संस्करण: 11  जून-2012

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पाँचजन्य और आर्गनाइजर,

मुख पत्र या मुखौटा पत्र

           त दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख राम माधव ने भोपाल में कहा कि पांचजन्य और आर्गनाइजर का संचालन स्वयंसेवक करते हैं लेकिन उनमें प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार संघ के विचारों से मेल खाएं यह जरूरी नहीं है। वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में आरएसएस के दो मुखपत्रों में छपे अलग अलग विचारों के बारे में सफाई दे रहे थे।

 

  ? वीरेन्द्र जैन


संदर्भ : आडवाणी की गडकरी को नैतिक शिक्षा

भाजपा आरएसएस हमेशा से रहे हैं भ्रष्ट और अवसरवादी

        भी हाल में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी ने पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी की कार्यप्रणाली की चर्चा करते हुए उनके द्वारा अभी हाल में लिये गये निर्णयों की आलोचना की थी। इस संदर्भ में उन्होंने उत्तरप्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार के भ्रष्ट मंत्री कुशवाह को भाजपा में प्रवेश देने, कर्नाटक के मामले में लीपापोती का रवैया अपनाने आदि बातो का उल्लेख किया था। इसके अतिरिक्त गडकरी द्वारा एक धनवान व्यक्ति को झारखण्ड से राज्यसभा में लाने का प्रयास करने और इसके लिए भ्रष्ट तरीके अपनाने की चर्चा सारे देश में हुई। 

? एल.एस.हरदेनिया


मोदी राजनीतिक अहंकार के प्रतीक

    क ऐसा व्यक्ति जो अपने ही लोगों से सद्भावना नहीं रखता और सद्भावना उपवास के दौरान मुस्लिम की टोपी ठुकरा देता है तो अचरज नहीं होता। लेकिन ऐसे व्यक्ति को जब विविधता भरे और बहुधर्मी लोगों का प्रधानमंत्री बनाए जाने की पैरवी होती है तो जरूर थोड़ा अजीब लगता है,और सवाल भी उठते हैं कि क्या ऐसा व्यक्ति देश की विविधता को स्वीकार कर पाएगा? क्या लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग जनता की आलोचनाएं सहन कर पाएगा? और सबसे बड़ी बात क्या समूचा देश ऐसे व्यक्ति को स्वीकार कर सकेगा? निश्चित तौर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर आरएसएस इन दिनों इसी चिंतन में खोया होगा।

? विवेकानंद


ये जो नया बिहार है...

          ये जो बिहार है, आज से दो दशक पहले वाला बिहार नहीं है। बिहार बदल रहा है। केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने कह दिया है कि बिहार, सबसे तेज 13.1 फीसद की गति से विकास कर रहा है। लेकिन केवल विकास के पैमानों पर नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बिहार नई करवट ले रहा है। विकास के आंकड़ों से अलग बिहार में सामाजिक स्तर पर चल रहे बदलावों को जनना-समझना ज्यादा जरूरी है।

? विजय प्रताप


कोसी कला दंगा और सपा सरकार

         क तरफ जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए दो हजार करोड़ रुपए का पैकेज दे रहे हैं तो वहीं उनकी पार्टी के नेता और प्रशासन वह सब कुछ करता है जो अल्पसंख्यकों को आभास दे कि यह यह यूपी नहीं मोदी का गुजरात है। दरअसल पिछले दिनों मथुरा के कोसी कला में जो कुछ हुआ उसे मुसलमान,सरकार की अपने पहली ही तिमाही परीक्षा के विफलता के बतौर देख रहा है। जिसका असर यदि बरकरार रहा तो 2014में साइकिल के लिए मुश्किले पैदा हो सकती हैं।  

 ? राजीव कुमार यादव


दवा कंपनियों का काला कारोबार

                  बेहिसाब मुनाफा काने में जुटीं दवा कंपनियां डॉक्टरों के साथ मिलकर मरीजों की जेब खाली करने का धंधा कर रही हैं। कभी डॉक्टरों को गिफ्ट देकर लुभाने वाली दवा कंपनियां अब डॉक्टरों को अपने उत्पाद महंगी कीमत में बिकवाने के बदले विदेश यात्राओं का तोहफा दे रही हैं। खास बात तो है कि यह सब गोरखधंधा खुलेआम चल रहा है और सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है। दवाओं के मूल्य नियंत्रण में हम अपने छोटे से पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी बहुत पीछे हैं।

? महेश बाग़ी


बदहाल कानून के साये में जिंदगी

       ध्यप्रदेश में अपराध अपने चरम पर हैं। हर रोज अखबार में अपराध से जुड़ी दो खबरें तो निश्चित तौर पर प्रकाशित होती ही हैं। मर्डर, चोरी, बलात्कार, दुर्घटना या फिर विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या। इनमें सबसे निर्मम है, ट्रक या डंपर चालकों का आम व्यक्ति को बेरहमी से कुचलते हुए जाना। हम रोज सुबह की शुरूआत अखबार से करते हैं, एक सकारात्मक सोच लेकर। लेकिन रोज अखबारों में अपराधिक खबरें पढ़कर मन विचलित हो जाता है। कई बार मन में ख्याल भी आता है कि एक दिन तो ऐसा अखबार प्रकाशित होगा जिसमें एक भी अप्रिय घटना का समाचार न हो। शायद वो हमारी जिंदगी का पहला और सबसे अविस्मर्णीय सकारात्मक दिन होगा।

? राखी रघुवंशी


साहित्यिक और सांस्कृतिक खबरें नदारद

राजनैतिक खबरें प्रचार माध्यमों पर हावी

      क समय था जब साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलाक्षेत्र से जुड़ी खबरों और उनकी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों द्वारा गहरी रुचि ली जाती थी। वर्तमान दौर में संचार माध्यमों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। यह बदलाव स्वाभाविक भी है। पहले यह जुमला चरितार्थ होता था कि 'साहित्य समाज का दर्पण होता है'किंतु अब राजनीति इतनी ज्यादा हावी हो गई है कि पूरे के पूरे संचार माध्यम चाहे वे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हों, राजनीतिमय हो गये हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि अब राजनीति ही समाज का दर्पण हो गई है।

? राजेन्द्र जोशी


संदर्भ : कश्मीर समस्या पर वार्ताकार समूह की रिपोर्ट

उम्मीद जगाती वार्ताकार समूह की रिपोर्ट

        श्मीर समस्या के व्यापक राजनीतिक समाधान खोजने के लिए केन्द्र की ओर से नियुक्त वार्ताकारों की रिपोर्ट, सरकार को सौंपे जाने के सात महीने बाद आखिरकार सार्वजनिक हो गई है। केन्द्र सरकार ने हाल ही में रिपोर्ट को इस मकसद से सार्वजनिक किया कि राजनीतिक पार्टियां और दूसरे संबध्द पक्ष इस पर अपनी प्रतिक्रिया,विचार दें। जाहिर है, सभी पक्षों की राय जानने के बाद ही सरकार रिपोर्ट पर अपना अंतिम फैसला करेगी। बहरहाल, रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक समाधान के अलावा उन मुद्दों को भी शामिल किया गया है, जिनका ताल्लुक सीधे-सीधे सूबे की अवाम से है।

? जाहिद खान


कृषि-ऋण वसूली के नियम और स्पष्ट हों

    किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण कर्ज ही होता है जिसे वे फसल खराब होने या दाम गिर जाने के कारण बैंक या साहूकार को चुका नहीं पाते और उनकी जमीन कौड़ियों के मोल छीन ली जाती है। जमीन चली जाने के नुकसान से भी बड़ा भय उन्हें अपने समाज का होता है जो उन्हें अत्यन्त हेय दृष्टि से देखने लगता है और जहाँ जीवित रहकर सबके उपहास का पात्र बनने के बजाय मौत को गले लगाना ही उन्हें उचित लगता है। किसी किसान का अपने ही गॉव में मजदूर बन जाना मौत से भी बदतर होता है। यह वैसे ही है जैसे कोई उद्यमी अपने ही संस्थान में श्रमिक बनने को विवश हो जाय। 

 

? सुनील अमर


शिक्षा व्यवस्था में काफी चिंतन की जरूरत

     स्कूल कालेजों में नया शिक्षण सत्र की शुरूआत होने वाली है। बच्चों में उत्साह है,चिंताएॅ भी है और भय भी? छोटा बच्चा अपनी नई पुस्तकों के साथ प्रसन्न है और नए स्कूल में लगे झूले उसे रोमांचित कर रहे हैं,शायद यह सोचते हूए कि इस स्कूल में उसे पढ़ाई का ज्यादा झंझट नहीं रहेगा जब मन हो तो झूले पर बैठने मिलेगा?एक माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे के मन में चिंताएॅ हैं कि वो कौन सा विषय पढ़े?उसे मनचाहा विषय मिलेगा या नहीं?उसके द्वारा चाहे गए स्कूल में प्रवेश मिल पाएगा?और कालेज में जाने वाला बच्चा एक अलग ही भय का सामना कर रहा है शायद उसे डर है कि उसे किसी अच्छे कालेज में एडमीशन मिला तो वो अपने नए साथियों के साथ अच्छे से अग्रेंजी में बात नहीं कर पाएगा।

? डॉ. सुनील शर्मा


जीवन भक्षक बनते

मेडिकल स्टोर्स

    देश के मेडिकल स्टोर्स में जीवन रक्षक दवाएँ मिलती हैं। पर आजकल यहाँ से मौत बिक रही है। यहाँ जीवन रक्षक नहीं, बल्कि जीवन भक्षक दवाएँ मिल रही हैं। इसमें राज्य सरकार का पूरा सहयोग है।

               पूरे देश में करीब एक हजार ऐलोपैथी दवाएँ बेची जा रही हैं, जो मानव के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। देश के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने हाल ही में यह बताया है कि देश में जितनी ऐलोपैथी दवाएँ बेची जाती हैं,उसमें से करीब एक हजार दवाएँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इन दवाओं को राज्य सरकार ने बेचने की अनुमति दी है।

? डॉ. महेश परिमल


12 जून : बाल मजदूरी के खिलाफ विश्व दिवस पर विशेष

कैसे खत्म होगी बाल-मजदूरी ?

     ज भी बाल-श्रम भारत की एक गंभीर समस्या है। यद्यपि हाल के वर्षों में सरकार का ध्यान बच्चों की समस्याओं पर केन्द्रित हुआ है। इसीलिए अब अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून का रूप ले चुका है और बाल यौन शोषण पर विराम लगाने हेतु भी कानून अस्तित्व में आ गया है। परन्तु बाल श्रम रोकने में सरकार सफल नहीं हो पायी हैं। यह चिंताजनक है। समूची दुनिया में बाल श्रमिकों की संख्या 24 करोड़ से भी अधिक है। इनमें से एक तिहाई से भी अधिक बच्चे खदानों, खतरनाक मशीनों, खेतों, घरेलू कार्यों और दूसरे प्रतिबंधित कार्यों में लगे हुए हैं। यूनीसेफ की एक रपट के अनुसार,विश्व में शोषण एवं भेदभाव के शिकार करोड़ों बच्चे दुनिया से गायब हो चुके हैं।

? डॉ. गीता गुप्त


  11जून2012

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