संस्करण: 12अक्टूबर-2009

बदलते मौसम से बेहाल खेती

डॉ. सुनील शर्मा

स सत्र में हमारा सामना सदी के भीषण सूखे से हो रहा है,इस सत्र का सितम्बर माह पिछले सौ बर्ष का सर्वाधिक गर्म सितम्बर रहा है और इस अक्टूम्बर माह में देश के आंध्रप्रदेश, कर्नाटक ओर महाराष्ट्र राज्यों में सदी की भीषण बाढ़ का तांडव जारी है। इस तरह मात्र चार महीने का एक मानसूनी सत्र जिसमें हम मौसम की अंगडाई की क्रूर मार का सामना कर रहे हैं,और प्रकृति की इस मार के आगे व्यवस्था और व्यवस्थापक बेवश हैं।

प्रकृति की इस बेरूखी से जन धन की अपार हानि तो हुई है साथ ही हमारी अर्थव्यवस्था को तगड़ा नुकसान हो रहा है क्योंकि मौसम के इस प्रहार से देश की समृध्दि का आधार कृषि व्यवस्था को काफी नुकसान हुआ है। पहले तो अवर्षा ने बीजों को नष्ट कर दिया,अंकुरण सुखा दिया फिर सितम्बर की भीषण गर्मी ने फसलों को झुलसा दिया और अब देश के अनेक हिस्सों की फसलों को बाढ़ में डुबा दिया है,इस तरह प्रकृति की विनाशलीला जारी है और प्रकृति की के इस बदलते अंदाज का एक मात्र कारण है धरती का बढ़ता ताप। जिसने मौसम के चक्र को पूरा गड़बड़ा दिया है जिससे वर्षा की मात्रा और अवधि लगातार घट रही है,पानी गिरने की दर में भारी परिवर्तन है,चार माह की वर्षाकाल की अवधि कुछ दिनों तक सिमट कर रह गई है,अब कुछ घंटों में ही आसमान से भारी मात्रा में पानी बरस जाता है और शेष दिन सूखा रहता है।

जैसे की इस सत्र में पूरे वर्षाकाल दौरान लगभग दस दिन ही पानी गिरा है,बांकी 110 दिन सूखे ही बीते हैं, जहाँ बारिश के इन कुछ दिनों में हुई भारी बरसात ने फसलों को तबाह ही किया है वहीं आने वाले दिनों में वर्षा और ताप के बाद कोहरा और ठंड की अनियमितता भी फसलों को तबाह करेगी। म.प्र. के बैतूल जिले के कई हिस्सों में सितम्बर माह में हीं कोहरा पड़ा रहा है जिससे वहाँ के सब्जी उत्पादकों को भारी नुकसान की संभावना है। बदलती प्रकृति से किसानों के साथ साथ व्यवसायी भी हैरान है, पिछले दिनो मैं म.प्र. के बालाघाट में एक राइस मिल के ऑफिस मैं बैठा हुआ था,मिल के मालिक दीवार पर टंगे थर्मामीटर की रफ्तार से हैरान थे, उनका कहना था कि यह धान पकने का समय है और धान पकने के लिए बेहतर ताप 22-23 डिग्री सेल्सियस होता है जबकि इस समय दिन के ग्यारह बजे तापमान 36 डिग्री सेल्सियस है। यह ताप धान की फसल को तबाह कर देगा दानों की गुणवत्ता खराब कर देगा, इस बढ़ते तापक्रम से इस सत्र में धान उत्पादक किसानों और राइस मिलर को भारी नुकसान होंना तय है।
वास्तव में पिछले कुछ वर्षो से मौसम लगातार बदलता जा रहा है धरती का ताप बढ़ रहा है।

 वास्तव में हमारे रहन-सहन एवं अनियंत्रित विकास की गतिविधियों नें मौसम के चक्र को गड़बड़ा दिया है,गर्मी का मौसम अब ज्यादा लंबा हो गया है जबकि शीत काल सिकुड़ता जा रहा है,मौसम में बदलाव का विपरीत प्रभाव सजीव व वनस्पतियों पर पड़ा है। मौसम की बाजीगरी में शीतलहर का भी अहम हिस्सा है, शीतलहर और तापक्रम की अनियमितता ने भी फसलों का कबाड़ा किया है, शीतलहर की वजह से वायुप्रदूषण के कारण वायुमंडल मे बढ़तें भारी कणों के जमाव से भारी कोहरा गिरता है यह कोहरा खाद्यान्न, दालों सब्जियों,फल और फूलों को गहरा नुकसान पहुँचा रहा है। शीतलहर दालों और सब्जियों के लिए काल का काम करती है। मौसम के बदलाव का शिकार गेहूँ भी हुआ है,गेहूँ की फसल नवंबर से अप्रैल के दौरान होती है और इस समयावधि में औसत के मुकाबले अधिकतम और न्यूनतम तापमान में दो से चार डिग्री सेल्सियस ज्यादा की बढ़ोतरी पाई गई है। नवंबर माह में गेहूँ बुआई के दौरान तापमान की वृध्दि उसके अंकुरण को प्रभावित कर रही है, तथा फरवरी मार्च का उच्च तापमान पौधों में निर्जलीकरण कर देता है जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है जो कि गेहूँ के दानों के आकर को छोटा होने का कारण बनता है, दानों का छोटा आकार अर्थात उत्पादन में गिरावट। बढ़ते भूताप की वजह से कृषि पैदावार ,आय और कीमतों के संदर्भ में किए गए अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से 4.9 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है तो धान के उत्पादन में 15 से 42 प्रतिशत और गेहूँ उत्पादन के मामले में 25 से लेकर 55 प्रतिशत तक कमी होगी। इससे जीडीपी में 1.8 प्रतिशत से लेकर 3.4 प्रतिशत तक की गिरावट आएगी। कृषि और गैर कृषिगत कीमतों में 8 से 18 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होगी।

इस समय धरती के तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से रोकने के लिए भारत सरकार की सहमति पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहें है,विरोधा प्रकट किया जा रहा है जबकि तापमान में यह 2 डिग्री सेल्सियस की वृध्दि भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने कें लिए काफी है,इससे देश की कुल कृषि आय में 9 फीसदी तक की गिरावट संभावित है। इससे पूर्व इंटरगर्वमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट ने भी चेताया था कि वर्ष 2025 तक धरती के तापमान में औसतन 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृध्दि होती है तो देश में गेंहूँ की उपज में 10 फीसदी तक की गिरावट आएगी। वर्ष 2001 में नई दिल्ली में आयोजित भारतीय विज्ञान काँग्रेस ने भी इस ओर हमारा आकृष्ट किया था, काँग्रेस में वैज्ञानिकों का आंकलन था कि बढते ताप और बदलते मौसम की वजह से देश में बर्ष 2100 तक चावल की पैदावार 3 फीसदी तक घट जाएगी तथा गेहूँ पैदावार आधी रह जाएगी। धान और तापमान के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय चावल शोधा संस्थान मनीला के शोधाकर्ताओं का मानना है कि दिन के मध्य तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृध्दि चावल की उपज में 10 फीसदी की कमी कर देती है।

मौसम में परिवर्तन की मूल वजह वैश्विक तापक्रम मे वृध्दि होना है,जिससे देश की कृषि व्यवस्था खतरे में है,इसे बचाने के लिए वैश्विक तापक्रम मे वृध्दि के कारणों पर मनन की जरूरत है। वैश्विक ताप में वृध्दि की एक मुख्य वजह आधुनिक रासायनिक खेती भी जिसमें जीवाष्र्म ईंधन का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है, प्राप्त आंकड़ों के अनुसार विश्व में 90 मिलियन टन तेल एवं प्राकृतिक गैसो का उपयोग नाइट्रोजन उर्वरक बनाने में किया जाता है जिसकी वजह से वायुमंडल में 250 मिलियन टन कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जित हो रही है जो कि एक ग्रीन हाऊस गैस है एवं वैश्विक तापक्रम को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है, इसके मुकाबले हम जैविक खेती को बढ़ावा देकर बढ़ते ताप की रफ्तार को रोक सकते हैं।


डॉ. सुनील शर्मा