संस्करण: 12 अगस्त-2013

लहलहा रहे राजनीति के खेत

सब काट रहे हैं अपनी-अपनी फसल

? राजेन्द्र जोशी

         राजनीति में सबके अपने-अपने खेत हैं। सभी के खेतों में फसलें लहलहाने लगी है। चुनाव का समय आने वाला है, यानि कि फसलों की कटाई का मौसम। खेतों में बोई गई अपनी अपनी फसलों की उत्पादकता पर लाभ-हानि की संभावनाओं के गुणा-भाग लगाये जा रहे हैं। जहां तक राजनीति की खेती का सवाल है इसका कोई एक भूमि स्वामी तो नहीं होता, यह तो एक ऐसी साझे की खेती होती है जिसकी खाताबही में साझेदारों के नाम दर्ज होते हैं। इसे इस तरह भी माना जा सकता है कि राजनीति एक तरह से सामूहिक खेती है। खेती को सामूहिक तौर से जोतने पर ही उसे बेहतर ढंग से उपजाऊ बनाया जा सकता है। किंतु विडम्बना है कि कतिपय खेतों की स्थिति ऐसी बन गई जिसपर उस समूह के अगुआई करने वाले ही जबरन मुखिया बन बैठे हैं। देखा जाय तो कोई भी समूह तभी ताकतवर और कामयाब होता है जब उसमें कोई न कोई एक ऐसा मुखिया हो जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो और जिसे प्रजातांत्रिक ढंग से अपने समूह के लोगों का सहयोग और समर्थन प्राप्त हो। वह समूह एक स्वर में बोले और अपने मुखिया के संकेतों और आदेशों के पालन के प्रति वफादार बना रहे।

                राजनीति के खेत कोई वैसे खेत तो हैं नहीं जिसको हल-बखर चलाकर बनाया जाय और उसमें किसी अनाज के बीज बो दिये जायं। ये तो वे खेत हैं जिसमें अपनी-अपनी पार्टियों की विचारधारा के बीज बिखेर दिए जाते हैं जिनमें घोषणाओं, आश्वासनों, वायदों और प्रलोभनों के खाद डालकर योजनाओं और कार्यक्रमों के जलसे सिंचाई कर दी जाती है। खेत की रखवाली का मामला भी इतना आसान नहीं होता जितना समझा जाता है। एक मुखिया हो तो वह अपनी व्यूह रचना से फसल की बुआई, कटाई और फिर उसकी मार्केटिंग का कार्य आसानी से कर सकता है, किंतु जहां अन्य साझेदार अपनी अपनी चलाते हो वहां की खेती गड़बड़ाने लग जाती है।

                राजनीति में साझेदारी की खेती के ऐसे ऐसे हश्र देखने को मिलते हैं कि एक ही खेत के खातेदारों द्वारा एक दूसरे की टांग खिंचाई के नजारें देखे जा रहे हैं। राजनीति के खेत के झगड़े शुरू हो जाते हैं खेतों की जुताई के वक्त से ही। फिर झगड़े होते हैं बीज बोने पर से। एक खेत के खातेदारों में जो झगड़े उभरकर आ रहे हैं वे भी बड़े अजीब किस्म के हैं। कुछ सदस्य अपने इस खेत में धर्म, जाति, क्षेत्र, वर्ग, भाषा के बीज लेकर खेत में उतर आये हैं, और साम्प्रदायिकता की खाद के पैकेट खोल रहे हैं तो इसी भूमि के कतिपय खातेदार अपने ही समूह के इन बीजों के बोने वालों को गुदगुदी कर रहे हैं। गुदगुदाहट एक ऐसी चीज है जिससे व्यक्ति फूला नहीं समाता है। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी उभरकर सामने आ जाते हैं जो न तो लेपनबाजी को पसंद करते हैं और न ही चापलूसी। अत: ऐसे लोग अपने तरकस से व्यंग्य-बाण निकाल-निकालकर कतिपय गर्राने वालों के सीने को भेद डालते हैं।

                इन सबके ऊपर कुछ ऐसे गुणवाले निडर और साहसी व्यक्ति भी होते हैं जो यह समझते हैं कि उनके समूह में ऐसी कौनसी शख्सियत है जिसमें नाटकीयता है, उसकी जमीनी हकीकत क्या है, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान कैसा है और उसके प्रति किस हद तक आम सहमति है। अपने ही दल के भीतर के लोगों के बारे में सही समझ रखना तथा ठकुरसुहाती और चाटुकारिता से दूर रहकर अपनी राय को निष्पक्षता के साथ रखने का साहस वही कर सकता है जिसके वस्त्र दागदार नहीं होते और जिसका अपना योगदान किसी विचारधारा के एक पोषक के रूप में होता है। इस तरह के व्यक्तियों पर जब नज़र दौड़ाई जाती है तो बड़ी मुश्किल से दो-चार ही मिलते हैं। साफ रहना दिलेरी से कहना, सोच-समझकर कहना और डंके की चोट पर कहना यह सभी के बश की बात नहीं है। वो भी ऐसे माहौल में जहां लोग परस्पर राजनीति में एक दूसरे की छेड़खानी कर रहे हैं। झूठी प्रशंसा कर कर के गुदगुदी पैदा कर रहे है, व्यंग्य-बाण छोड़ रहे हों, वहां सच को सच कहने का साहस करना सचमुच दिलेरी का काम है। यदि इस तरह साफगोई के मामले में दिलेरी दिखाने वालों की सूची तैयार की जाती है तो उसमें अभिनेता से नेता बने श्री शत्रुघ्न सिन्हा का नाम निश्चित रूप से ऊपर होगा। वैसे ये भी एक खेत के खातेदारों में शामिल हैं किंतु ये अपनी फसल अलग ही काटने का साहस दिखा रहे हैं।

? राजेन्द्र जोशी