संस्करण: 11  जून-2012

कोसी कला दंगा और सपा सरकार

?  राजीव कुमार यादव

               क तरफ जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए दो हजार करोड़ रुपए का पैकेज दे रहे हैं तो वहीं उनकी पार्टी के नेता और प्रशासन वह सब कुछ करता है जो अल्पसंख्यकों को आभास दे कि यह यह यूपी नहीं मोदी का गुजरात है। दरअसल पिछले दिनों मथुरा के कोसी कला में जो कुछ हुआ उसे मुसलमान,सरकार की अपने पहली ही तिमाही परीक्षा के विफलता के बतौर देख रहा है। जिसका असर यदि बरकरार रहा तो 2014में साइकिल के लिए मुश्किले पैदा हो सकती हैं। गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में वैसे भी राज्य के इस पश्चिमी हिस्से में मुसलमानों ने सामान्य ट्रेंड के विपरीत रालोद-कांग्रेस के पक्ष में ही मतदान किया था और रालोद के ठाकुर तेजपाल सिंह विजयी हुए थे। इस लिहाज से कोसी कला की घटना को सपा की तरफ से आगामी नगर निकाय चुनावों में एक नए समीकरण की तलाश के बतौर भी देखा जा सकता है।

                दरअसल एक जून को कोसी कला में हुए दंगे जिसमें चार लोगों की मौत सरकारी आकड़ों के मुताबिक हुयी और करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ,को मुसलमान इसलिए भी सपा सरकार की नियत से जोड़कर देख रहा है कि वारदात के एक हफ्ते बाद भी न तो कोई मंत्री वहां गया और न ही पुलिस ने 177लोगों में से किसी एक को पकड़ा जिनपर नामजद एफआईआर दर्ज है। जाहिर है यह लक्षण किसी भी सेकुलर होने का दावा करने वाली सरकार का नहीं हो सकता। यहां गौरतलब है कि इस दंगे में बहुजन समाज पार्टी के नेता लक्ष्मी नारायण सिंह,उनके भाई और बसपा एमएलसी चौधरी लेखराज सिंह और उनके बेटे नरदेव सिंह के साथ ही सपा के जिला अध्यक्ष गोविन्द सिंह पर मुस्लिमों पर हुए इस संगठित हमले का नेतृत्व करने का आरोप है। वहीं मुसलमानों की मसीहायी का दावा करने वाले आजम खान जैसे नेता सपा के बचाव में उतर आये हैं। यानी समाजवादी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा जिनके उपरी नेतृत्व में हमेशा तू-तू मैं-मैं होती है और राजनीतिक गरिमा के पार जा कर ही उनमें संवाद संभव हो पाता है,में एक अभूतपूर्व और अप्रत्याशित एकता दिखी। जाहिर मुसलमानों के खिलाफ इस हिंसक एकता का आधार निश्चित तौर पर हिंदुत्ववादी दषर्न ही हो सकता है।

                 दरअसल, कोसी कलां के इस दंगे से पहले पिछले साल ही बसपा के शासन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और बरेली में भी दंगे हुये थे। जिसमें प्रशासन की भूमिका तो संदिग्धा रही ही, बसपा और समाजवादी पार्टी के नेता भी अपनी भूमिका के चलते कटघरे में आए थे। यानी यह मिथक अब खुद ब खुद एक स्तर पर टूटने लगा है कि सामाजिक न्याय के नारे के साथ उपजी सपा और बसपा जैसी पार्टियों के चलते भाजपा का साम्प्रदायिक एजेंडा विफल हो गया है। या इनके उभार ने उसके रथ को रोक दिया है। बल्कि हकीकत तो यह है कि उनके उभार के साथ ही हिंदुत्व उन निचले और पिछडे तबकों तक में घुसपैठ कर चुका है जिसकी कल्पना 90 के शुरूआती वर्षों में नहीं की जा सकती थी। जब इन्होंने मुसलमानोंपिछडों और दलितों की एकता की बुनियाद पर आडवाणी एंड कम्पनी के साम्प्रदायिक अभियान को रोका था।  

                बहरहाल, जिस तरह कोसी कलां में संगठित भीड़ ने चारों तरफ से घेर कर मस्जिद में छुपे मुसलमानों पर हमला किया उसे सामान्य दंगा या कानून व्यवस्था का फेल्योर नहीं माना जा सकता। जैसा कि प्रदेश सरकार बता रही है। सब कुछ सुनियोजित और संगठित तरीके से ही हुआ लिहाजा सरकार की धर्मनिरपेक्षता के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल जब भी समाजवादी पार्टी प्रदेश में सत्ता में आती है साम्प्रदायिक दंगे जैसे अनिवार्य हो जाते हैं। गोरखपुर, मऊ हो या सिध्दार्थनगर पिछली सपा सरकार में हर जगह दंगे हुए जहां दंगाइयों को खुली छूट दी गई और सरकार की तरफ से कोई मंत्री तक नहीं गया। ठीक ऐसा ही कोसी कला में भी हुआ।

               दरअसल सपा के राजनीतिक समीकरण में मुसलमान उसके सबसे अहम घटक हैं जिसके सहारे वह सत्ता तक पहुंचती है। वहीं जब वह उससे बिदकता है तो साइकिल पंचर हो जाती है। इस लिहाज से देखा जाय तो सपा की रणनीतिक जरुरत भाजपा को स्पेस देना हो जाता है। ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति में मुसलमान उसकी तरफ मजबूती से एकजुट हों। इस फार्मूले की कसौटी पर कोसी कला को परखें तो सरकार और प्रशासन की शिथिलता के रहस्य को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि 2014में लोकसभा चुनाव होने हैं और यदि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ तो मुसलमान विधानसभा चुनाव की तरह ही सपा के साथ रहेगा। नहीं तो हर मोर्चे पर विफल दिखती सरकार से छिटकर वह बसपा या कांग्रेस में जा सकता है। ऐसे में सपा के लिए भाजपा और साम्प्रदायिक दंगे जैसे हिन्दुत्वादी एजेण्डे को स्थापित करना जरुरी हो जाता है। यानि कोसी कला के बहाने सिर्फ दंगों की राजनीति की वापसी ही होती नहीं दिख रही है बल्कि एक दषक पुराने कथित धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक राजनीति जिसके केन्द्रक सपा और भाजपा हुआ करते थे को भी वापस लाने की कोशिश देखी जा सकती है।

? राजीव कुमार यादव