संस्करण: 11  जून-2012

साहित्यिक और सांस्कृतिक खबरें नदारद

राजनैतिक खबरें प्रचार माध्यमों पर हावी

? राजेन्द्र जोशी

                 क समय था जब साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलाक्षेत्र से जुड़ी खबरों और उनकी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों द्वारा गहरी रुचि ली जाती थी। वर्तमान दौर में संचार माध्यमों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। यह बदलाव स्वाभाविक भी है। पहले यह जुमला चरितार्थ होता था कि 'साहित्य समाज का दर्पण होता है'किंतु अब राजनीति इतनी ज्यादा हावी हो गई है कि पूरे के पूरे संचार माध्यम चाहे वे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हों, राजनीतिमय हो गये हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि अब राजनीति ही समाज का दर्पण हो गई है। जैसी समाज की रूचि, वैसी ही उसकी सूरत। लेकिन राजनीति के दर्पण की इस सूरत और साहित्य के दर्पण की सूरत में जमीन आसमान का अंतर परिलक्षित होता हैं। जहां कला, साहित्य, और संस्कृति जीवन के मूल आधार के रूप में प्रतिष्ठापित है वहीं राजनीति इसके विपरीत स्वार्थ,लालसा,पद लोलुपता और दुर्भावनाओं जैसे दुर्गुणों की ओर इंगित करती है।

                 मोटे तौर पर साहित्य की परिभाषा है-कोई ऐसा लेखन जिससे संपूर्ण समाज का हित साध्य होता हो। ऐसे साहित्य की विधा काव्य, कथा, नाटक, निबंध या रिपोर्ताज ही क्यों न हो, वह साहित्य माना जाता है। ऐसा साहित्य एक आदर्श,अनुशासित और मर्यादित समाज के निर्माण में सहायक होता है। साहित्य और संस्कृति ऐसे शब्द नहीं हैं जिनका इस्तेमाल नकारात्मकता का बोध कराते हों। ये तो वे शब्द है जो समाज की परम्पराओं, चारित्रिक धरोहरों के इतिहास को पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपने में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं। देखा जाय तो किसी भी देश या समाज के अतीत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाली साहित्यिक विधाओं का अपना एक अलग ही महत्व है।

               बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में हर क्षेत्र व्यावसायिक नज़र से देखा जाने लगा है। अब उद्योग और व्यवसाय की परिभाषा के अर्थ बदलते जा रहे हैं। जहां राजनीति को एक उद्योग समझा जाने लगा है वहीं कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र व्यवसायिक होते चले जा रहे हैं। धर्म क्षेत्र के व्यावसायीकरण के तो अनेक प्रमाण देखने में भी आये है। संचार माध्यम भी पूरी तरह से व्यवसायीकृत हो ही चुके हैं। ऐसे में संचार माध्यमों से अपेक्षा रखना कि वे कला, साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए अपने माध्यमों मं समय निकाल सके, बेमानी होगा। राजनीति और धर्म के क्षेत्र में तो इस दौर में आर्थिक दृष्टि से ज्यादा मजबूत होते गये है किंतु कला,साहित्य और संस्कृति से जुड़े क्षेत्र आर्थिक बदहाली का सामना करते दिखाई देते हैं। धार्म और राजनीति के क्षेत्रों के साथ ही उद्योग, व्यवसाय और सेवा के क्षेत्रों में अपने प्रचार प्रसार के प्रति ज्यादा ललक दिखाई देती है। अत: इन क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार और विज्ञापन के लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान संभव होना स्वाभाविक है। हालांकि संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर कतिपय शासकीय और अशासकीय संस्थान ढिंढोरा तो खूब पीटते हैं किंतु संस्कृति के प्रचार के लिए जो बजट प्रावधान होता है वह उन संस्थानों की अन्य व्यावसायिकताओं से जुड़े बजट प्रावधानों की तुलना में अत्यंत अल्प ही होता है।

               साहित्य और संस्कृति का क्षेत्र इसलिए भी उपेक्षित रह जाता है क्योंकि वह संस्थानों को बदले में कुछ रिटर्न नहीं देता है। सरकारी और गैरसरकारी संस्थान केवल उन्हीं क्षेत्रों के प्रचार प्रसार में दिलचस्पी दिखाते हैं जिनमें उन संस्थानों को, आर्थिक सामाजिक या राजनैतिक लाभ नजर आता है। ऐसा नहीं है कि देश में साहित्य और संस्कृति के नाम पर कुछ हो नहीं रहा है। खूब हो रहा है। साहित्य में खूब अच्छा लिखा जा रहा है,पढ़ा जा रहा है और पसंद किया जा रहा है। किंतु प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उतना ज्यादा महत्व न मिल पाना इस बात को जाहिर करता है कि इस विज्ञापन युग मकें इन क्षेत्रों की आर्थिक हैसियत बेहतर नहीं हो पाई है। फिल्म जगत का उदाहरण देखा जा सकता है कि ऐसी-ऐसी फिल्में संचार माध्यमों के जरिए खूब प्रचार बटोर लेती है जिनका न कोई कथानक होता है, न ही कोई अभिनय कला की दृष्टि से बेहतर होती हैं और न ही उनके गीतों के बोलों में कोई दम होता है। चूंकि फिल्म क्षेत्र आर्थिक हैसियत रखता है और वह इस विज्ञापन युग की होड़ा-होड़ी में आगे आ जाता है इसलिए खूब प्रचारित हो जाता है। धीरे धीरे आम जनता की अभिरूचि में भी बदलाव आता चला गया और साहित्यिक क्षेत्र अछूता होता चला गया। एकदम से यह तो नहीं माना जा सकता कि संस्कृति क्षेत्र प्रचार-प्रसार में पीछे छूट गया है किंतु यह तो माना ही जा सकता है कि संचार माध्यमों की व्यावसायिकता साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार को महत्व देने में रूचि नहीं ले पा रही है।

                साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों की श्रृंखलाऐं निरंतर रूप से प्राय: हर महानगर और छोटे से छोटे कस्बों में अविरल चलती रहती है। कविता पाठ,कहानी पाठ,समीक्षाएं गीत और नाटय प्रदर्शनों के कार्यक्रम की सूचनाऐं मिलती रहती है, किंतु मीडिया में इनसे जुड़े कार्यक्रमों के कवरेज उस तादाद में नहीं दिख पाते हैं जिस तादाद में कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। आखिर ऐसे आयोजनों के बारे में मीडिया की रूचि क्यों होगी जिनके विज्ञापन जारी नहीं होते और जिनकी खबरें छापने से मीडिया को कोई आर्थिक, सामाजिक या राजनैतिक लाभ नहीं होता हो। वह युग बीत गया जब साहित्य की खबरों से अखबार के पृष्ठ भरे होते थे। रविवार के अंक तो पूरी तरह से साहित्य को समर्पित होते थे। अब तो राजनीति की मसालेदार खबरों का जमाना है जिसके प्रचार प्रसार से राजनैतिक क्षेत्र और संचार क्षेत्र दोनों हृष्ट-पृष्ट हो रहे हैं।


? राजेन्द्र जोशी