संस्करण: 11  जून-2012

संदर्भ : कश्मीर समस्या पर वार्ताकार समूह की रिपोर्ट

उम्मीद जगाती वार्ताकार समूह की रिपोर्ट

? जाहिद खान

                श्मीर समस्या के व्यापक राजनीतिक समाधान खोजने के लिए केन्द्र की ओर से नियुक्त वार्ताकारों की रिपोर्ट, सरकार को सौंपे जाने के सात महीने बाद आखिरकार सार्वजनिक हो गई है। केन्द्र सरकार ने हाल ही में रिपोर्ट को इस मकसद से सार्वजनिक किया कि राजनीतिक पार्टियां और दूसरे संबध्द पक्ष इस पर अपनी प्रतिक्रिया,विचार दें। जाहिर है, सभी पक्षों की राय जानने के बाद ही सरकार रिपोर्ट पर अपना अंतिम फैसला करेगी। बहरहाल, रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक समाधान के अलावा उन मुद्दों को भी शामिल किया गया है, जिनका ताल्लुक सीधे-सीधे सूबे की अवाम से है। सूबे के आर्थिक हालात, सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक वगैरह गोया कि इसमें सभी पहलुओं को शामिल किया गया है।

               गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति, स्थिरता व खुशहाली कायम करने और कश्मीर विवाद के हल के नेक मकसद से यूपीए सरकार ने अक्टूबर 2010को तीन सदस्यीय वार्ताकारों के एक दल की नियुक्ति की थी। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर,शिक्षाविद् राधा कुमार और पूर्व केन्द्रीय सूचना कमिश्नर एम.एम.अंसारी शामिल थे। रिपोर्ट में वार्ताकार समूह का मुख्य जोर कश्मीरियों के जज्बात,उनकी परेशानियों को समझना और फिर उसके बाद अपनी ओर से समाधान पेश करना था। रिपोर्ट, जम्मू-कश्मीर के सभी 22 जिलों में 600 से अधिक प्रतिनिधिमंडलों, 3 गोलमेज बैठकों और 2 जनसभाओं में मिली प्रतिक्रियाओं का नतीजा है। वार्ताकारों ने सूबे के राज्यपाल एन.एन. बोहरा, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी लीडर महबूबा मुती और दीगर सियासी पार्टियों के लीडर, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों, पत्रकारों और विभिन्न वर्गों के लोगों से व्यापक बातचीत की। बातचीत में खास तौर पर आम कश्मीरियों की राय को ज्यादा तवज्जोह दी गई। यही वजह है कि कश्मीर समस्या के सियासी समाधान के लिए,यह संभवत: जम्मू-कश्मीर के लोगों की ओर से दी गई सबसे व्यापक राय है, जिसे रिपोर्ट में शामिल किया गया है।

                कश्मीर में बीते एक दशक में यह देखने में आया है कि सेना के बेवजह दखल के चलते सामान्य कामकाज पर पड़ने वाले असर और रोजगार के नए अवसर सृजित कर पाने में सरकार की नाकामयाबी, लोगों के गुस्से की बड़ी वजह रही है। अशांत क्षेत्र अधिनियम,जन सुरक्षा कानून और विशेष सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम सरीखे कानूनों के खिलाफ कश्मीरी अवाम और सूबे की सियासी पार्टियां लगातार अपनी आवाज उठाते रहे हैं। खास तौर पर विशेष सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की समीक्षा और उसे हटाने की मांग तो खुद केन्द्र सरकार द्वारा गठित आयोगों और कमेटियों ने भी की है। जाहिर है,वार्ताकारों ने अपनी रिपोर्ट में इन कानूनों का अच्छी तरह से जायजा लेते हुए सरकार को सुझाव दिया है कि कश्मीर में रिहाइशी इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी कम से कम की जाए और सुरक्षा बल जिन संपत्तियों पर काबिज हैं,उन्हें खाली कराया जाए,ताकि स्थानीय लोग अपनी सामाजिक,आर्थिक गतिविधियां दोबारा सुचारू रूप से चालू कर सकें। वार्ताकारों ने इसमें विवादास्पद अशांत कानून और विशेष सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) की समीक्षा की सिफारिश करते हुए रक्षा मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह इस मामले पर सकारात्मक रूप से विचार करे। वार्ताकारों का इस मामले में सुझाव है कि सरकार सूबे में लागू जन सुरक्षा कानून में संशोधन करे। वार्ताकारों ने केन्द्र सरकार से सिफारिश की है कि साल 1952के बाद राज्य में लागू सभी केन्द्रीय कानूनों और भारतीय संविधान के अनुच्छेदों की समीक्षा के लिए वह एक संवैधानिक समिति बनाए।

                वार्ताकारों का मानना है कि अशांत क्षेत्र कानून के दायरे में आने वाले इलाकों में अब सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है। सूबे में चाहे जब हतों लगे रहने वाले कर्यू की समस्या पर विचार करते हुए वार्ताकारों ने कहा है कि कयू या तो सीमित हो या खत्म हो। रिपोर्ट में पथराव करने वाले नौजवानों और राजनीतिक बंदियों पर भी ध्यान दिया गया है। वार्ताकारों का सुझाव है कि उन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी वापिस ले ली जाए, जिनके खिलाफ गंभीर इल्जाम नहीं हैं या जिन्होंने पहली बार कोई अपराध किया हो। रिपोर्ट हिंसा छोड़ने वाले आतंकवादियों को माफी देने और उनके पुनर्वास की भी बात करती है। वार्ताकारों ने नियंत्रण रेखा के दोनों और रहने वाले लोगों के बीच सद्भावपूर्ण संबंध विकसित करने के लिए भी कई सुझाव दिए हैं। मसलन सलाहकार तंत्र में दोनों पक्षों की ओर से निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल करने की सिफारिश की गई है, ताकि दोनों पक्ष जल, अर्थव्यवस्था, पर्यटन और कारोबार जैसे साझा हित वाले मुद्दों पर बातचीत कर सकें।

               जैसा कि हम जानते हैं, जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मुल्क में विशेष दर्जा हासिल है। वार्ताकार, अपनी रिपोर्ट में इस विशेष दर्जे को बरकरार रखने की बात करते हैं। यही नहीं, उन्होंने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 371 के तहत विशेष दर्जा देने का भी सुझाव दिया है, जैसा कि मुल्क में दूसरे कई राज्यों मसलन असम, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, गोवा आदि को है। अनुच्छेद 356 में कोई बदलाव नहीं करने का रिपोर्ट में साफ जिक्र है लेकिन साथ ही यह सिफारिश भी कि यदि सरकार बर्खास्त होती है,तो तीन महीने में चुनाव होने चाहिए। यही नहीं रिपोर्ट कहती है कि आंतरिक आपात स्थिति में केन्द्र, राज्य सरकार से सलाह-मशविरा जरूर करे।

                रिपोर्ट में एक अहम सिफारिश सूबे के तीनों इलाकों कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के लिए विकास परिषदें बनाने और उन्हें क्षेत्रवार विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार देना है। बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन जम्मू-कश्मीर की एक बड़ी समस्या है। बीते छ:दशक में मरकजी हुकूमतों के तमाम आर्थिक पैकेजों के बाद भी सूबे में बेतहाशा बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन है। वार्ताकारों ने रिपोर्ट में बेरोजगारी के हालात का जिक्र करते हुए, वहां बुनियादी ढांचे के विकास की जरूरत को रेखांकित किया है और इसके लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक पैकेज देने की सिफारिश की है। ताकि, सूबे में जहां पर्यटन को बढ़ावा मिले, वहीं विकास की रोशनी में माहौल बदलने की भी गुंजाइश बने। कश्मीरी नौजवानों में असंतोष का फायदा विपक्षी पार्टियां और चरमपंथी संगठन बरसों से उठाते रहे हैं। पीडीपी और अलगाववादी संगठन अक्सर बेरोजगारी और मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश करते हैं। यदि सरकार रोजगार के मौके मुहैया कराने और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने में कामयाब हो जाती है, तो सचमुच कश्मीर समस्या का निदान ज्यादा मुश्किल काम नहीं। रिपोर्ट में 1952 से पहले के हालात को बहाल करने जैसे सुझावों को तीनों वार्ताकारों ने खारिज कर दिया है। वार्ताकारों का मानना है कि घड़ी की सुंई को वापिस नहीं लौटाया जा सकता।

                कुल मिलाकर, कश्मीर घाटी के लोग रोज-ब-रोज के बंद-प्रदर्शन, हिंसा और खून-खराबे से तंग आ चुके हैं। अब वे भी चाहते हैं कि घाटी में अमन और खुशहाली वापिस लौटे। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस भले ही 'स्वायत्तता' व 'आजादी' की बात करे,मगर आम कश्मीरी अब यह बात अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उसकी नुमाइंदगी में उनका मुस्तकबिल महफूज नहीं। लिहाजा,केन्द्र की यूपीए सरकार और सूबे की सत्ता पर काबिज नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार दोनों के लिए यह एक अच्छा मौका है,कि वह सूबे में रोजगार के नए अवसर मुहैया कराए और नागरिक अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाए। क्योंकि यही वे उपाय हैं,जिनसे घाटी के भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लौटाया जा सकता है। उम्मीद है आने वाले दिनों में वार्ताकार समूह की रिपोर्ट कश्मीर घाटी में स्थायी शांति, स्थिरता कायम करने और खुशहाली लाने में एक बड़ा रोल निभाएगी।


? जाहिद खान