संस्करण: 12अक्टूबर-2009

17 अक्टूबर-दीपावली पर विशेष
ज्योति-पर्व को सार्थक बनायें...
 

डॉ. गीता गुप्त

स देश में अगणित पर्व-त्योहार मनाये जाते हैं। मांगलिक व्रत-पूजन और अनुष्ठान का क्रम वर्ष भर निरंतर चलता रहता है। पर्व-त्योहारों से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें कोई न कोई संदेश निहित है। पर वे संदेश हमारे आचरण और जीवन में चरितार्थ होते दिखाई नहीं देते। त्योहार के पवित्र उद्देश्यों को मनुष्य की भौतिक लालसाओं और बाज़ारवाद ने निगल लिया है। आज परिस्थितियां बहुत बदल गयी हैं। हमारी आस्थाओं, विश्वासों, मूल्यों एवं परिवेश में परिवर्तन हुआ है। ज्योति-पर्व को मनाये जाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। आनंद, उल्लास और भाईचारे का प्रतीक यह पर्व अब व्यर्थ प्रदर्शन एवं अपव्यय तक सीमित रह गया है। कुछ लोगों के लिए यह वैभव के उन्मत्त प्रदर्शन का अवसर बन गया है और कुछ के लिए मात्र औपचारिकता निभाने का त्योहार। यह स्थिति सामाजिक असंतुलन की परिचायक है। उल्लास एवं आनंद मनाने के लिए अपव्यय की अपेक्षा दूरदर्शिता से काम लेना आवश्यक है।

अभी विजयादशमी पर कितनी धूम थी ? रावण के विनाश का, असत्य पर सत्य की विजय का, शक्ति की उपासना के मांगलिक अनुष्ठान का जिस तरह आडंबर रचा जाता है, उसका कोई औचित्य नहीं। हम अपने आसपास और मन में बसे रावण का संहार करके पर्व क्यों नहीं मनाते ? क्योंर् ईष्या-द्वेष, कलह, असीम आकांक्षाओं, हिंसा और बुराइयों की गठरी मन में सहेजे ईश्वर की आराधना का ढोंग रचते रहते हैं ? क्या पर्व के बहाने हम किसी सामाजिक बुराई या अपने एक भी दुर्गुण से मुक्त होने का प्रयास करते हैं ? सोचने की बात है कि गंभीर जल-संकट से जूझते हुए भी हम मूर्तियों का विसर्जन कर झील-तालाबों के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ किये जा रहे हैं। यह कितना घातक है, हम कब समझेंगे ?

अब दीपावली द्वार पर है। बाज़ार सज गये हैं। आकर्षक विज्ञापन उपभोक्ताओं को रिझा रहे हैं। अखबार विज्ञापनों से अटे पड़े हैं। लोग घर के काया-कल्प की सोचेंगे। अनावश्यक भौतिक वस्तुएं क्रय कर प्रसन्न व धान्य होंगे। क्या यही त्योहार की सार्थकता है ? हम कभी मन के काया-कल्प का विचार क्यों नहीं करते ? अपने आसपास की विसंगतियों और बुराइयों को दूर कर एक स्वस्थ, सद्भावनापूर्ण सामाजिक वातावरण-निर्माण की बात क्यों नहीं सोचते ? यदि सही अर्थों में हमें दीपावली की परंपरा को बनाये रखना है तो हम अपने राष्ट्रीय परिदृश्य की उपेक्षा नहीं कर सकते। यह पर्व हमारी प्रगति का भी प्रतीक है। स्वभाव में ही संघर्षशील मनुष्य अभाव और निर्धानता के अंधाकार के विरुध्द निरंतर संघर्ष करता आया है। दीप-पर्व पर जलाये जाने वाले मिट्टी के नन्हे दीपकों का प्रकाश मनुष्य के परिश्रम, उसकी अपराजेय संकल्प शक्ति और प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुध्द उसकी दुर्दमनीय संघर्ष क्षमता का परिचय है।

ऐसे समय दीपावली का पावन पर्व आया है, जबकि हमारा देश अनेक मोर्चों पर जूझ रहा है। आंधा्र प्रदेश व कर्नाटक में आयी भीषण बाढ़ ने वहाँ जन-जीवन को तबाह कर दिया है। कर्नाटक में पचीस हज़ार घर ढह गये, सैकड़ों गांव बाढ़ में डूब गये। दो सौ से अधिक जानें चली गयीं। पौने दो लाख से अधिक लोग राहत-शिविरों में शरण लिए हुए हैं। वहाँ के बाढ़ प्रभावित 15 जिलों के लिए मुख्यमंत्री द्वारा केंद्र से दस हजार करोड़ की मदद मांगी गयी है। आंधा्र प्रदेश में भी बाढ़ से 18 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। दर्जनों गांव जलमग्न हैं, मृतकों की संख्या बढ़ रही है। जानवरों के भी शव पानी में तैर रहे हैं। मौजूदा हालात में महामारी फैलने की आशंका भी है। वहां के मुख्यमंत्री ने भी राहत एवं बचाव कार्यों के लिए छ: हजार करोड़ की राशि केंद्र से चाही है।

दुर्भाग्य से महाराष्ट्र के कोंकण और पूर्वी हिस्सों में भी भारी बारिश से बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गयी ओर रत्नागिरी, सिन्धुवर्ग एवं सोनपुर में 23 मौतें हुईं। केरल व बिहार में नौका दुर्घटना में लोग मारे गये। उड़ीसा में भी स्थिति गंभीर है। बिहार में नक्सली हमले में 16 ग्रामीण मारे गये और वहाँ के मुख्यमंत्री को मारने की धामकी भी दी गयी है। प्राकृतिक आपदाएं अपनी जगह हैं, उनपर मनुष्य का वश नहीं चलता इसलिए धौर्यपूर्वक उनका सामना करना ही पड़ता है। लेकिन धरती के विभिन्न छोरों पर मनुष्य ने जो तांडव मचा रखा है वह क्या कम भयंकर है ? लोग दिन-दहाड़े गोलियों से भूने जा रहे हैं। हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। आदमी कहीं भी सुरक्षित नहीं है। चीनी ड्रैगन भारत को युध्द की धामकियां दे रहे हैं। अरुणाचल में सीमा के आसपास के इलाकों में टूर ऑपरेटरों को धामकी भरे ई-मेल आ रहे हैं। देश की सीमाओं पर जवान जूझ रहे हैं।

भारत समेत विश्व के कई देशों में हाहाकार मचा हुआ है। कहीं भूकंप, कहीं बाढ़ की विनाश-लीला से मानवता आहत है। अनेक देश स्वाइन फ्लू की चपेट में हैं। इंडोनेशिया में भूकंप से हजारों लोगों ने प्राणा गंवाये हैं। फिलीपींस की राजधानी मनीला और उसके आसपास के क्षेत्रों में भी तूफान से तीन सौ से अधिक मौते हुई हैं। यह बहुत कठिन दौर हैं। सृष्टि के साथ-साथ मानव की प्रवृत्ति भी विनाशोन्मुख प्रतीत हो रही है। इसे यथासमय रोकने का प्रयास नहीं किया गया तो गंभीर दुष्परिणाम भुगतने होंगे। यह न भूले कि विज्ञान उपकरणों का निर्माण तो कर सकता है पर सृष्टि की सर्जना नहीं। सृष्टि के सर्जक को हम भूलते जा रहे हैं। स्रष्टा ने तो हमें संपूर्ण जीवन को उत्सव की भांति जीने का सही मार्ग बताया था, पर हमने वह मार्ग नहीं अपनाया। हम मितभाषी, मिताहारी, अल्प संतोषी, परदु:खकातर, नि:स्वार्थी, निर्व्यसनी, परोपकारी और सच्चे ईश्वरभक्त बनकर आजीवन त्योहार मना सकते हैं और सच्चा त्योहार वहीं है जो मानवता की रक्षा के अनुष्ठान का प्रेरक हो।

एक कहावत है-मन चंगा तो कठौती में गंगा। आज आदमी का मन चंगा कहां है ? कठौती में गंगा वाली बात उसे नहीं सुहाती। उसकी जीवन शैली बदल गयी, जीवन-मूल्य बदल गये। उसकी महत्वकांक्षाएं व भौतिक एषणाएं अनंत हैं। उसने पर्वों का स्वरूप बदल दिया। अब त्योहारों में आधुनिकता का समावेश हो गया है, उनमें निहित सन्देश बहुत पीछे छूट गये हैं। उल्लास, उत्साह और उमंग का त्योहार भी अब ब्राण्डेड होता जा रहा है। कपड़े, मिठाइयां, पटाखें, उपहार-सभी कुछ विदेशी ब्राण्ड के होंगे तभी दीवाली मनेगी। वैसे तो महंगाई का रोना रोया जाता है। दाल और शक्कर की बढ़ी कीमत पर लोग झींकते हैं। पर आज बाजार की भीड़ पर नज़र डालें तो दंग रह जाएंगे। दुकानों में लोग समा नहीं रहे हैं। उनके चेहरों का रंग मानों कहता है-आग लगे बस्ती में, मस्त रहो मस्ती में।

यह घोर संकट की घड़ी है। देश आपदाओं से घिरा है। धरती, जलवायु, पर्यावरण, बिजली, पानी आदि की समस्याएं गंभीर रूप ले रही हैं। अनगिनत लोग दु:ख और शोक के अंधाकार में डूबे हुए हैं। कई घरों में अंधेरा  है तो कइयों ने अपना घर और परिजन खो दिया है। ऐसे तमाम लोगों की पीड़ा से अकूता कैसे रहा जा सकता है ? अपने राष्ट्रीय परिदृश्य की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है। इन हालात से हमें सादगी से त्योहार मनाना चाहिए। यह भी सोचना होगा कि हम बिजली बचायें। सजावट के लिए विद्युत की झालरों का उपयोग न करके तेल के दीये जलायें। आतिशबाज़ी से ध्वनि और वायु-प्रदूषण फैलाकर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचायें। कितना अच्छा हो कि हम प्रियजनों को महंगे उपहारों की बजाय पौधों भेंट में दें। यह दीर्घकाल तक स्मरण रहने के अलावा पर्यावरण की रक्षा में भी सहायक होगा। हम विदेशी ब्रांड की चॉकलेट, मिठाइयां या फल न खरीदकर अपने पारंपरिक व्यंजन बनाकर त्योहार पर सबको खिलायें और अतिरिक्त राशि उदारता पूर्वक राष्ट्रीय आपदा कोष में दान करें, ताकि पीड़ित लोगों की मदद की जा सके।

वस्तुत: विश्व बंधुत्व, विश्व कल्याण और सर्वे भवंतु सुखिन: की कामना कोरा पाखंड या निर्जीव सिध्दांत नहीं है। ऐसे में, इस पर्व पर क्या आशा की जाए ? फिर भी शकुन की कामना शाश्वत है इसलिए यह ज्योति-पर्व देश को नयी दिशा देने का शकुन बने-यही कामना है। आज दीप घर के आंगन में ही नहीं, हृदय में भी जलाने की आवश्यकता है। भीतर की उजास ही सत्य, शिव और सुंदर का अवतरण कर सकेगी। यह पर्व हमें आत्मिक आलोक को उद्धाटित करने के लिए प्रेरित करें। यदि हम अपने मन के अंधोरे कोने में विवेक का कोई दीप जला सकें तो यह दीप पर्व सार्थक होगा और मानवता के लिए कल्याणकारी भी।
 

 
डॉ. गीता गुप्त