संस्करण: 12अक्टूबर-2009

सत्ता और संगठन में संभावित रिक्त पदों के लिए आंतरिक घमासान
बनने लगी युवाओं की फेहरिस्त
 

राजेंद्र जोशी

राजनीति का क्षेत्र इतना अधिक ग्लैमरस बन गया है कि लोग बाग इस क्षेत्र मे घुसकर सत्ता और संगठन में कोई न कोई मलाईदार वैभवशाली और चमकदार पद पर काबिज होने के लिए तरह-तरह के दांवपेच खेलते ही रहते हैं। लताओं में ऊपर लटक रहे अंगूर के गुच्छों को लपकने के लिए राजनैतिक क्षेत्र का प्रत्येक व्यक्ति जीभ लपलपाती लोमड़ी की तरह अपने छोटे कद छोटा होते हुए भी उचकता हुआ दिखाई दे रहा है। लटक रहे अंगूर के गुच्छों की ऊंचाई और लोमड़ी के बौने कद की कहानी का अंत अपने प्रयासों में असफल लोमड़ी इस कथन के साथ करती है-खट्टे हैं अंगूर, भला मैं क्यों खाऊंगी'। ठीक, एकदम इसी तरह पद प्राप्ति की असफलता के बाद ऐसे ही राजनैतिक नेतागण अपनी तथाकथित संतुष्टि का इज़हार करने लगते हैं।

अक्सर होता यह है कि राजनीतिक क्षेत्र में सत्ता और संगठनों में कोई न कोई पद रिक्त होते ही रहते हैं। कई पद जो निधर्रित  अवधि के लिए होते हैं, ऐसे पदों पर नियुक्त किये गये नेताओं के कार्यकाल की समाप्ति पर पद रिक्त हो जाते हैं, किंतु कुछ पद अन्य कारणों से रिक्त करा लिए जाते हैं। जब-जब भी आकस्मिक रूप से किसी पद के रिक्त होने की संभावना बन जाती है, तब कतिपय नेतागण जो अपने आप को कतार में खड़ा महसूस करते हैं, अपनी दांवेदारी ठोंकने लग जाते हैं। स्थिति यहाँ तक निर्मित हो जाती है कि 'एक अनार सौ बीमार' की कहावत मूर्तरूप लेने लग जाती है।

कतिपय पार्टियों में अंतरकलह इतना अधिक बढ़ जाता है कि पदों पर प्रतिष्ठापूर्वक बने रह पाना असंभव लगने लग जाता है। कुछ शर्म खाने वाले नेतागण आत्मा की आवाज पर अपने पद से छुटकारा पाने का मन बना लेते हैं। यदि नेता पद की चासनी में डूबे कतिपय नेता मोहवश पद त्यागने में हीला हवाला करने लगते हैं तो ऐसे नेताओं को जोर का धक्का धीरे से देकर एक क्षण में पद से हटाकर पार्टी के बाहर भी फेंक दिया जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते हैं जहां दोनों तरह की प्रवृत्तियों के नेतागण देखने को मिलते हैं।

पिछले कुछ दिनों से भाजपा जैसी राष्ट्रीय स्तर की बड़ी पार्टी में बड़े-बड़े नेताओं के बीच कब्र में 6 दशक पहले दफनाएं गए जिन्ना को लेकर वैचारिक मतभेदों का जो बवंडर उठा है उसमें अच्छे-अच्छों की नींव हिल गई और दीवारें दरकने लगी। यहाँ तक कि जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को तो जड़ सहित उखाड़ कर फेंक दिया गया। हालांकि जिस तरह के जुर्म में जसवंत की जमीन खसका दी गई ठीक उसी तरह के जुर्म से सेनापति आडवानी भी आरोपित हो रहे हैं। भाजपा को हांकने वाले संगठन आर.एस.एस. ने तो भाजपा के अंतर्कलह से अपवित्र हो रहे आंगन में गंगाजल छिड़कने का अभियान चला डाला है। भाजपा की धूमिल होती चादर की ड्रायक्लीनिंग की दृष्टि से सेनापति आडवानी और अध्यक्ष राजनाथ सिंह के लिए भी आंगन के बाहर जाने वाला फाटक खोल दिया गया है।

पार्टी के अंतर्कलह की जड़ में जो विषय है वह पिछले लोकसभा के निर्वाचन ेमें भाजपा की हुई अप्रत्याशित शिकस्त है। निर्वाचन में हुई हार भाजपा की कल्पना और उसके सपनों के एकदम विपरीत थी। इस हार की जिम्मेदारियां तय करने के लिए शिमला की ठंडक में जो मंथन बैठक हुई उसने पार्टी के भीतर गरमाहट पैदा कर दी। बैठक के बाद से लोकसभा में विपक्ष के नेता और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की अपनी कार्यप्रणालियां और अपने अपने पदों पर जमें रहने की जिद्द पर आरएसएस को अपने हाथ में सार्पनर उठाना पड़ा ताकि पार्टी की उस पुरानी नोक को धारदार बनाया जा सके। इन दोनों बड़े नेताओं में से एक का बुढ़ापा और दूसरे के कार्यकाल की समाप्ति का नजदीत आता समय इन्हें अपने पदों पर बने रहने के लिए सबसे बड़ा अडंगा साबित हो रहा है। युवा नेतृत्व के इस दौर में इन पदों के लिए युवाओं की लंबी चौड़ी फेहरिस्त हवा में लहराने लगी है।

जब उच्च पदों के खाली होने की चर्चा मूर्तरूप लेने लगती है तो उन पर काबिज होने वालों के दांव-पेंच शुरू हो जाते हैं। ऐसे दांव-पेंच के खेल के बीच बुजुर्ग नेतृत्व को मार्गदर्शक या सलाहकार की भूमिका का प्रलोभन देकर उन्हें प्रतिष्ठापित कर दिया जाता है। रिक्त पदों की पूर्ति की होड़ा-होड़ी में पद से अलग हुए या जबरदस्ती धाकियाये नेताओं के अस्तित्व की रक्षा की ओर न तो किसी का ध्यान रहता है और न ही उनके दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर उनके सम्मान को महत्व दिया जाता है। भाजपा का वर्तमान दौर इसी परिदृष्य में घिरा हुआ है जहाँ अटलजी जैसी भूलती-बिसरती जा रही जैसी शख्सियत की सूची और भी लंबी होते जाने की संभावना को रोक पाना असंभव दिखाई देने लगा है। सत्ता और संगठन के संभावित रिक्त पदों की पूर्ति के लिए घमासान तब तक नहीं थम पायेगा, जब तक आर.एस.एस. की थाली में रखे कुंकुं-अक्षत का तिलक किसी युवा मस्तक पर लग नहीं जाता।
 

राजेंद्र जोशी