकारी कार्यालयों,निजी कम्पनियों में उच्च पद पर बैठी महिलाओं तक सभी ने कामकाज करते हुए तनाव,दबाव,अपमान को अवश्य ही महसूस किया है। महिला अत्याचार-अन्याय-शोषण की जितनी घटनाएं सामने आती हैं उससे ज्यादा तो दबकर रह जाती हैं । अन्याय की शिकार अनेक महिलाएं अपमान,उपेक्षा,शोषण ,उत्पीडन का शिकार होने के बाद खून का घूंट पीकर खामोशी से जिदंगी जीती देखी गई। यह खामोशी उनके तनाव को कई बाद इतना बढा देती है कि उसका परिणाम आत्मदाह या आत्महत्या के रूप में सामने आता है। अफसोस इस बात का है कि भारतीय संविधान में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव,अन्याय,उत्पीडन को रोकने के लिए अनेक कानून बनाये गयें। इन कानूनों का पालन करने,करवाने की जिम्मेदारी जिनको दी गई है , वे भी कई बार अन्याय करनेवालों में शामिल हो जाते हैं। शायद यही कारण है कि उच्च पदों पर पदस्थ वरिष्ठ महिला अधिकारी भी अन्याय,अपमान का शिकार हो जाती है। जिन महिला अधिकारियों को निर्भीक-निष्पक्ष-निर्णायक कार्यशैली के लिए पुरूस्कार दिया जाना चाहिये उनको शानदार काम करने के बदले तबादले,निलम्बन,अपमानजनक व्यवहार की सजा दी जाती है।

                ऐसे कुछ उदाहरण मधयप्रदेश में भी देखे जा सकते हैं जहॉ बेहतर काम करनेवाली महिलाओं को अपमानित किया गया। पिछले आम चुनाव का ही जिक्र करें तो याद आता है कि देवास जिला मुख्यालय पर पदस्थ महिला निर्वाचन अधिकारी के कर्तव्य पालन के दौरान एक मंत्री और उनके समर्थकों ने अपमानजनक व्यवहार किया था। महिला अधिकारी के साथ मंत्री और उनके समर्थकों की बदतमीजी कई दिनों तक अखबारों की सुर्खियॉ बनी। इस विवाद में अपमानित होने के बाद भी महिला अधिकारी को ही सत्ताधारी नेताओं ने गलत माना और उनका तबादला कर दिया । ग्वालियर जिला मुख्यालय पर तैनात एक महिला अधिकारी ने शासकीय आयोजन के प्रेषित किये जाने वाले आमत्रंण्ा पत्र में क्षैत्रीय महिला सांसद के आगे श्रीमंत शब्द नहीं लगाया तो उनको फटकार सुनना पडी और तुरन्त तबादला भी कर दिया गया। धार जिले में दो समुदायों के बीच एक धर्मस्थल पर जाने के लिए हो रहे विवाद में इन्दोर की तत्कालीन पुलिस महानीरीक्षक ने जिस दबंगता और तत्परता का परिचय दिया उसी तारीफ आज भी प्रशासनिक हल्कों में की जाती है। इस महिला अधिकारी ने निष्पक्षतापूर्वक कारवाई करते हुए उन्मादी तत्वों पर जो सख्त कार्यवाही की वह आम जनता को तो मन भा गई लेकिन नेता नाराज हो गये । परिणाम यह रहा कि राजनीतिक दबाव में तबादले की सजा भोग रही यह महिला अधिकारी अब पुलिस मुख्यालय में पदस्थ कर दी गई हैं। उधर राज्य मंत्रालय वल्लभ भवन में दलित वर्ग से जुडी एक महिला आई ए एस अधिकारी पदोन्नति के लिए बार बार वरिष्ठ अफसरों को पत्र लिख चुकीं, अन्याय के विरूधद सडक पर उतर आई ,इसके बावजूद उनको पूरी तरह न्याय नहीं मिल सका है। मधयप्रदेश में आदिवासी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्यमंत्री बनते बनते रह गये एक स्वर्गीय उपमुख्यमंत्री की बेटी भी भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी होते हुए लम्बे समय से अन्याय की शिकार हैं। वे अपने पूरे सेवाकाल के दौरान किसी भी जिले में कलेक्टरी के काबिल नहीं मानी गई जबकि उनके जूनियर कलेक्टरी से शुरू होकर सचिव के पद तक जा पहॅुचे। यह इन्दौर में पदस्थ यह महिला अधिकारी अन्याय को सहते सहते अब सेवानिवृति के मुकाम तक पहॅुच गई है।

               राजनीतिक दबाब में बेहतर महिला अधिकारियों के साथ हो रहे अन्याय के ऐसे अनेक उदाहरण मधयप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में देखे जा सकते हैं। महिला श्शक्ति को अपमानित करने वाले ये उदाहरण बताते हैं सत्ता से जुडे नेता अपने स्वार्थ की पूर्ति में आडे आ रही महिला अधिकारिेयों को अपमानित करने के लिए नियम कानूनों को भूल जाते हैं। ऐसे माहौल में तारीफ तो उन महिलाओं की है जो अपमान-अन्याय-उत्पीडन को सहकर भी निर्भीक-निष्पक्ष-निर्णायक तरीके से शासन प्रशासन का संचालन कर रही हैं। समाज की बेहतरी के लिए विपरीत परिस्थितियों में भी काम कर रही हैं। ऐसी महिलाओं ने अपने कार्य व्यवहार से साबित किया है कि राजनीतिक दबाव के आगे वे अपनी शक्ति को कमजोर नहीं होने देगीं। न दबेगी-न झुकेगी। नतीजा चाहे जो हो वे अपनी शक्ति की मुक्ति के लिए संघर्ष जारी रखेगीं। ऐसी महिलाओं के नाम,पद अलग अलग हो सकते हैं लेकिन सोच सबकी एक जैसी है - अन्याय से लडाई , सत्ता की शक्ति से मुक्ति , महिलाओं को मिले अधिकारों का बिना दबाव और प्रभाव में आये पूरा प्रयोग । आईये मिलकर विचार करें कि अन्याय सहकर शक्ति से मुक्ति के राजनीतिक,सामाजिक,प्रशासनिक गलियारों में संघर्ष करती इन महिलाओं के साहस को बढाने के लिए,इनका उत्साह वर्धान करने के लिए हम ओैर आप क्या कर सकते हैं ?

? अमिताभ पाण्डेय