संस्करण: 12अक्टूबर-2009

 

एक नई चाल की तलाश में भाजपा
 

बद्री रैना

-पहला खंड-

क्या एक नाटककार नहीं था, जिसने एक निर्माता की तलाश में छह चरित्रों को गढ़ा था?  खैर, भारत में एक ''बड़ी'' राजनीतिक पार्टी है, जो हमेशा से एक कार्यक्रम की तलाश में रहती है। इसे भारतीय जनता पार्टी कहते हैं। लेकिन डटे रहना, ऊपर उध्दृत प्रसिध्द नाटक से भिन्न भाजपा का अपार प्रोजेक्ट, वास्तव में, किसी निर्माता या कार्यक्रम को पाना नहीं है, बल्कि किसी को या सिर्फ उसमें लगातार छिपना है। इसकी अवास्तविक जाति का वह निर्माता है, आरएसएस, तथाकथित सांस्कृतिक संगठन, जिसकी स्थापना भारत के दक्षिण पंथी ब्राह्मण्वाद द्वारा 1924 में की गई थी। इसका मकसद तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन के र्मनिरपेक्ष और बहुलवादी विचारधारा के विरुध्द गैर-उपनिवेशीय आंदोलन को मोड़कर बहुसंख्यकों का एक 'हिन्दू राष्ट्र' बनाना था। उस समय की कट्टरता में समाज के परखे हुए उपकरण और भारत में अन्य प्रत्येक अत्याचार, जाति क्रम अथवा वर्ण व्यवस्था शामिल थे। तब से तीन प्रभावी सिध्दांत बनाये गए :-
1. हिन्दू विचारधारा और व्यवहार पर सवर्ण जाति का एक कठोर एकाधिकार।
2. मुस्लिमों, जिसे ये इस रती पर दूसरे ग्रह के प्राणी मानते हैं और उन्हें भारत की 'संस्कृति' के सबसे बड़े दुश्मन समझते हैं, के खिलाफ एक सख्त सेना।
3. ऐसे सैन्य साम्राज्यवाद और व्यवस्थित आर्थिक आधार के साथ एक गहरा लगाव, जो सैन्यवाद और साम्राज्यवाद को संभव और अनिवार्य रूप दे सके।

इस संगठन ने 1949 तक तिरंगे के प्रति सहमति स्पष्ट नहीं की, जो नये राष्ट्र का एक अविवादित प्रतीकरूप था और तब नेहरू सरकार पर यह दबाव भी बनाया कि उनके संघ प्रमुख अथवा सरसंघचालक को रिहा किया जाए, जिन्हें 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगाये गए प्रतिबं के परिणामरूवरूप गिरफ्तार किया गया था।केवल तभी आरएसएस सही मायने में अपना संविधान बनाने और तिरंगे के प्रति अपनी निष्ठा को उसमें उध्दृत करने के लिए बाध्य हुआ था।

एक सच, जो भारतीय संविधान के लिए अब भी अनसुलझा हुआ है, जो तब पैदा हुआ, जब वाजपेयी नेतृत्व वाली एनडीए के शासन (1999-2004) ने एक कंस्टीटयूशन रिव्यू कमिटी का गठन किया, ताकि गणतंत्र के कुछ बुनियादी स्वरूप में संशोन किया जा सके। सौभाग्य से, भारत के स्वाधीनता पूर्व का इतिहास का दबाव इस छद्मावरण से काफी भारी था।


-दूसरा खंड-

भाजपा का प्रथम अवतार भारतीय जन संघ से निकली इस विचारधारा से संबंधी आव्यूह 1951 में एक खुल्लमखुल्ला राजनीतिक पांचवें स्तंभ के रूप में जारी होने के लिए था, जिसे एक वंशवादी/फासीवादी 'राष्ट्रवाद' के बारे में ज्यादा स्पष्ट अवधारणा के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए- जिसे उस सावरकर ने, जिसने खुद को नास्तिक और हिन्दू कर्मकांडों अथवा जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं रखनें वाला कबूला था, दक्षिण पंथ को दिया।वह यही शख्स था, जिसने हिन्दुत्व को विशुध्द रूप से राजनीतिक रूप दिया, जिसका धार्मिक पहचान के साथ केवल एक चालबाजी के रूप में संबं था।

संक्षेप में कहें तो, सावरकर ने 1923 से बहुत पहले ही-जिन्ना से लगभग 15 साल पहले ही- यह कल्पना कर ली थी कि असल में भारत में दो राष्ट्र शामिल है- 'हिन्दुओं' और 'मुस्लिमों' का।नये राज्य के उद्भव के वास्ते उनका यह विचार था कि जिसने भारत में जन्म लिया है और जिनकी पूजा का प्रमुख प्रतीक भारत के अंदर है, केवल उन्हें भारतीय नागरिक माना जा सकता है।इस तरह एक साफ शर्त, जिसने मुस्लिमों को (मक्का) और ईसाइयों को (जेरूसेलम) को नागरिकता से बाहर दिया होगा, बताया गया।

एक टीवी टाक-शो में आरएसएस/भाजपा के प्रमुख प्रवक्ता शेषांद्री चारी ने, 'हिन्दुत्व' को परिभाषित करने के लिए एंकर के दबाव में, माना कि इसकी केवल एक ही परिभाषा अब तक उपलब्ध है, जिसे सावरकर ने दिया था। उन्होंने तुरंत यह जोड़ा कि हालांकि आरएसएस/भाजपा इस परिभाषा को नहीं अपनाते हैं। कड़वा सच यह है कि यह परिभाषा आरएसएस/भाजपा की राजनीतिक दुकान के दिल में नहीं बची है। और अब भी कोई एक विषय नहीं बचा है, जिसका वह खुले तौर पर आव्हान कर सके और 2009 के भारत में कोई जानदार राजनीति करने की आशा रख सके।

यह इसलिए मेरे दोस्त, एक प्रसिध्द स्तंभकार जे. श्री रमन बहुत सही हैं, जब वे 2009 से पूर्व भाजपा के निर्वाचन संबंधी जड़ की बात कहते हैं कि गर्मागर्म विवाद इस पर यह है कि 'संघ परिवार के चुनाव क्षेत्र' से बाहर कैसे अपनी विचारधारा को विस्तृत वर्ग में फैले वोटरों से छिपाया जाए।(देखें, डेली टाइम्स, लाहौर, 26 जून, 2009)
रमन विभिन्न चालों का त्वरित संपुटीकरण करते हैं कि भाजपा समय देखकर परदानशीं मुद्दों को व्यवहार में लाने के फिराक में थी, अब अपने पसंदीदा सेनानीगणों के लिए वह एक अथवा अन्य नये तथाकथित वैचारिक स्रोत का उध्दरण कर रही है। इस प्रकार, 1980 में इसकी शुरूआत से, हम 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' (1990 की लूटमारवाली मुस्लिम-विरोधी आडवाणी की रथयात्रा की नींद से जगाने में, जिसे बाबरी मस्जिद गिरने और मुसलमानों के खिलाफ नेतृत्व किया गया था।) को ध्यान में रखते हुए 'गांधी के समाजवाद', 'पूर्ण मानवतावाद' (यह भाजपा संविधान में मौजूद है।) के काम में लगे हुए हैं और 'हिन्दुत्व' के मुकाबले शिखर पर पहुंच रहे हैं। एक बात, सहज ही, जो संघ का वंजश करेगा नहीं, मिथकीय शब्द हिन्दुत्व का आशय स्पष्ट करने की है। कारण समझना कठिन नहीं है।


-तीसरा खंड-

अब समस्या, जिसका भाजपा सामना करती है, वह है, इसका आरएसएस के एक महीन सिरे के रूप में बने रहना और नियंत्रित होना।

एक र्मनिरपेक्ष-संवैधानिक आशाहीनता के अंदर सावरकर/गोलवरकर के विचारों (बाद में यह शर्त लगाना था कि 'विदेशी वंशजो' या कहें मुस्लिमों जो अपने अलग अस्तित्व को खोना नहीं चाहते थे और न ही हिन्दू वंश में शामिल होना चाहते थे, उन्हें भारतीय नागरिकता के अधिकार प्रदान नहीं किये जा सकते) को खुलेतौर पर पार्टी कार्यक्रम बनाने में अक्षम भाजपा के पास कार्यक्रम के लिए मुद्दे की मार्केटिंग करने का अवांछनीय काम था, जिसे बहुत सर्तकतापूर्वक विविधातापूर्ण भारतीय वोटरों के बीच बेचना था।

वाकई में जैसा कि अपनों के बीच इसका व्यापारिक आधार जहां पदार्थों और सेवाओं, जो लंबे समय के लिए बाजार में होती है, के संरक्षण की हमेशा कोशिश होती है, भाजपा ने आकर्षित सूत्रीकरण के लिए दुकान की ओर ध्यान दिया है, जो राज्य शक्ति पैदा कर सके, न कि फासिस्ट कार्यक्रम, जो एक शक्तिशाली, बंधुआ राज्य की रणनीति को छोड़कर हमेशा सफल रह सके।वर्षों से भारतीय लोकतंत्र की गति और नवउदार तकनीकी के साथ पीढ़ीगत स्थानांतरण ने हालांकि अब हिन्दुत्व प्रोजेक्ट में और भी चमक पैदा कर दी है, जिसमें इसके सभी अवतार या कहें छद्मावतार शामिल हैं।

इसलिए यह भाजपा ही है, जिसके विफल प्रधानमंत्री संबंधी पहलू रहे लालकृष्ण आडवाणी हाल के पार्टी सम्मेलन में उठे सभी अस्तित्व के मुद्दों से किनारा करते रहे। साथ ही उन्होंने पार्टी के विफल अभियान के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भी किनारा ले लिया और अपने गुट के प्रति जिम्मेदारी से भी जो दरअसल फिर से पद-प्रतिष्ठा पाने की आश लगा रखे थे। ऐसे लोग जो दूसरे के प्रति दिल में लगी आग को ठंडा करने के लिए हिन्दुत्व की धारा नये सिरे से बहाने पर जोर दिया कि इसे पार्टी को अवश्य व्यवहार लाना सिखना चाहिए।यह सज्जन व्यक्ति, इनकी कुछ भी वास्तविकता हो, हमेशा इनके आस्तिन में कुछ न कुछ होता है।चतुराई के लिए उन्होंने उच्चारित किया कि भाजपा को अब से 'किसी संकीर्ण अथवा पक्षपाती मुस्लिम विरोधी हिन्दुत्व की व्याख्या' नहीं करनी चाहिए।आश्चर्यजनक हैं न, कैसे फासीवादी परिसर के भीतर कठोरता से रंग बदला गया। यह घटना एक चकराये हुए सम्मेलन के अंतिम मिनट में घटी।

आनन फानन में, यह हुआ था। लेकिन यहां हमें कहने के लिए क्या है। हम विश्वास करते हैं कि हिन्दुत्व की इस नई क्रांतिकारी दृष्टि के रूप में एक 82 साल उम्र के बूढ़े व्यक्ति की तरफ आ रही है, जो मुश्किल से इस स्थिति में है कि खुद के लिए एक भविष्य बना सके। कुछ गहराई से यहां महसूस करते है कि यह काम में मत परिवर्तन है। आगे अन्य किसी के मुद्दे पर दिशा नहीं बदलने वाला। एक मत परिवर्तन जो अनिवार्य रूप से एक स्वीकारोक्ति में भी शामिल है। आडवाणी का निरूपण का मतलब अलग नहीं बल्कि एक साथ ही है कि वह हिन्दुत्व को मानते है, जैसा कि पहले से माना जा रहा है, ''कट्टर और मुस्लिम-विरोधी''। और इस आधार पर दरअसल उनके खुद से रेखांकित क्षमताएं हैं। इसलिए राष्ट्र कह सकता है कि यदि तथाकथित हिन्दुत्व की नई अकट्टर, गैर मुस्लिम विरोधी दृष्टि को क्या गंभीरता से लिया जाए।
 

बद्री रैना