संस्करण: 12 अगस्त-2013

आरएसएस : 88 साल की

असफल संस्था

? विवेकानंद

               राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस की स्थापना आजादी से पहले 1925में की गई। इसके बाद 1953में जनसंघ बना और इसके बाद इसी का नाम बदलकर 1980में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। इसी बीच महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे ने 1966में शिवेसना बनाई। शिवसेना की शुरूआती क्षेत्रवाद की राजनीति सर्वविदित है, लेकिन पहले संघ फिर जनसंघ और फिर भाजपा इनकी नींव हिंदुत्व पर रखी गई, जिसका उद्देश्य अखिलभारतीय स्तर पर हिंदुओं को एकजुट करना था। क्या कभी किसी ने विचार किया कि 88 साल से एक ही लकीर को पीटने के बावजूद संघ अपनी मुहिम में सफल क्यों नहीं हुआ? यहां तक कि राजनीतिक ताकत हाथ में आने के बाद भी उसकी मुहिम फेल क्यों हुई? 23 साल तक जनसंघ और अब 33 साल से भारतीय जनता पार्टी अपनी छाप पूरे देश पर क्यों नहीं छोड़ पाई? और शिवसेना देश तो दूर की बात पूरे महाराष्ट्र में ही अपनी पहुंच क्यों नहीं बना सकी? तो क्या हिंदुओं को एकजुट होना स्वीकार नहीं है, या फिर हिंदू कट्टरता की नफरत से दूर रहना चाहते हैं। संभवत: यही सत्य है कि हिंदू एक संस्कृति है जिसमें प्रेम है, उदारता है, संयम है, समर्पण है। कट्टरता और परस्पर नफतर का इस संस्कृति में कोई स्थान नहीं है।

              भाजपा भी हिंदुत्व को एक संस्कृति मानती है, लेकिन उसके गूढ़ तत्व को अस्वीकार करती है, इसलिए उसकी असफलता के द्वारा हमेशा खुले रहते हैं। हिंदुत्व संस्कृति प्रेम और उदारता का अथाह सागर है। जिसमें प्रकृति प्रदत्त सम्मोहन समाया हुआ है। यही कारण है कि सदियों से जितने भी आक्रांता इस देश में आए, एक अरसे बाद यहीं के होकर रह गए। दूसरी ओर कट्टरता है जो सदैव नफरत फैलाती है, इसमें विकर्षण है, इससे कोई नहीं जुड़ना चाहता। पाकिस्तान और अफगानिस्तान या अन्य वे देश जहां धार्मिक कट्टरता की प्रधानता है, वहां कोई नहीं रहना चाहता, उनसे कोई नहीं जुड़ना चाहता। नफरत के इस दलदल में केवल वे ही गोते लगा सकते हैं जिन पर या तो स्वार्थ हावी हो गया हो या फिर जिनके जीवन की शुरूआत ही इस दलदल में हुई हो। भाजपा भी धीरे-धीरे अपने इसी गुण के कारण सहयोगियों के लिए अछूत होती जा रही है। कभी दो दर्जन दलों का कुनबा एनडीए में आज केवल तीन दल बचे हैं, इसमें भाजपा भी शामिल है। इसके पीछे कारण है कट्टरता। भाजपा और संघ बातें तो उदारता की करते हैं, राष्ट्रवाद की करते हैं, लेकिन समुदाय विशेष के प्रति उनकीर् ईष्या किसी से छिपी नहीं है। यही कारण है कि आरएसएस और भाजपा इतने वर्षों बाद भी स्वयं को संपूर्ण देश में स्थापित नहीं कर पाए। संघ का विस्तार यद्यपि राष्ट्रव्यापी लगता है, लेकिन वह एक समाजसेवक संगठन के रूप में। संघ लोगों को इसी रूप में स्वीकार्य है। लेकिन जब बात सत्ता की आती है तो लोग भाजपा से परहेज करते हैं। इसलिए क्योंकि यदि ऐसे हाथों में ताकत आ गई तो उसका दुरुपयोग व्यक्तियों के प्रति नहीं बल्कि प्रेम और उदारता के उन दिव्य अनुभवों को नष्ट करने के लिए हो सकता, जो इंसान को इंसान होने का अहसास कराती हैं। इस डर को गुजरात दंगों के बाद और अधिक बल मिला। गुजरात को देश का शीर्ष राय कहकर भाजपा भले ही नरेंद्र मोदी का प्रचार करे, लेकिन वस्तुत: वह भी विकास के मामलों में देश के अन्य रायों जैसा ही है। हां वहां एक चीज जो सबसे अधिक व्याप्त है, वह है एक दूसरे का भय। पहले गोधरा में ट्रेन पर आतंक और फिर गुजरात में दंगों ने दोनों कौमों में एक दूसरे के प्रति संदेह और नफरत का ऐसा बीज बोया, जिसकी फसल नरेंद्र मोदी आज तक काट रहे हैं। यह उनकी लोकप्रियता नहीं है, उनके पक्ष में नफरत और भय का वह भूत वोट डालने के लिए आम आदमी को विवश करता है, जो मोदी वक्त-वक्त पर खड़ा करते रहते हैं। मोदी की इस विधा को अब आरएसएस और भाजपा गुजरात से निकालकर पूरे देश में आमजाना चाहते हैं और इसी लाइन पर चलकर आजमाना चाहते हैं। हालांकि भाजपा नेता कहते यही है कि वे विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे लेकिन धीरे-धीरे दिशा बदलकर संप्रदायिक होती जा रही है। मकसद यह है कि देश में 23 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के विरुध्द 75 फीसदी हिंदू और गैरमुस्लिम धर्मों को मानने वालों को एकजुट किया जाए जिनकी पूजा पध्दति और आस्थाएं हिंदुओं के समान हैं। यदि एक यह एकजुट हो गए तो फिर भाजपा को दिल्ली के तख्त पर बैठने से कोई नहीं रोक सकता। भाजपा की कोशिश बुरी नहीं है, राजनीति में वह सब जायज होता है जो आमतौर पर नाजायज भी हो सकता है। लेकिन मुश्किल यह है कि भाजपा, जिसे आज तक देश ने स्वीकार्य नहीं किया वह आज स्वीकार करेगा भी तो कैसे? गहराई से देखें तो वर्ष 1998 में भाजपा उत्कर्ष के चरम पर थी। पहली बार भाजपा को देश में कांग्रेस के मुकाबले बराबर वोट मिले थे। उसके बाद भाजपा फिर उतार पर आ गई और कांग्रेस ने अपना स्थान पा लिया। ऐसा नहीं है कि किसी पार्टी का पराभव पूरे देश में एक साथ हो जाए। फिर भी भाजपा बनवासी क्यों हो गई? इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारक है भाजपा का अखिल भारतीय स्तर की पार्टी न होना। इस वक्त देश में केवल कांग्रेस ही राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा कर सकती है। क्योंकि वह एक मात्र पार्टी है जिसका देशभर में प्रतिनिधित्व है। भाजपा के अचानक चरमोत्कर्ष पर पहुंचने और उसी गति से पराभव में भी यही कारक विद्यमान है। भाजपा का वोट एक सीमित क्षेत्र में है, जो राम के नाम पर आंदोलित हो उठा था और एक मुस्त भगवादल की गोद में आ गिरा था। तब भाजपा को लगा था कि उसने देश में अपना मुकाम बना लिया। लेकिन जब भाजपा ने सत्ता के लिए दो दर्जन बैसाखियों का सहारा लेकर राम को छोड़ दिया तो इस सीमित वोट का भी उससे मोहभंग हो गया और कांग्रेस उतने ही वोट पाकर फिर सत्ता में आगई जितने वोट पाने के बाद भी वह कभी सत्ता से बाहर हुई थी। कहने का तात्पर्य यह कि कांग्रेस का वोट पूरे देश में उपलब्ध है, मोदी यदि 1998 वाले चरमोत्कर्ष पर पहुंचे भी तो भी उससे अधिक सीटें नहीं ला सकते, जिनती आडवाणी जी पूरे देश को सुलगाकर ला सके थे। और रही बात राम मंदिर की तो अब तक सरयू से बहुत पानी बह चुका है। नौजवान पीढ़ी भाजपा के दांव पेंच समझ चुकी है, इसलिए यह तो संभव ही नहीं है कि मोदी आडवाणी वाली ऊंचाई छू सकें और हिंदू वोटों का धु्रवीकरण 1998 जितना हो सके। दूसरी बात आडवाणी जी ने जब राम मंदिर का मुद्दा उठाया था उससे पहले उन पर नफरत फैलाने और दंगे कराने जैसा संगीन आरोप भी नहीं था। आम आदमी के लिए उन पर भरोसा करना आसान था वनिस्वत आज के मोदी के। अब आरएसएस और भाजपा जितना इस लकीर को बढ़ाने की कोशिश करेगी उसकी राजनीतिक परिधि उतनी ही सिमटती चली जाएगी। क्याेंकि यह देश न तो पाकिस्तान होना पसंद करेगा और न ही नेपाल। पाकिस्तान मुस्लिम देश होकर और हिंदुओं को कुचलकर अपना भला नहीं कर सका और नेपाल हिंदू देश होकर भी तरक्की के मामले में फिसड्डी है। जबकि भारत 1947 से बहुत आगे निकल चुका है। यहां सभी धर्मों के लोग भी रहते हैं और विकास का पहिया भी सुचारू रूप से चल रहा है। तो यह बहुत साधारण सी बात है कि वह धार्मिक कट्टरता और संस्कृति किस काम की जो विकास के पहिए को अवरुध्द कर दे, एक दूसरे में भय पैदा कर दे। संघ और भाजपा अपनी हठ या कुंठित मानसिकता छोड़कर इस तथ्य को अपनाएंगे तभी देश में उनकी स्वीकारोक्ति हो सकेगी। अन्यथा इस मानसिकता के साथ न तो 88 साल में कुछ कर सके और न ही आगे 88 साल तक कुछ कर सकेंगे।

? विवेकानंद