संस्करण: 11  जून-2012

दवा कंपनियों का काला कारोबार

? महेश बाग़ी

               बेहिसाब मुनाफा काने में जुटीं दवा कंपनियां डॉक्टरों के साथ मिलकर मरीजों की जेब खाली करने का धंधा कर रही हैं। कभी डॉक्टरों को गिफ्ट देकर लुभाने वाली दवा कंपनियां अब डॉक्टरों को अपने उत्पाद महंगी कीमत में बिकवाने के बदले विदेश यात्राओं का तोहफा दे रही हैं। खास बात तो है कि यह सब गोरखधंधा खुलेआम चल रहा है और सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है। दवाओं के मूल्य नियंत्रण में हम अपने छोटे से पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी बहुत पीछे हैं।

                  यह तो चंद उदाहरण मात्र है, इसकी पूरी तस्वीर कोयले की तरह काली है, जिसे पढ़कर आम आदमी का डाक्टरी जैसे पवित्र पेशे से विश्वास उठ जाएगा। अपने फायदे के लिए डॉक्टर मरीजों को ऐसी दवाइयां लिखते हैं, जिसमें मरीज का मर्ज दूर हो न हो, उनकी जेब दवा कंपनी से अवश्य भर जाए। मप्र में दवा कंपनियों और डॉक्टरों का गठजोड़ दवाइयों के नाम पर मरीजों को लूटने का धंधा सालों से चलाता आ रहा है। बीमारियों के इस दौर में दवा कंपनियों की गोद में बैठकर डॉक्टर करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। इंसान ईश्वर के बाद यदि किसी पर विश्वास करता है वह डॉक्टर है और डॉक्टर आम आदमी के विश्वास का हर दिन गला घोट रहा है।

                 दवा एक, कीमत अनेक

                 दवा बाजार में कीमत का अंतर ही सारे गठजोड़ की जड़ है। एक ही दवा को कई कंपनियां बनाती हैं, लेकिन ब्रांड के मुताबिक उसकी कीमत अलग-अलग होती है। एक कंपनी की दवा यदि 40रुपए की है तो वही दवा दूसरी कंपनी की 100रुपए तक की हो सकती है। आप कौन सी दवा लें?यह हमारे यहां डॉक्टर तय करता है और डॉक्टर क्या तय करे, यह दवा बनाने वाली नामी-गिरामी कंपनियां तय करती हैं।

                बिक्री बढ़ाने का है फंडा

                प्रतिस्पर्धा के इस दौर में दवाई कंपनियों के बीच बिक्री बढ़ाने के लिए भारी दबाव है और यह तभी संभव है जब डॉक्टर कंपनी के ब्रांड की दवा लिखें। इसलिए दवा दवा कंपनियों के अधिकारियों का पूरा ध्यान डॉक्टरों पर केंद्रित रहता है। डॉक्टर उनके ब्रांड की दवा लिखें,इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इसके लिए वे डॉक्टरों को ऑफर देते हैं। यह ऑफर कभी कैश तो कभी गिफ्ट के रूप में हुआ करता था। अब विदेश यात्रा के रूप में किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक एक वर्ष में एक डॉक्टर पर दवा कंपनियां औसतन एक से डेढ़ लाख रुपए खर्च करती है।

                 दवाइयों की ये हैं बड़ी कंपनियां

                 बोकहार्ड, निकालस, फाइजर, ग्लेक्सो, केडिला, सिपला, एमपीआई, एवेंटिस, नोवाटिस, टोरेन्ट, वन फार्मास्यूटिकल, एल्डर, वैथ, मेयर, बूस्ट, एबोट।

                ऐसे होती है विदेश की सैर

                  डॉक्टर की रुचि जिस देश में सैर-सपाटा की हो, दवा कंपनियां उस देश में मेडिकल कांफ्रेंस या सेमिनार आयोजित करती हैं। अमेरिका के अलावा अमूमन डॉक्टर बैंकाक, स्विटजरलैंड, साउथ अफ्रीका, सिंगापुर जाना पसंद करते हैं। यहां तक कि जिस देश का नाम मेडिकल साइंस के क्षेत्र में कोई स्थान नहीं रखता,किंतु मौज-मस्ती के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं, वहां भी डॉक्टरों के कहने पर कांफ्रेंस रखी जाती है।

               क्या है नियम? हो क्या रहा है? क्यों?

                 बिना पर्ची के बिकने वाली दवाओं का विज्ञापन किया जा सकता है। किंतु दवा बनाने वाली कंपनियां इससे ज्यादा ध्यान डॉक्टरों पर देती हैं। सभी तरह की दवा और टॉनिक डॉक्टर से पर्ची पर लिखवाकर बेचती हैं। प्रचार की तुलना में यह तरीका उन्हें ज्यादा पसंद है,क्योंकि पर्ची पर लिखी दवा खरीदने वाला भाव मरीज अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के ग्राहक की भांति न तो मोल भाव करता है और न ही यह सवाल कि फलां ब्रांड की कीमत तो कम है। दवांए नगद में बिकती हैं और एमआरपी अर्थात अधिकतम खुदा मूल्य में बिकती हैं।

                 क्या कहते हैं पेशे से जुडे लोग

                एक मेडिकल रिप्रजेंटेटिव ने कहा-यह सत्य है कि दवा कंपनियां अपने महंगे उत्पाद लिखने के लिए डॉक्टरों को विदेशों की सैर कराती हैं। बहाना सेमिनार या कांफ्रेंस का होता है,किंतु वहां करते हैं मौज-मस्ती। ज्यादातर बैंकाक, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका, स्विटजरलैंड जाते हैं। ऐसी जगह भी जिसका मेडिकल साइंस में कोई महत्व नहीं है।

           शासकीय चिकित्सालय के कंपाउंडर ने बताया

                 एक नसबंदी शिविर में डॉक्टर ने प्रोटीन पावडर और सीरप के नाम पर्ची पर लिखकर दिया और मुझसे कहा कि सभी को यह दिलवा दो। शिविर में 40 महिलाओं ने उसे खरीदा। जिस डिब्बे की कीमत 30 रुपए है, वह मेडिकल स्टोर से एमआरपी 140 रुपए में हरेक महिला को खरीदना पड़ा।

                दवाएं बिकवाने का रोचक मामला

                डॉक्टर से अपनी कंपनी की दवाएं बिकवावने का एक रोचक मामला ऐसा भी है। प्रदेश के एक शासकीय चिकित्सालय के डॉक्टर और हैदराबाद की एक फार्मास्यूटिकल कंपनी के बीच स्टांप पेपर का लिखित एग्रीमेंट हुआ था। कुछ समय बाद दवा कंपनी के स्टॉकिस्ट ने स्वास्थ्य विभाग के मुख्यालय में लिखित शिकायत में कहा कि डॉक्टर द्वारा एग्रीमेंट का उल्लंघन करने पर किसी दूसरी कंपनी की दवाएं लिखी जा रही हैं। कंपनी द्वारा डॉक्टर को दवाएं लिखने के लिए 1.5 लाख रुपए की राशि अदा की गई थी। स्टाकिस्ट की लिखित शिकातय पर जांच गई और आरोप सही पाए जाने डॉक्टर इस तरह की प्रैक्टिस से बचें।

                दवा कंपनी ने दी डॉक्टर को दस लाख की मशीन

                भोपाल के एक डॉक्टर को कुछ वर्ष पहले एक दवा कंपनी ने दस लाख रुपए मूल्य की अमेरिकन मशीन दी है। बतौर ऐहतियात मशीन के कागजात एक अन्य व्यक्ति के नाम पर बनवाए गए हैं। अलबत्ता मशीन डॉक्टर के यहां लगी है। बीपी कोलिन नाम की यह मशीन धमनियों में वसा के जमाव का परीक्षण करती है। दवा कंपनी ने यह मशीन इसके मूल्य का आठ गुना बिजनसे देने की शर्त डॉक्टर साहब को दी थी।

                 दवाएं भी होती हैं फैंसी

                 दवा कंपनी की सेहत बनाने  डॉक्टर मरीज को पर्चे में दवा के साथ जो लिखते हैं, उन्हें मेडिकल के पेशे में फैंसी ड्रग कहा जाता है। ये होते हैं प्रोटीन, विटामिन और आयरन वाले उत्पाद।

                सर्जिकल आइटमों में भी भारी मुनाफा

                सर्जिकल आइटम बनाने वाली कंपनियां भी भारी मुनाफा कमा रही हैं। स्लाइन चढ़ाने वाली किट की कीमत 3 रुपए होती है, जिसे 27 रुपए में बेचा जाता है। डिस्पोजल सिरिंज की कीमत 1 रुपए है, जो 5 रुपए में बिकवाई जाती है। शुगर और हृदय रोगियों का इलाज करने वाले विशेषज्ञों के पेशेंट जिंदगी भर के लिए होते हैं। इन बीमारियों की दवाएं भी महंगी होती हैं।

                  बांग्लादेश में यहां से अच्छी व्यवस्था

                  बांग्लादेश की सरकार ने 90 प्रतिशत बीमारियों के अलाज के लिए 200 सामान्य नामों वाली दवाइयों के विक्रय को मंजूरी दी है। इन दवाओं का मूल्य ब्रांडेड दवाओं से 110 हिस्सा कम होता है।

                अल्केम ने टैक्सिम से कमाए करोड़ों

                अल्केम कंपनी ने आज से दस-बारह वर्ष पूर्व एक इंजेक्शन टैक्सिम 1 ग्राम लांच किया था, तब उसकी कीमत थी 72 रुपए, लेकिन महंगाई बढ़ने के बावजूद आज इसकी कीमत हो गई 34 रुपए 96 पैसे। कारण अब उसे कई कंपनियां बना रही हैं। अल्केम द्वारा आधी से कम कीमत कर दी गई। फिर भी मुनाफा है। समझा जा सकता है कि इतने वर्षों में अल्केम कंपनी ने सिर्फ इस इंजेक्शन से कितनी कमाई की होगी।

               मरीजों की लूट के लिए छूट की जिम्मेदार है सरकार

               भारत में गरीबों का प्रतिशत काफी जयादा है। यहां दवा कंपनियों और डॉक्टरों की मिलीभगत से हो रही मरीजों की लूट के खिलाफ स्वास्थ्य और रसायन मंत्रालय को कदम उठाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई दवाओं को मूल्य नियंत्रण की सीमा में लाने का आदेश दिया है। केंद्र की यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी यह प्रावधान है कि लोगों को दवाएं सस्ती मिलनी चाहिए। किंतु इन साढे चार सालों में केंद्र सरकार दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिए असरदार कदम नहीं उठा सकी।

                होना क्या चाहिए?

                 -अन्य कई देश की तरह भारत में भी डॉक्टर पर्ची पर दवा के ब्रांड की जगह केमिकल का नाम लिखें।

                -दवा का फार्मूला एक होने पर भी अलग ब्रांड और जेनेरिक रेंज होने से दवा की कीमत में जमीन-आसमान का अंतर है। इसे समाप्त करने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।

                 क्या कहा एमसीआई ने

                   मेडिकल क्षेत्र और डॉक्टरों से जुड़ी देशी संस्थाओं को लिखे एक पत्र में एमसीआई ने आगाह किया कि फार्मा कंपनियों से किसी भी प्रकार का उपहार लेना इस पवित्र पेशे की आचार संहिता के खिलाफ है। 13 अप्रैल, 2008 को लिखे अपने इस पत्र में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने स्पष्ट तौर पर सभी से इन मुद्दों पर गाइडलाइन तैयार करने के लिए सुझाव मांगे हैं।

   ? महेश बाग़ी